Public Administration: Structural Discrimination Against Vulnerable

Get unlimited access to the best preparation resource for IAS : Get detailed illustrated notes covering entire syllabus: point-by-point for high retention.

भारत में असुरक्षित, वंचित एवं उपेक्षित समूह/समुदाय (Vulnerable, Marginalized and Disadvantaged Groups/Communities in India)

भारत में असुरक्षित, हाशिए पर चले गए तथा उपेक्षित समूहों के साथ होने वाला भेदभाव (Discrimination Faced by Vulnerable, Marginalised and Disadvantaged Groups in India)

संरचनात्मक भेदभाव (Structural Discrimination)

संरचनात्मक भेदभाव क्या है? (What is Structural Discrimination?)

संरचनात्मक भेदभाव का आशय है कि जब कुछ विशेष समुदाय और समाज कुछ विशेष व्यक्तियों एवं समाज के संबंध में विभेदात्मक व्यवहार करते हैं, और यह विभेदात्मक व्यवहार पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है। इन समूदायों की कुछ पूर्व मान्यताएँ भी होती है और उन्ही का ये अनुसरण भी करते हैं। जब समाज सदियों से कुछ समूहों का शोषण करता है या जब कुछ समूहों, जैसे गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों को पीढ़़ी दर पीढ़़ी समाज में वंचित रखा जाता है और उन्हें राज्य दव्ारा किसी भी प्रकार की सामाजिक सहायता प्राप्त नहीं होती तथा उनके अधिकारों को भी संरक्षण प्राप्त नहीं होता तो ऐसे भेदभाव को ही संरचनात्मक भेदीभाव कहा जाता है।

असुरक्षित हाशिए पर चले गए तथा उपेक्षित समूहों के साथ होने वाले संरचनात्क भेदभाव (Structural Discrimination Against Vulnerable, Marginalized and Disadvantaged Groups)

Structural Discrimination

हाशिए पर चले गए समूहों के समक्ष असुरक्षा कुछ (महत्वपूर्ण समुदाय) (Vulnerability Faced by Marginalized in India (Few Important Groups) )

अनुसूचित जाति और जनजाति के समझ असुरक्षा (Vulnerability F Scheduled Castes and Tribes)

2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 16.6 प्रतिशत अनुसूचित जातियाँ और 8.6 प्रतिशत अनुसूचित जनजातियाँ है। अर्थात्‌ दोनों मिलकर कुल जनसंख्या का एक चौथाई है। अनुसूचत जाति के अंतर्गत वे लोग आते हैं जिन्हें वेदों में अंतिम वर्ण अर्थात्‌ शूद्रों (अवर्ण/अंत्यज) के अंतर्गत रखा गया है। अनुसूचित जाति शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम साइमन कमीशन दव्ारा किया गया ओर 1935 के भारत शासन अधिनियम में इसे शामिल कर लिया गया। 1935 से पहले इन्हें ‘अस्पृश्य अथवा वाह्‌य या दबे कुचले वर्ग’ की संज्ञा दी जाती है। महात्मा गाँधी ने इनके लिए हरिजन शब्द का प्रयोग किया जिसका अर्थ है हरि अर्थात्‌ ईश्वर के लोग। अनुसूचित जातियाँ पीढ़ियों से सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक रूप से वंचित रही है, और इसे हमारे समाज और अर्थव्यवस्था में आज भी देखा जा सकता है।

अनुसूचित जातियों की समस्याएँ (Problems Faced by Scheduled Castes)

  • अनुसूचित जातियाँ (निम्न जातियाँ) आर्थिक रूप से दूसरों पर निर्भर है, राजनैतिक रूप से शक्तिहीन तथा सांस्कृतिक रूप से उच्च जातियों के अधीन रही है।
  • अनुसूचित जातियों के लगभग 90 प्रतिशत लोग ग्रामीण क्षेत्रों रहते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले इन लोगों को उत्पादन गतिविधियों के स्वामित्व से पूर्णत: वंचित रखा गया है। चूँकि ये लोग भूमिहीन होते हैं इसलिए अपनी रोजी रोटी कमाने के लिए इन्हें बड़े भू-स्वामियों और कृषि भूमि मालिकों के अधीन कार्य करना पड़ता है। एक तो इन्हें कम पारिश्रिमिक मिलता है, और उसके बाद अपने परिवार के भोजन के लिए इन्हें पैसा उधार भी लेना पड़ता है। इसके बाद अपना उधार ये लोग बंधुआ मजदूर के रूप में अदा करते हें।
  • भारत में दलित महिलाएँ और लड़कियाँ किसी अन्य समूह की अपेक्षा अधिक असुरक्षित हैं। वे जाति, वर्ग एवं लिंग से संबंधित तिहरे भेदभाव को झेलती हैं जो उन्हें हाशिए के समूहों के साथ होने वाले शोषण के दुष्चक्र में फँसा देता है।
  • दलित बच्चों के साथ प्राथमिक विद्यालय से उच्च शिक्षा संस्थानों तक भेदभावपूर्ण बर्ताव होता है परिणामस्वरूप उनको सीखने की क्षमता एवं समाज के प्रति अपनत्व की भावना में कमी आती है।
  • अनुसचित जातियों (अथवा दलितों) को हाथ से मैला ढोने (Manual Scavenging) जैसे घृणित कार्य करने पड़ते हैं।
  • शिक्षा और जागरूकता की कमी के कारण विशेषकर ग्रामीण और उप-नगरीय क्षेत्रों की अनुसूचित जातियाँ अपने अधिकारों (नागरिक, राजनीतिक एवं संवैधानिक) के प्रति जागरूक नहीं रहती हैं।
  • कभी-कभी तो सरकारी कार्यों में स्थानीय प्रशासन की रुचि एवं सहभागिता मे कमी के चलते अनुसूचित जातियाँ सरकार की कल्याणकारी नीतियों, योजनाओं और छात्रवृत्ति प्रावधानों के बारे में जागरूक भी नहीं रहती हैं।
  • सामाजिक न्याय के प्रति सरकार के नियमित प्रयासों के बावजूद विभिन्न स्थानीय प्रशासनिक संरचनाओं ने अस्पृश्यता तथा भेदभाव संबंधी व्यवहारों को सरल बनाया है। सरकारी विद्यालयों में इनका प्रचलन बहुत अधिक है, मंदिरों और राशन की दुकानों में दलितों का प्रवेश वर्जित होता है और ग्रामीण स्वास्थ्य कर्मियों को दलितों के उपचार की मनाही होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में जल स्त्रोतों पर जाना दलितों के लिए वर्जित होता है, यहाँ तक कि मतदान केन्द्रों पर उनके लिए पृथक पंक्तियाँ निर्धारित होती हैं।

संविधान तथा अन्य विधिक प्रावधानों के बावजूद यह एक दुर्भाग्यपूर्ण सत्य है कि हमारे समाज में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों एवं अन्य कमजोर वर्गों के प्रति अन्याय एवं शोषण निरंतर जारी है। सामान्य रूप से अनुसूचित एवं विशेषकर दलित वर्ग के लोग आज भी अपमान का कष्ट झेलते हैं, और आधी से अधिक सदी के बाद, इन सबके बावजूद भारत दव्ारा गणतंत्र होने का दावा करना एक अत्यंत ही लज्जा का विषय है।

न्यायमूर्ति ए. एस. आनंद

भूतपर्वू अध्यक्ष, मानवाधिकार आयोग

तथा भारत के मुख्य न्यायाधीश

भारत में अनुसूचित जातियों की समस्याएँ और उनके साथ होने वाले भेदभाव (Problems & Discrimination Faced by Scheduled Tribes in India)

  • अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या का मानव विकास सूचकांक (HDI) शिक्षा, स्वास्थ्य एवं आय जैसे सभी मापदंडों के आधार पर शेष जनसंख्या से बहुत कम हैं। इसके अलावा जनजातीय क्षेत्रों की तुलना में शेष क्षेत्रों की आधारभूत अवसरंचना में विद्यमान अंतर निरंतर तेजी से बढ़ रहा है।
  • सिंचाई-बाँधों, जल विद्युत एवं तापीय ऊर्जा संयंत्रों, कोयला खानों तथा खनिज आधारित उद्योगों जैसी बृहद विकसीय परियोजनाओं के चलते भारत में एक बड़ी संख्या में जनजातियाँ विस्थापित होती रही है।
  • पेसा (PESA) एक महत्वपूर्ण कानून है जो जनजातियों की उनकी सशक्तीकरण की प्रक्रिया में निर्णय निर्माता क्रियान्वयन कर्ता, मॉनीटर तथा मूल्यांकन कर्ता के रूप में एक सक्रिय एवं प्रभावी सहभागिता सुनिश्चित करता है। इन लोगों की परंपराओं और प्रथाओं, सांस्कृतिक पहचान, सामुदायिक संसाधनों तथा विवाद समाधान के परंपरागत उपायों के संरक्षण के लिए ग्राम सभा को शक्तियाँ दी गई हैं, हालाँकि जमीनी हकीकत इससे एकदम भिन्न है। पेसा (PESA) अनैतिक एवं अंधाधुंध तरीके से जनजातीय स्थानीय पावर लॉबी को व्यक्तिगत मौद्रिक लाभ देकर जनजातियों के संसाधनों की कीमत पर औद्योगिक विकास को प्रोत्साहन देता रहा है।
  • हमारे देश में लगभग 461 अनुसूचित जनजातियाँ हैं, जिनमें से 75 की अति पिछड़े आदिम जनजातीय समुदायों (PTGs) के रूप में पहचान की गई है। लेकिन सांस्कृति संपर्क, औद्योगीकरण तथा नगरीकरण के कारण जनजातियों के दैनिक जीवन पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा हैं।
  • वनों में नियमित रूप से हो रहे अतिक्रमण के कारण खाद्य संग्रहण, शिकार, झूम कृषि और कुटीर उद्योग जैसी जनजातियों की आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। इसने वन आधारित अर्थव्यवस्था पर जीवन-यापन कर रहे अनेकों जनजातियों के अस्तित्व के समक्ष प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है।
  • मुंडा, उराँव, हो और संथाल जैसी कृषक जनजातियाँ सिंचाई के सुनिश्चित साधनों पर निर्भर हैं लेकिन सिंचाई की कमी के कारण कृषि से भी उन्हें वर्ष भर रोजगार प्राप्त नहीं होता है। साथ ही इससे न ही उनके परिवार को भी वर्ष भर खाना ही मिल पाता है।
  • चूँकि अधिकांश जनजातीय लोग श्रमिक होते हैं, और उन्हें साल भर काम भी नहीं मिलता है तथा इनका वेतन भी न तो नियमित रूप से और न ही उचित मात्रा में प्राप्त ही होता है। परिणामस्वरूप इनमें से अधिकांश महाजनों से ऊँची ब्याज दर पर उधार लेते हैं और इस उधार को वे बहुत ही कम वेतन पर बंधुआ मजदूर के रूप में कार्य करके अदा करते हैं।
  • चूँकि जनजातियाँ दूर-दराज के क्षेत्रों में रहती हैं। इससे उनके कल्याण एवं विकास कार्यों से संबंधित सूचनाओं को प्राप्त करने में समय भी बहुत लगता है। इस तरह जनजातियाँ अपने अधिकारों के प्रति न तो जागरूक ही हो पाती हैं, बल्कि अपने कई विकास कार्यक्रमों के प्रति वे अनभिज्ञ भी रहती हैं।

Developed by: