Public Administration: Survey of Hunger and Malnutrition in 100 Districts

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भूख, निर्धनता व विकास से संबंधित मुद्दे (Issues Relating to Hunger, Poverty and Development)

भूख तथा कुपोषण पर केंद्रित 100 जिलों पर सर्वेक्षण संबंधी हंगामा रिपोर्ट, 2011 (HUNGAMA Report 2011 on Survey of Hunger and Malnutrition in 100 Districts)

भारत में भूख तथा कुपोषण के संदर्भ में महत्वपूर्ण हंगामा रिपोर्ट को प्रस्तुत किया गया जिसके आधार पर भारतीय प्रधानमंत्री दव्ारा कुपोषण व भूखमरी की स्थिति को “राष्ट्रीय शर्म” (National Shame) की संज्ञा दी गयी। इस रिपोर्ट के मूल निष्कर्ष अथवा ध्यान देने योग्य बिंदु निम्नवत्‌ हैं-

  • हंगामा सर्वेक्षण का उद्देश्य देश में बाल कुपोषण की व्यापकता का पता लगाना था। सर्वेक्षण में पता चला कि बाल कुपोषण की व्यापकता में कमी आई है। बच्चों के सामन्य से कम वचन की व्यापकता 53 प्रतिशत से घटकर 42 प्रतिशत हो गयी है। इससे 7 वर्षों की अवधि के दौरान 20.3 प्रतिशत कमी प्रदर्शित होती है तथा औसत वार्षिक दर में 2.9 प्रतिशत की कमी हुई है।
  • सर्वेक्षण का कहना है कि बाल कुपोषण सभी राज्यों तथा जिलों में काफी व्यापक है तथा जीवन के प्रारंभ में शुरू हो जाता है। 5 वर्ष से कम आयु के 42 प्रतिशत बच्चे सामन्य से कम वजन के हैं तथा 58 प्रतिशत अविकसित है। सभी बच्चों में से लगभग आधे 2 वर्षों के आयु तक सामन्य से कम वजन के हैं अथवा अविकसित है।
  • बच्चों की पोषण स्थिति पर घरेलू सामाजिक-आर्थिक स्थिति का महत्वपूर्ण प्रभाव होता है। कम आय वाले परिवारों में बच्चों में कुपोषण की व्यापकता पर्याप्त रूप से अधिक होती है। मुस्लिम अथवा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के परिवारों के बच्चों में सामान्यतया कम पोषण सूचकांक प्रदर्शित होते हैं।
  • हंगामा रिपोर्ट, 2011 का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि बच्चों के कुपोषण हेतु जन्म के समय वजन एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक है। जन्म के समय 2.5 किग्रा. से कम वजन के बच्चों में से 50 प्रतिशत में सामान्य से कम वजन व्याप्त है। जबकि जन्म के समय 2.5 किग्रा. से अधिक वजन वाले बच्चों में यह 34 प्रतिशत है।
  • हंगामा रिपोर्ट, 2011 में कहा गया है कि माताओं का शैक्षिक स्तर बच्चों के पोषण को निर्धारित करता है। जो माताएँ कुछ पढ़ी-लिखी अथवा साक्षर नहीं होती उनमें बाल- कुपोषण की व्यापकता 45 प्रतिशत तथा 10 वर्ष अथवा उससे अधिक वर्षों की शिक्षा प्राप्त माताओं में 27 प्रतिशत है। रिपोर्ट के अनुसार 92 प्रतिशत माताओं ने कुपोषण शब्द कभी नहीं सुना था।
  • हंगामा सर्वेक्षण के दौरान एक अन्य महत्वपूर्ण बात की गयी। उजागर सर्वेक्षण का मानना है कि भारत में आंगनवाड़ी केन्द्र बड़े पैमाने पर हैं, परन्तु हमेशा दक्ष नहीं है। 96 प्रतिशत गाँवों में आंगनवाड़ी केन्द्र हैं। उनमें से 61 प्रतिशत पक्की इमारतों में हैं। आंगनवाड़ी में आने वाली माताओं दव्ारा ली जाने वाली सेवाओं में सर्वाधिक अनुपात (86 प्रतिशत) टीकाकरण का है। केवल 19 प्रतिशत माताओं ने कहा कि आंगनवाड़ी केन्द्र माता-पिता को पोषण संबंधी परामर्श उपलब्ध कराता है।
  • सर्वेक्षण का निष्कर्ष है कि नवजात को माँ का दूध अथवा बच्चे के जन्म के पहले 6 महीनों के दौरान केवल स्तनपान सामान्यतया नहीं अपनाया जाता। हंगामा सर्वेक्षण में स्पष्ट किया गया है कि 51 प्रतिशत माताओं ने अपने नवजात शिशु को जन्म के तुरंत बाद नवदुग्ध (Colostrums) नहीं दिया तथा 58 प्रतिशत माताओं ने अपने शिशुओं के जन्म के 6 माह बाद तक पानी पिलाया।
  • हंगामा रिपोर्ट का एक अन्य महत्वूपर्ण निष्कर्ष यह है कि लड़कों की तुलना में लड़कियों के पोषण का लाभ समय के साथ फीका पड़ जाता है। अपने जीवन के पहले कुछ महीनों में लड़कों की अपेक्षा लड़कियों को प्राप्त पोषण लाभ आयु वृद्धि होने पर समय के साथ उल्टा होता प्रतीत होता है। इस प्रकार लड़के-लड़कियों में भेद किया जाता है।

भारत में बच्चों व महिलाओं को कुपोषण से बचाने की रणनीति (Strategy Towards Safeguarding Children and Women from Malnutrition in India)

भारत में शिशु सुरक्षा व मातृ सुरक्षा के समक्ष कुपोषण एक बड़ी चुनौती के रूप में विद्यमान है। मध्य प्रदेश की कुछ जनजातियों (गोंड आदि) में तो बच्चों में कुपोषण की दर 80 प्रतिशत तक है। भारत सरकार व अनेक राज्य सरकारों ने भारत में बच्चों व महिलाओं को कुपोषण से बचाने की योजनाएँ बनायी हैं जिनमें कुछ प्रमुख निम्नवत्‌ हैं-

वर्ष 2012 को टीकाकरण वर्ष घोषित करना-भारत ने वर्ष 2012 को सामान्य टीकाकरण को तेज करने के वर्ष के रूप में घोषित किया। वर्तमान में पूर्व टीकाकरण दायरे में 61 प्रतिशत बच्चों को शामिल किया गया है। इस अभियान का मुख्य लक्ष्य पूर्व टीकाकरण दायरे में सुधार करना और सभी बच्चों, खासतौर पर सुदूर दुर्गम और पिछड़े क्षेत्रों के साथ-साथ शहरी मलिन बस्तियों में रहने वाले बच्चों तक पहुँच बनाना है। खसरा, हेपेटाइटिस बी और पाँच रोगों से बचाव के लिए टीकाकरण की दूसरी खुराक की शुरुआत कर भारत सरकार ने सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम (UIP) का भी विस्तार किया है। टीकाकरण सेवाओं को हर बच्चे तक पहुँचाने के लिए वेब आधारित एक ट्रैकिंग प्रणाली की शुरूआत की गई है, जिसमें 10 मिलियन से भी अधिक बच्चों का डाटाबेस है। अगले एक वर्ष के भीतर टीकाकरण दायरे में महत्वपूर्ण सुधार होने की उम्मीद है और इसमें टीकाकरण दायरे में सही समय पर रिपोर्ट करने में सुविधा होगी।

उल्लेखनीय है कि भारत में टीकाकरण का अभाव, कुपोषण जैसी स्थितियों के चलते भारत में शिशु मृत्यु दर की स्थितियाँ अत्यधिक गंभीर रूप धारण कर चुकी हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन और बच्चों के लिए काम करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘सेव द चिल्ड्रेन’ दव्ारा जारी संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार भारत में नवजात शिशु मृत्यु दर पूरे विश्व में सबसे ज्यादा है। इस रिपोर्ट के मूल निष्कर्ष निम्नवत्‌ हैं-

  • विश्व में नवजात शिशु की मौत के अधिकांश मामले विकासशील देशों से आते हैं। वर्ष 2009 में पूरे विश्व में आधे से अधिक नवजात शिशुओं की मृत्यु 5 देशों भारत, नाइजीरिया, पाकिस्तान, चीन और कांगों में हुई है।
  • भारत में यह आँकड़ा सबसे ज्यादा पाया गया है जहाँ वर्ष 2009 में विश्व में होने वाली कुल नवजात शिशुओं मृत्यु के 28 प्रतिशत मामले दर्ज किए गए हैं।
  • भारत में जहाँ 1990 में 1000 नवजात शिशुओं में से 49 की मृत्यु हो गई, वहीं 2009 में यह दर गिरकर 34 पर पहुँच गयी।
  • रिपोर्ट के निष्कर्ष में कहा गया है कि यदि सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों को प्राप्त करना है, तो नवजात शिशु मृत्यु दर के मुद्दे को ज्यादा गंभीरता से समझने की आवश्यकता है।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन के आँकड़ों के अनुसार भारत में वर्ष 1990 में जहाँ 13 लाख से ज्यादा नवजात शिशुओं की मौत हुई वहीं वर्ष 2009 में 9 लाख मौत दर्ज की गयी है।
  • ‘सेव द चिल्ड्रेन’ दव्ारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, प्रत्येक वर्ष 80 लाख से ज्यादा बच्चे अपने 5वें जन्मदिन से पहले अपनी जान गंवा देते हैं और इनमें से ज्यादा बच्चे अपने 5वें जन्मदिन से पहले अपनी जान गंवा देते हैं और इनमें से ज्यादा मौतें विकासशील देशों मेंं होती हैं, जहाँ बीमारियों का इलाज लोगों को उपलब्ध नहीं हो पाता।
  • नवजात शिशुओं की बात की जाए, तो उनके स्वास्थ्य पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
  • रिपोर्ट का कहना है कि वर्ष 2000 में विश्व भर के देशों ने संकल्प लिया था कि वे वर्ष 2015 तक बाल मृत्युदर में सार्थक कमी लाने की कोशिश करेंगे। हालाँकि विगत कुछ वर्षों में बाल मृत्यु दर में कमी आई है, लेकिन सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों को पूरा करने के लिए ये पर्याप्त नहीं हैं।

भारत में भूखमरी की स्थिति से निपटने से संबंधित कार्यक्रम/योजनाएँ (Programmes/Schemes Related to Dealing with Situation of Hunger in India)

  • ग्रामीण खाद्यान्न बैंक योजना- जनजातीय ग्रामों में खाद्यान्न बैंकों की केन्द्र दव्ारा प्रायोजित योजना की शुरूआत 1996 - 97 के दौरान जनजातीय कार्य मंत्रालय दव्ारा 11 राज्यों में की गयी थी। हाल ही में यह योजना जनजातीय कार्य मंत्रालय से खाद्य सार्वजनिक वितरण एवं उपभोक्ता मामलें मंत्रालय को स्थानांतरित की गई है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य प्राकृतिक आपदा या अकाल के दौरान भूखमरी के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करना हैं। खाद्यान्न बैंकों की स्थापना सूखा प्रभावित क्षेत्रों गर्म एवं शीत मरुस्थली क्षेत्रों जैसे खाद्यान्न संकट वाले क्षेत्रों तथा जनजातीय एवं दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में की जाती है। संशोधित स्कीम में सभी इच्छुक गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों को शामिल करने की व्यवस्था है।
  • आपात आहार कार्यक्रम- आपात आहार योजना निर्धनता रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों के वृद्ध अक्षम तथा बेसहारा लोगों को विपत्ति के समय भोजन उपलब्ध कराने की एक खाद्य आधारित पहल (Food Based Imitative) है। यह योजना मई, 2001 में शुरू की गयी थी। इस योजना के अंतर्गत राज्य सरकारों को सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की सिफारिश पर खाद्य एवं सार्वजनिक विभाग दव्ारा मई 2001 से प्रति लाभार्थी 6 किग्रा प्रति माह की दर से खाद्यान्न का आबंटन किया जाता हैं।
  • गेहूँ आधारित पोषाहार कार्यक्रम- यह योजना मानव संसाधन विकास मंत्रालय के महिला एवं बाल विकास विभाग दव्ारा क्रियान्वित की जाती हैं इसके तहत आवंटित खाद्यान्न का उपयोग राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों दव्ारा समेकित बाल विकास योजना के अंतर्गत 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों तथा गर्भवती/दुग्धपान कराने वाली माताओं को पोषक आहार दिलाने में किया जाता है।
  • छात्रावासों/कल्याण संस्थानों को खाद्यान्न आपूर्ति योजना- इस योजना की शुरूआत वर्ष 2002 - 03 में की गई थी। इस योजना के तहत आश्रयहीन अथवा बेघर या लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली या किसी अन्य कल्याण योजना के तहत व आने वाली अन्य श्रेणियों की मदद करने वाले छात्रावासों/गैर सरकारी संगठनों या धर्मार्थ संस्थानों जैसे कल्याणकारी संस्थानों की आवश्यकता की पूर्ति के लिए प्रति राज्य/केन्द्र शासित प्रदेशों को मिलने वाले बीपीएल आबंटन से पाँच प्रतिशत अधिक खाद्यान्न बीपीएल दरों पर राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों को दिया जाता हैं संसदीय स्थायी समिति के निर्देशों के अनुसार, इस स्कीम के अंतर्गत पिछले तीन वर्षों के दौरान खाद्यान्नों के औसत वृद्धि के आधार पर आबंटन की समीक्षा कर उन्हें युक्तिसंगत बनाया गया था।
  • मिड डे मील योजना- मिड डे मील योजना मानव संसाधन मंत्रालय के शिक्षा विभाग दव्ारा 15 अगस्त, 1995 को शुरू की गई थी। इस योजना के तहत प्रति स्कूल दिवस कम से कम 200 दिन न्यूनतम 300 कैलोरी और 8 - 12 ग्राम प्रोटीन वाला पका/तैयार गर्म भोजन दिया जाता है। वहाँ हर बच्चे को प्रतिदिन 100 ग्राम खाद्यान्न (गेहूँ और चावल) दिया जाता है और जहाँ खाद्यान्न वितरित किया जाता है वहाँ 3 क्रि. ग्रा. प्रतिमाह प्रति छात्र के हिसाब से एक साल में 9 - 11 महीने अनाज दिया जाता है। सूखा पीड़ित क्षेत्रों में मध्याह्‌ भोजन गर्मी की छुट्‌िटयों में भी दिया जाता है।
  • अंत्योदय अन्नन योजना-लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली को प्रभावी बनाने के लिए केन्द्र सरकार दव्ारा निर्धनों में भी निर्धनतम व्यक्तियों के लिए 25 दिसंबर 2000 को अंत्योदय अन्न योजना की शुरूआत की गई थी। अंत्योदन परिवारों की पहचान एवं इन परिवारों को विशिष्ट राशन कार्ड जारी करने की जिम्मेदारी राज्य/केन्द्र शासित प्रदेश की है। अंत्योदय अन्न योजना के अंतर्गत प्रत्येक पात्र परिवार को दो रुपये प्रति किग्रा. गेहूँ तथा तीन रुपये प्रति किग्रा. चावल की अत्यधिक रियायती दर पर 25 किग्रा. खाद्यान्न उपलब्ध कराये जाने का प्रावधान है। 25 किग्रा. की इस मात्रा को 1 अप्रैल, 2002 से बढ़ाकर 35 किलोग्राम कर दिया गया है।
    • प्रारंभ में देश में लगभग 1 करोड़ अंत्योदय परिवारों की पहचान की गयी। वर्ष 2003 - 04 में सरकार ने अंत्योदन अन्न योजना का विस्तार किया था। इसमें 50 लाख अतिरिक्त बीपीएल परिवारों को शामिल किया। 1 अगस्त, 2004 से अंत्योदन अन्न योजना को ऐसे 50 लाख अतिरिक्त बीपीएल परिवारों तक बढ़ा दिया जो भूखमरी के कगार पर हों। विस्तृत अंत्योदय अन्न योजना के अंतर्गत अतिरिक्त अंत्योदय परिवारों की पहचान के लिए राज्य व केन्द्र शासित प्रदेशों के लिए विस्तृत निर्देश जारी किये गये हैं। इस स्कीम के तहत पहचान किये गये परिवारों को जारी किये गये विशिष्ट राशन कार्डों के आधार पर राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों को खाद्यान्न का आबंटन किया जा रहा है।
  • अन्नपूर्णा योजना-यह योजना ग्रामीण विकास मंत्रालय दव्ारा वर्ष 2001 में शुरू की गई। इसके अंतर्गत 65 वर्ष या उससे अधिक आयु वर्ग के ऐसे असहाय वृद्ध नागरिक आते हैं जो राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना के पात्र तो हैं, परन्तु उन्हें इस योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
    • इस योजना में प्रति व्यक्ति प्रति माह 10 किग्रा. खाद्यान्न नि: शुल्क दिया जाता है। वर्ष 2002 - 03 में यह योजना राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना एवं राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना से मिलकर बने राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम के साथ राज्य योजना को स्थानांतरित कर दी गई है। इस स्थानांतरित योजना के लिए धनराशि वित्त मंत्रालय दव्ारा योजना के लिए अतिरिक्त केन्द्रीय सहायता के रूप में जारी की जा रही है। राज्यों को इस हेतु योजना के कार्यान्वयन तथा लाभार्थियों का चुनाव करने की छूट होगी। जमीनी स्तर पर इस योजना के कार्यान्वयन का जिम्मा राज्यों व केन्द्रशासित प्रदेशों का होगा।
  • राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन- कृषि एवं सहकारिता विभाग, कृषि मंत्रालय का राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन देश में खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से चलाया जा रहा एक केन्द्र प्रायोजित महत्वाकांक्षी कार्यक्रम है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य 11वीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक चावल गेहूँ और दाल के उत्पादन को क्रमश: 10 मिलियन टन, 8 मिलियन टन और 2 मिलियन टन बढ़ाना था।
    • राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन का परिव्यय 4882.5 करोड़ है। इस मिशन के अंतर्गत 2 करोड रुपये राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के तहत दो या अधिक फसलों को अपनाने वाले जिलों को और 1 करोड़ रुपये एक फसल अपनाने वाले जिलों को कृषि उत्पादन में वृद्धि हेतु प्रदान किया जाएगा। इसके साथ ही उन्नत कृषि तकनीकों और अवसरंचना का विकास, विपणन सुविधा एवं कृषकों को प्रोत्साहन देने की नीति अपनाई गई है।

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