Public Administration: Transparent Safeguards in MGNREGA

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स्रकारी न्ीतियज्ञें और विभिन्न क्ष्ज्ञेत्रज्ञें म्ें थ्वकास क्े थ्लए हस्तक्ष्ज्ञेप और डनके अभिकल्पन तथा कर्यान्वयन् क्े करण्ज्ञ उत्पन्न थ्वषय (Government Policies and Interventions for Development in Various Sectors and Issues Arising Out of Their Design and Implementation)

मनरेगा म्ें परदर्शी श्रक्ष्ज्ञोपाय (Transparent Safeguards in MGNREGA)

  • जॉब कार्डस, प्रामाणिक दैनिक श्रमिक पंजियों के रखरखाव, राज्य सरकारों दव्ारा दैनिक पंजियों के 100 प्रतिशत सत्यापन के अनवरत अभियानों, बाहरी एजेंसियों दव्ारा दैनिक पंजियों का आकस्मिक नमूना लेकर सत्यापन तथा उन्हें मनरेगा वेबसाइट पर डाले जाने से पारदर्शी रक्षोपाय की व्यवस्था करना सिद्धांत रूप से तय है मजूदरी का पारदर्शी भुगतान सुनिश्चित करने के काम को बैंको और डाकघरों में मजदूरों के बचत खातों के माध्यम से भुगतान की व्यवस्था करके प्रोत्साहित किया जाता है एवं लघु बचतों के लिए उन्हें प्रोत्साहन राशि भी दी जा रही है।
  • इसके लिए प्रबंधन सूचना प्रणाली (MIS) विकसित की गई हैै। www.nrega.nic.in नामक वेबसाइट नेटवर्क ऑन-लाइन निगरानी तथा प्रबंधन, आकँड़ों में पारदर्शिता तथा सभी तरह की जानकारियाँ आम लोगों को पाने में सुगमता की दृष्टि से विकसित किया गया है। इससे आँकड़े पारदर्शी तरीके से आम लोगों को सुलभ हो जाते हैं और समान रूप से सभी लोग इन्हें प्राप्त कर सकते हैं। ग्राम स्तरीय परिवार संबंधी आँकड़ों के आधार की आंतरिक जाँच की व्यवस्था की गई है ताकि उन्हें प्रामाणिक प्रक्रिया के अनुरूप रखा जा सके।
  • नियमित निगरानी की प्रक्रिया के तहत बाहरी एवं आंतरिक एजेंसियों दव्ारा कार्यस्थलों पर जाकर सत्यापन का काम किया जा रहा है। केन्द्रीय रोज़गार गारंटी परिषदों का गठन भी किया जा चुका है।
    • मनरेगा में सामाजिक लेखा परीक्षण-महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून की एक विशिष्ट विशेषता यह है कि यह मनरेगा की धारा 17 के तहत सख्त जन निगरानी के लिए सामाजिक लेखापरीक्षण (Social Auditing) को केन्द्रीय भूमिका प्रदान करता है। इसके मूल उद्देश्य परियोजनाओं, कानून एवं नीतियों पर अमल में सार्वजनिक जवाबदेही सुनिश्चित करना है। सामाजिक लेखा परीक्षण सरकारी मूल्यांकन के साथ-साथ समानांतर लोक जवाबदेह प्रणाली तथा प्रबंधन सूचना प्रणाली (MIS) की भी व्यवस्था है। सामाजिक लेखा परीक्षण योजना की पारदर्शी प्रक्रिया के लिए मार्ग निर्मित करता है। यह उपलब्धि ही है कि सहभागिता की प्रक्रिया वाले किसी सरकारी कार्यक्रम में पहली बार पारदर्शिता एवं जवाबदेहिता संभव हो पाई है। यह सामाजिक लेखापरीक्षण का ही प्रत्यक्ष परिणाम है, जिसके संचालन को सूचना प्राप्ति के अधिकार के तहत संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई है। इस तरह सामाजिक लेखापरीक्षण के फलस्वरूप ऐसे अनेक अविश्वसनीय उदाहरण कायम हुए हैं जिनसे पता चलता है कि गाँव-गाँव में भ्रष्ट अधिकारियों को वह राशि वापस करनी पड़ी है जिसका उन्होंने गबन कर लिया था। अधिकतर ऐसे उदाहरण आंध्र प्रदेश में देखने में आये हैं, जहाँ सामाजिक लेखापरीक्षण को इस कार्यक्रम पर अमल का अभिन्न हिस्सा बना दिया गया।
    • सर्व शिक्षा अभियान (SSA) -गरीबों तथा शिक्षों के बीच पाये जाने वाले उच्च सहसंबंध या गरीबी-निवारण में अशिक्षा को सबसे प्रमुख अवरोधक तत्व मानने के कारण और साथ ही शिक्षा की प्रबल अग्रगामी तथा पश्चगामी कड़ियों (Forward and Backward Linkages) को दृष्टिगत रखते हुए भारत सरकार ने 2001 में सर्व शिक्षा अभियान को लागू किया जिसके संबंध में प्रतिवर्ष 9,000 करोड़ रुपये आबंटित किए गए। 2011 - 12 के बजट में इसके लिए 15000 करोड़ रुपये आबंटित किए गए।

इस योजना का मुख्य उद्देश्य 2012 तक 6 से 14 वर्ष की आयु तक के सभी बच्चों को 8वीं तक संतोषजनक, गुणत्तापूर्ण एवं नि: शुल्क शिक्षा प्रदान करना था। इस योजना की वित्तीय व्यवस्था के संबंध में यह निर्णय लिया गया कि 9वीं योजना के दौरान (1997 - 2002) केन्द्र सरकार तथा राज्य सरकार 85: 15 के अनुपात में इसके वित्तीय बोझ को वहन करेंगी। दसवीं योजना में (2002 - 07) इस अनुपात को 75: 25 तथा उसके पश्चात्‌ इसे 50: 50 कर दिया गया था। उल्लेखनीय है कि ‘सभी को शिक्षा’ उपलब्ध कराने की दिशा में यूनेस्कों ने 2015 तक की सीमा निर्धारित की थी, पर भारत में इसे 2010 ही रखा गया है। इस समय सर्व शिक्षा अभियान सभी राज्यों तथा केन्द्र प्रशासित प्रदेशों में लागू हैं। सर्व शिक्षा अभियान के हस्तक्षेप के कारण विद्यालय छोड़ने वाले बच्चों की संख्या में अत्यधिक कमी आयी है।

केन्द्र तथा राज्य सरकार की भागीदारी में चल रहे सर्व शिक्षा अभियान के प्रमुख उद्देश्य निम्नांकित हैं-

  • 2005 तक सभी बच्चों का स्कूल या ऐसी समकक्ष संस्थाओं में नामांकन सुनिश्चित करना।
  • 2010 तक सभी बच्चों को उच्चतर प्राथमिक शिक्षा पूरी होने तक विद्यालय में बनाये रखना।
  • नामाकंन, स्कूल में बनाये रखने तथा शिक्षा में लैंगिक तथा सामाजिक अंतराल में कमी लाना।
  • प्राथमिक और उच्चतर प्राथमिक विद्यालयी शिक्षा की उपलब्धि के स्तर को ऊपर उठाना।

राष्ट्रीय ग््रमाीण्ज्ञ स्वास्थ्य थ्मश्ज्ञन (National Rural Health Mission)

  • ग्रामीण क्षेत्र में स्वास्थ्य सुरक्षा में केन्द्र सरकार के हस्तक्षेप की प्रमुख स्थिति के चलते ही भारत मानव विकास के संकेतकों व सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में अपेक्षानुरूप सफल नहीं हो पाया है। इसी बात को ध्यान में रखकर 12 अप्रैल, 2005 को यह मिशन प्रारंभ हुआ। इसका प्रमुख उद्देश्य पूर्णतया कार्य कर रही, सामुदायिक स्वामित्व की विकेन्द्रित स्वास्थ्य प्रदान करने वाली ग्रामीण प्रणाली विकसित करना है। यह ग्रामीण क्षेत्रों में सरलता से पहुँचने वाली, वहनीय (Affordable) और जवाबदेही वाली गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराने से सबंधित है।
  • राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन सभी स्तरों पर चल रही लोक स्वास्थ्य सुपुर्दगी प्रणाली को मजबूत बनाने के साथ-साथ विद्यमान सभी कार्यक्रमों जैसे आर. सी. एच-11, प्रजनन बाल स्वास्थ्य योजना, एकीकृत रोग निगरानी तथा मलेरिया, कालाजार, तपेदिक तथा कुष्ठता उपचार के लिए अन्य कार्यक्रमों के लिए एक ही स्थान पर सभी सुविधाएँ प्रदान कराने से संबंधित है।
  • बाल मृत्यु दर में कटौती उसे प्रति 1000 जीवित जन्मों पर 30 से नीचे लाना और सकल प्रजनन दर (TFR) को 2012 तक 2.1 तक लाना इस मिशन का महत्वपूर्ण लक्ष्य है। यह योजना पूरे देश विशेष रूप से 18 राज्यों में जिनमें स्वास्थ्य अधोसंरचना (Infrastructure) अत्यंत ही दयनीय तथा स्वास्थ्य संकेतक नीचे हैं, में लागू है। यह मिशन विशेष रूप से ग्रामीण गरीबों तथा कमजोर वर्ग को सस्ती, प्रभावपूर्ण तथा विश्वसनीय प्राथमिक स्वास्थ्य देखरेख सुविधाएँ सुनिश्चित कराने से संबंधित है। इस दिशा में इस सेवा में लगी प्रशिक्षित आशा (Accredited Social Health Activists) कार्यकर्ता की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। लगभग 1000 ग्रामीण जनसंख्या पर 1 आशा कार्यकर्ता है।
  • 12वीं पंचवर्षीय योजना व राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन-12वीं पंचवर्षीय योजना में ग्रामीण स्वास्थ्य व उससे जुड़े पहलुओं के संदर्भ में कार्यनीतियों को परिभाषित करने में सहायता प्रदान करने के लिए योजना आयोग ने प्रोफेसर के श्री नाथ रेड्‌डी की अध्यक्षता में व्यापक स्वास्थ्य कवरेज पर उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समूह गठित किया है।
  • 12वीं पंचवर्षीय योजना व राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत मौजूदा सभी राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों अर्थात मानसिक स्वास्थ्य, एड्‌स नियंत्रण, बधिरता नियंत्रण, सूचना, शिक्षा एवं संप्रेषण, कैंसर नियंत्रण, तंबाकू नियंत्रण, हृदय वाहिका रोग, मुखीय स्वास्थ्य, फ्लूरोसिस, मानव रेबीज नियंत्रण, लेप्टोसपिरोसिस संबंधी कार्यक्रमों के बीच समाभिरूपता (Homogeneity) को प्राथमिकता दी जाएगी।
  • 12वीं पंचवर्षीय योजना के दृष्टिकोण प्रपत्र में कहा गया है कि इस योजना का उद्देश्य प्रत्येक पंचायत में एक स्वास्थ्य उपकेन्द्र और प्रत्येक निवास स्थान में एक आँगनबाड़ी केन्द्र स्थापित होना चाहिए तथा उनका औपचारिक अंतरसंबंध स्वास्थ्य पोषण एवं स्कूल-पूर्व शिक्षा सेवाएँ प्रदान करने की व्यवस्था को एकीकृत करने के लिए आवश्यक होना चाहिए।

राष्ट्रीय क्थ्षृ थ्वकास यज्ञेजना (National Agriculture Development Scheme)

यह भारत सरकार का एक महत्वपूर्ण फ्लैगशिप कार्यक्रम है और भारत में कृषि व सहकारिता की दिशा में कार्य करने हेतु निर्मित है। इस योजना को 18 सितंबर, 2007 से लागू किया गया। 11वीं पंचवर्षीय योजना में चालू होने वाली 25 हजार करोड़ रुपये की राष्ट्रीय कृषि विकास योजना कृषि मंत्रालय के कृषि तथा सहकारिता विभाग दव्ारा चलायी जा रही है। यह एक 100 प्रतिशत केन्द्रीय सहायता प्राप्त योजना है, जिसका प्रमुख उद्देश्य राज्यों को कृषि तथा कृषि संबंद्ध क्षेत्रों में विनियोग के लिए प्रेरणा देना है जिससे 11 वीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक कृषि में कम से कम 4 प्रतिशत की विकास दर प्राप्त हो सकें

राष्ट्रीय कृषि विकास योजना की विशेषताएँ अथवा प्रावधान- राष्ट्रीय कृषि विकास योजना देश में कृषि क्षेत्र के सुदृढ़ीकरण के उद्देश्य से प्रेरित है। इस योजना की मुख्य विशेषताएँ निम्नवत हैं-

  • इस योजना का मुख्य उद्देश्य कृषि तथा संबद्ध क्षेत्रों में कम होते हुए निवेश, जीडीपी में कृषि के कम होते हुए अंश तथा किसानों की आय में वृद्धि करना है।
  • यह एक केन्द्र समर्थित स्कीम है, जिसके लिए केन्द्र सरकार से 100 प्रतिशत अनुदान प्राप्त होगा। यह योजना जून, 2008 से उत्तर प्रदेश में लागू हुई। यह राज्य योजना के अंतर्गत चलने वाली स्कीम है।
  • इस योजना के लिए पिछले तीन वर्षो में राज्य दव्ारा किये गये औसत व्यय के आधार पर राज्य दव्ारा किये जाने वाले व्यय का निर्धारण होगा।
  • कृषि संबद्ध क्षेत्रों के अंतर्गत क्रॉप हसबैन्ड्री जिसमें हॉर्टीकल्चर भी शामिल है, पशुपालन, कृषि शोध तथा शिक्षा, कृषि विपणन, खाद्य भंडारण, मृदा तथा जल संरक्षण, कृषि वित्तीय संस्थाएँ तथा कृषि कार्यक्रम तथा सहकारिता सम्मिलित हैं।
  • इसके अंतर्गत राज्य की अर्हता तथा उसका वित्तीय आवंटन योजना आयोग दव्ारा होगा।
  • इस कार्य के लिए राज्य कृषि विभाग नोडल विभाग के रूप में कार्य करेगा। उल्लेखनीय है कि 11वीं पंचवर्षीय योजना अवधि के लिए इस योजना के प्रचलन के लिए 18,550 करोड़ रुपये आबंटित किए गए थे। इस योजना के लिए वर्ष 2007 - 08 के लिए 1500 करोड़ रुपये आबंटित किए गए थे।
  • राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अंतर्गत संसाधनों का आबंटन तीन कसौटियों पर निर्भर करता है-
    • असिंचित क्षेत्रफल का अनुपात -20 प्रतिशत
    • 11वीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक सकल राज्य घरेलू उत्पाद की प्रक्षेपित वृद्धि दर-30 प्रतिशत
    • कृषि तथा संबद्ध क्षेत्र में कुल योजनागत व्यय में वृद्धि-50 प्रतिशत

वस्तुत: राष्ट्रीय कृषि विकास योजना इस धारणा पर आधरित है कि कृषि विकास आर्थिक विकास का सशक्त माध्यम बन सकता है। इसलिए संस्थागत व प्रकार्यात्मक (Structural and Functional) स्तरों पर कृषि विकास की समग्र रणनीति का विकास अवधारणीय अर्थव्यवस्था (Sustainable Economy) की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

Iz/Kkuea = H Xzke lM + D; Kstuk (PGSY)

  • प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना भारत सरकार की फ्लैगशिप योजना है, जो देश में अवसरंचनात्मक विकास (Infrastructure Development) विशेषकर सड़कों के विकास के लक्ष्य से प्रेरित है। यह भारत निर्माण योजना के महत्वपूर्ण संघटक ‘सड़क’ के विकास में अपनी भूमिका निभाकर इस योजना को सहायता प्रदान करती है।
  • प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना 25 दिसंबर, 2000 को प्रारंभ की गयी थी। 60 हजार करोड़ रु. की इस योजना का उद्देश्य 500 से अधिक जनसंख्या वाले गाँवों को 2007 तक हर मौसमी सड़क से जोड़ना था। ग्रामीण विकास मंत्रालय इस दिशा में यह सुनिश्चित करता है कि पर्वतीय व आदिवासी/जनजातीय बाहुल्य क्षेत्रों में सड़क निर्माण की शर्त 500 से अधिक जनसंख्या का न होना तथा मैदानी भागों के लिए यह जनसंख्या 1,000 होनी चाहिए। इस योजना के तहत वर्ष 2009 तक इन क्षेत्रों में सड़कों के निर्माण का लक्ष्य रखा गया। ऐसा माना गया कि ग्रामीण विकास मंत्रालय की पहल व प्रयासों से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी क्योंकि सड़कों के चलते उत्पादन बाजारों व सेवाओं से जुड़ सकेगा। यह एक 100 प्रतिशत केन्द्र प्रायोजित योजना है और इसका वित्त पोषण डीजल पर उपकर से होता है।
  • मूल्यांकन की दृष्टि से देखा जाए तो इस योजना में कई विसंगतियाँ विद्यमान हैं। निधि (Fund) के उपयोग में कमी व प्रक्रियात्मक विलंबों व समय पर लक्ष्यों को प्राप्त न कर पाने के उदाहरण सामने आये हैं। सड़कों के निर्माण की गुणवत्ता पर भी प्रश्नचिन्ह उठाये गये हैं। आबंटित वित्त का सही प्रयोग न होने के चलते भ्रष्टाचार जैसी समस्या से भी यह योजना मुक्त नहीं रही है।

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