Public Administration: Unorganised Workers Social Security Act, 2008

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भारत में श्रमिकों की बेहतरी और संरक्षण के लिए तंत्र, कानून, संस्थायें और संवैधानिक निकाय (Mechanism, Laws, Institutions and Constitutional Bodies for the Betterment and Protection of Labourers in India)

असंगठित कामगार सामाजिक सुरक्षा अधिनियम, 2008 (Unorganised Workers Social Security Act, 2008)

  • असंगठित कामगार से तात्पर्य एक गृह आधारित कामगार, स्व-रोजगार में कार्यरत कामगार अथवा असंगठित क्षेत्र के वैतनिक मजदूर से है। असंगठित क्षेत्र का अर्थ व्यक्तियों के मालिकाना हक वाले उद्यम से अथवा स्वरोजगार में शामिल मजदूरों से है जो किसी वस्तु के उत्पादन या बिक्री में लगे हो या ऐसी कोई प्रकार की सेवा दे रहे हों, तथा उद्यम के कामगारों की संख्या 10 से कम है।
  • सरकार ने बीड़ी, गैर-कोयला खानों और खानों में काम करने वाले मजदूरों का कल्याण सुनिश्चित करने हेतु “कल्याण कोष” की स्थापना की है। इस कोष का प्रयोग इन कामगारों को इनके बच्चों की शिक्षा, मनोरंन साधन, स्वास्थ्य व चिकित्सा सुविधाओं, मकान निर्माण आदि कार्यों में वित्तीय मदद देने के लिए होता है।
  • अधिनियम ने केंद्र स्तर पर राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड तथा राज्य स्तर पर राज्य सामाजिक सुरक्षा बोर्ड के गठन का प्रावधान है, जिनका कार्य असंगठित क्षेत्र के कामगारों हेतु सामाजिक सुरक्षा योजना निर्माण के लिए सुझाव देना होगा। राष्ट्रीय बोर्ड का कार्य जीवन और अक्षमता सहायता, स्वास्थ्य और मातृत्व लाभ, वृद्धजन संरक्षण और केंद्र सरकार दव्ारा निर्धारित किया गया कोई अन्य लाभ जैसे क्षेत्रों में सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की सिफारिश करना होगा। इसी प्रकार राज्य स्तरीय बोर्ड भविष्य निधि, रोजगार क्षति लाभ, आवास, बच्चों के लिए शिक्षा योजनाओं, कामगारों के कौशल उन्नयन, अंतिम संस्कार सहायता और क्षेत्रों में कल्याणकारी योजनाओं की सिफारिश करेगा।
  • अधिनियम की धारा 5 में केंद्रीय श्राम व रोजगार मंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड के गठन का प्रावधान है जिसमें सदस्य सचिव और 34 मनोनीत सदस्य होंगे जो संसद सदस्यों असंगठित क्षेत्रों के कामगारों नागरिक समाज, केंद्रीय मंत्रालयो व राज्य सरकारों का प्रतिनिधित्व करेंगे।
  • अधिनियम की धारा 8 के तहत, जिला प्रशासन इससे संबंधित सारा ब्यौरा रखने का काम करेगा। इसके लिए राज्य सरकारें, (क) ग्रामीण क्षेत्रों में जिला पंचायतों और (ख) शहरी क्षेत्रो में शहरी स्थानीय निकायों को निर्देशित करेंगी।
  • अधिनियम की धारा 9 कामगारों के लिए सुवधा केंद्रो के गठन का प्रावधान करती है ताकि (क) उन केंद्रो के पास उपलब्ध सामाजिक सुरक्षा योजना सम्बन्ध सूचनाएँ प्रचारित की जाएँ और (ख) कामगारों को जिला प्रशासन से पंजीकरण कराए जाने की सुविधा मिले ओर असंगठित कामगारों के नामांकन की सुविधा उपलब्ध हो सके।

औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (Industrial Disputes Act, 1947)

  • यह अधिनियम औद्योगिक विवादों की जाँच और निस्तारण हेतु तंत्र और क्रियाविधि प्रदान करता है। इसमें संशोधन करके औद्योगिक विवाद (संशोधन) अधिनियम 2010 पारित किया गया है।
  • स्शााेंधन अधिनियम 20 या इससे अधिक मजदूरों वाले औद्योगिक संस्थानों में वैधानिक रूप से एक शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करने का प्रावधान करता है।
  • स्शााेंधित अधिनियम में श्रम न्यायालयों/न्यायाधिकारणों के “पीठासन अधिकारियों” के योग्यता क्षेत्र का विस्तार करने के लिए उप मुख्य श्रम आयुक्त रैंक के केंद्रीय श्रम सेवा अधिकारियों और भारतीय विधि सेवा (ग्रेड III) के अधिकारियों को इस पद पर नियुक्त करने का प्रावधान भी है।
  • संशोधित अधिनियम श्रम न्यायालय या न्यायाधिकरण को यह शक्ति देता है कि वे अपने निर्णयों को दीवानी न्यायालय (Civil Court) के निर्णयों के समान ही लागू करें ताकि बेहतर और अधिक प्रभावी निर्णय दिया जा सके।

कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923 (The Employees Compensation Act, 1923)

  • इस अधिनियम का नामकरण वर्कमैन मुआवजा (संशोधन) विधेयक, 2009 के आधार पर किया गया है, जिसे लोकसभा में 7 अगस्त, 2009 श्रम और रोजगार मंत्रालय ने प्रस्तुत किया था।
  • यह विधेयक कामगार मुआवजा अधिनियम, 1923 में संशोधन करता है, जिसमें औद्योगिक दुर्घटनाओं में शारीरिक क्षति या मृत्यु होने पर श्रमिकों व उनके आश्रितों को मुआवजा देने का प्रावधान है। अधनियम विशेष समूह के लोगों जैसे कारखानों, खानों व रोपण कृषि में कार्यरत लोगों पर लागू होता है।
  • विधेयक मे ‘वर्कमैन’ शब्द को ‘कर्मचारी’ शब्द दव्ारा प्रतिस्थापित किया गया है ताकि कानून सभी कर्मचारियों पर लागू हो सके और वह लैंगिक भेदभाव न करें। कामगारों की परिभाषा में शामिल लोगों की सूची में विस्तार करने के लिए भी इस विधेयक में संशोधन किया गया है। उदाहरण के लिए, अधिनियम में केवल वे लोग शामिल थे जो किसी स्थान पर किसी वस्तु की मरम्मत आदि का काम करते हैं तथा जिनकी संख्या 20 से अधिक हो। विधेयक में 20 कर्मचारियों वाले इस प्रावधान को हटाने तथा ऐसे कार्य में शामिल सभी कर्मचारियों को शामिल करने का प्रस्ताव है।
  • विधेयक केन्द्र सरकार को समय-समय पर मासिक वेतन में संशोधन की अनुमति देता है। रोजगार के दौरान शारीरिक क्षति होने या चिकित्सा सुविधा लेने की दशा में कर्मचारी को वित्तीय मदद मिलेगी।
  • राज्य सरकार कर्मचारी मुआवजा देने के लिए किसी व्यक्ति को “आयुक्त” के रूप में नियुक्त कर सकती है। विधेयक में ऐसा कहा गया है कि इस व्यक्ति को न्यूनतम 5 वर्षों से राज्य न्यायिक सेवा का सदस्य होना अथवा न्यूनतम 5 वर्ष से राजपत्रित अधिकारी होना चाहिए।
  • आयुक्त मुआवजे वाले मामलों के संदर्भित तिथि के 3 महीने के भीतर निपटाएगा।

कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 (The Employees State Insurance Act, 1948)

  • कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 उन गैर -मौसमी कारखानों पर लागू होता है जो ऊर्जा की खपत करते हैं और जिनमें 10 या अधिक कर्मचारी हैं तथा यह ऊर्जा का प्रयोग न करने वाले कारखानों पर भी लागू होता है जिसमें 20 या अधिक कर्मचारी हैं।
  • अधिनियम चिकित्सकीय सुविधा प्रदान करता है तथा बीमारी मातृत्व और कार्य करने के दौरान शारीरिक क्षति पर नकद लाभ देता है और कार्य करने के दौरान शारीरिक क्षति के कारण मृत्यु होने की दशा में आश्रितों के लिए पेंशन का भी प्रावधान है।
  • 1.4. 2205 को लागू राजीव गांधी श्रमिक कल्याण योजना के अधीन, बीमित व्यक्ति को अधिकतम 12 माह के लिए बेरोजगारी भत्ता दिया जाएगा।
  • अधिनियम के अधीन दिये गए मुख्य लाभ हैं- बीमित व्यक्ति के पूरे परिवार हेतु चिकित्सकीय सुविधा, बीमारी के कारण हुए वेतन के नुकसान हेतु नकद मुआवजा, कार्य के दौरान शारीरिक क्षति के कारण मृत्यु होने पर आश्रितों को समय-समय पर भुगतान, बीमित महिला को मातृत्व लाभ और अंतिम संस्कार के लिए खर्चें।

पथ विक्रेता (जीविका का संरक्षण और पथ विक्रय का विनियमन) विधेयक, 2012 (The Street Vendors (Protection of Livelihood and Regulation of Street Vending) Bill, 2012)

  • पथ विक्रेता (जीविका का संरक्षण और पथ विक्रय का विनियमन) को 6 सितंबर, 2012 को लोक सभा में प्रस्तावित किया गया।
  • विधेयक में प्रत्येक पथ विक्रेता को शहरी विक्रय समिति में पंजीकरण कराने का प्रावधान है। विधेयक में पथ विक्रेता की न्यूनतम आयु 14 वर्ष निर्धारित की गई है।
  • पथ विक्रेता की परिभाषा में ‘वे व्यक्ति शामिल हैं जो वस्तु, सामान, सामग्री आदि बेचते हैं या आम जनता को सड़क, गली, फुटपाथ, सड़क किनारे, सार्वजनिक पार्को आदि में सेवायें देते है।’
  • विधेयक में यह प्रावधान है कि विक्रय प्रमाणपत्र के बिना कोई भी सड़क पर बिक्री नहीं कर सकता।
  • संबंधित सरकार को एक पथ विक्रय योजना बनानी चाहिए। इस योजना में ये प्रावधान भी हैं-
    • पंजीकरण के लिए आवेदन का तरीका
    • समयावधि जिसमें निर्णय लिया जाएगा
    • विक्रय प्रमाणपत्र से संबद्ध कोई और दशा।
  • विधेयक स्थानीय संस्था को यह शक्ति देती है कि वे पथ विक्रेताओं को पुनर्स्थापित (Relocate) कर सकें। संस्था ऐसा कदम तब भी उठा सकती है जब उसे लगे कि पथ विक्रेता सार्वजनिक जगहों पर समस्यायें पैदा कर रहे हैं अथवा जनता के आवागमन में बाधा डाल रहे हैं। एक पंजीकृत पथ विक्रेता को यदि पुनर्स्थापित किया गया है तो उसे विक्रय हेतु नयी जगह दी जाएगी।
  • शहरी विक्रय समिति, विक्रय प्रमाणपत्र को रद्द अथवा निलंबित कर सकती है। यह तभी किया जा सकता है जब विक्रेता ने विधेयक या पथ विक्रय योजना का उल्लंघन किया हो।
  • पथ विक्रेता को जुर्माना देना होगा यदि-
    • विक्रेता के पास विक्रय प्रमाणपत्र न हो।
    • वह निर्धारित समय या स्थान के अतिरिक्त कहीं और विक्रय करता हो।
    • विक्रय प्रमाणपत्र की अवहेलना करता हो। पथ विक्रेता पर अधिकतम 2000 का जुर्माना हो सकता है।

भवन एवं अन्य निर्माण कामगार संबंधी कानून (संशोधन) विधेयक, 2013 (The Building and Other Construction Workers Related Laws (Amendment) Bill 2013)

  • उपरोक्त विधेयक को राज्य सभा में 18 मार्च, 2013 को श्रम एवं रोजगार मंत्री दव्ारा प्रस्तावित किया गया था।
  • विधेयक दो कानूनों में संशोधन करता है- भवन एवं अन्य निर्माण कामगार (रोजगार का विनियमन एवं सेवा शर्तें) अधिनियम, 1996 (The Building and Other Construction Workers (Regulation of Employment and Condition of Service RECS Act, 196) तथा भवन एवं अन्य कामगारों हेतु कल्याण उपकर अधिनियम, 1996 (WC अधिनियम) [The Building and Other Construction Worker՚s Welfare Cess Act, 1996 (WC Act) ]
  • RECS अधिनियम में संशोधन कुल निर्माण कार्य में प्रयुक्त 10 लाख की ऊपरी सीमा को हटाने के लिए किया गया है। विधेयक में केन्द्र सरकार को निर्माण की अधिकतम लागत तय करने की बात कही गई है।
  • RECS अधिनियम के तहत, 18 से 60 वर्ष की आयु के बीच का प्रत्येक भवन कामगार जो कम से कम 90 दिनों से (पिछले 1 वर्ष के दौरान) किसी भवन निर्माण या अन्य निर्माण कार्य में लगा हो वह लाभकर्ता के रूप में पंजीकृत हो सकता है। संशोधन में हटाये जाने वाले प्रावधान हैं-
    • पंजीकरण हेतु 90 दिन की अनिवार्यता
    • ऊपरी आयु सीमा 60 वर्ष

RECS अधिनियम के अनुसार, कल्याण बोर्ड किसी वित्तीय वर्ष में अपने कुल खर्च का 5 प्रतिशत तक वेतन, भत्ता व अन्य प्रशासनिक जरूरतों पर खर्च कर सकता है। संशोधन इस सीमा को हटाता है और केन्द्र को प्रतिशत निर्धारित करने का अधिकार देता है।

अंतरराज्यीय प्रवासी कामगार (नियोजन का विनियमन और सेवा शर्तें) संशोधन अधिनियम, 2011 (The Inter-State Migrant Workers (Regulation and Employment & Condition of Service) Act, 2011)

अधिनियम उस संस्था पर लागू होगा, जिसने निर्धारित न्यूनतम (उदाहरण के लिए पाँच) या अधिक अंतरराज्यीय प्रवासी कामगारों को किसी मध्यस्थ (जिसने किसी एक राज्य के कामगारों को दूसरे राज्य की किसी संस्थापना में रोजगार दिलवाया हो) के जरिए रोजगार उपलब्ध कराया हो। जिस उद्यम पर यह अधिनियम लागू होता है उसमें कार्यरत अंतरराज्यीय प्रवासी कर्मकारों को कुछ सुविधायें जैसे गृह-चिकित्सा सहायता आवागमन खर्च (घर से उद्यम और वापसी आदि) मिलनी चाहिए।

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