Public Administration: The Most Vulnerable Disabled in India

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भारत में श्रमिकों की बेहतरी और संरक्षण के लिए तंत्र, कानून, संस्थायें और संवैधानिक निकाय (Mechanism, Laws, Institutions and Constitutional Bodies for the Betterment and Protection of Labourers in India)

भारत में सबसे असुरक्षित नि: शक्त (The Most Vulnerable Disabled in India)

  • नि: शक्त बच्चे (Children with Disability) : चाइल्ड रिलीफ एण्ड यू (Child Relief and You-CRY) के अनुसार नि: शक्तता संबधी आँकड़े दर्शाते हैं कि भारत के तीन प्रतिशत बच्चे मानसिक विकार से पीड़ित है। इनमें से 15 मिलियन बच्चे 10 वर्ष से कम उम्र के हैं। इनमें 10 मिलियन लड़के तथा 5 मिलियन लड़कियाँ हैं। 20 प्रतिशत नि: शक्त बच्चे शहरी क्षेत्रों में हैं तथा 80 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में हैं। 60 प्रतिशत पुरुष है जबकि 40 प्रतिशत महिलाएँ हैं।
    • यह अनुमान है कि प्रत्येक 10 में से 1 बच्चा या तो जन्म के साथ या जन्म से पहले साल में ही शारीरिक, संवेदी या मानसिक दुर्बलता से पीड़ित हो जाता है इस अनुमान के मुताबिक विश्व जनसंख्या में नि: शक्त बच्चों की संख्या 140 मिलियन है जिसमें से 25 मिलियन अकेले भारत में रहते हैं।
  • नि: शक्तता एवं महिलाएँ (Disabled and Women) : नि: शक्त महिलाएँ भारतीय समाज में सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं। यह असुरक्षा सभी वर्गों एवं जातियों में मौजूद है। महिलाएँ तिहरे कारणों से पीड़ित होती है, वे पीड़ित होती हैं क्योंकि वे महिला और नि: शक्त हैं और ज्यादातर निर्धनता में ही जीवन यापन करती है।
    • भारत में नि: शक्त महिलाएँ कुल नि: शक्त जनसंख्या की 42 प्रतिशत हैं। वे अपनी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, एवं स्वास्थ्य स्थिति के संदर्भ में सबसे ज्यादा उपेक्षित हैं। उन्हें किसी प्रकार के अनुसंधान, राज्य नीति एवं कार्यक्रमों, जन आंदोलन एवं पुनर्वास कार्यक्रमों में प्राथमिकता वाले समूह में नहीं रखा जाता है। आगे वे नि: शक्तता से जुड़े भेदभाव एवं कलंक के कारण सामाजिक एवं राजनीतिक सहभागिता से अलग हो जाती है।
  • मानसिक स्वास्थ्य नि: शक्त (Mental Health Disabled) : विश्व में नि: शक्तता एवं समय-पूर्व मृत्यु के दस प्रमुख कारणों में से पाँच कारण मनोरोगों से जुड़े हैं। अवसाद, व्यग्रता (Anxiety) , शराब एवं नशीले पदार्थों का सेवन मानसिक रूग्णता के कुछ सामान्य कारण हैं। शिजोफ्रेनिया और बाईपोलर डिसआर्डर (Bipolar Disorder) यद्यपि कम पाए जाते हैं लेकिन ये गंभीर रूप से नि: शक्तता के लिए प्रमुख उत्तरदायी कारक हैं। मानिसक रूप से बीमार कई व्यक्ति किसी तरह का मदद नहीं चाहते हैं। न तो परिवार एवं न ही स्वास्थ्य व्यवस्था मानसिक बीमारियों से निपटने के लिए पूरी तरह से तैयार दिखती है। जो बीमार व्यक्ति औपचारिक चिकित्सा सहायता चाहते हैं, उन्हें उपचार के नाम पर मिश्रित प्रकार की दवाएँ दी जाती हैं जैसे नींद संबंधी समस्याओं के लिए नींद की गोलियाँ (Sleeping Pill) , थकान के लिए विटामिन आदि का सेवन करना। विशिष्ट उपचार या मनोवैज्ञानिक उपचार उन्हें शायद ही उपलब्ध हो पाता है।
    • चिंता का एक अन्य क्षेत्र बुजुर्गो का मानसिक स्वास्थ्य है। इसमें दो मत नहीं कि आर्थिक विकास के साथ आयु प्रत्याशा में वृद्धि से हमारे देश में बुजुर्ग लोगों की संख्या बढ़ रही है।
  • रोगी और एचआईवी/एड्‌स (Patients and HIV/AIDS) : नि: शक्तों का यौन एवं जनन स्वास्थ्य एक ऐसा क्षेत्र है जिस पर प्रमुख रूप से ध्यान नहीं दिया गया है। जनन और यौन स्वास्थ्य एवं मातृत्व स्वास्थ्य सेवा तक कम पहुँच रही है। ऐसा प्रमुखत: ऐसी सेवाओं तक भौतिक पहुँच के अभाव, स्वास्थ्य सुविधाओं के बारे में सूचना के अभाव तथा स्वास्थ्य पेशेवरों (Health Professional) को नि: शक्तता के बारे में जानकारी का अभाव के कारण होता है। नि: शक्त व्यक्तियों को यौन क्षमता विहीन (Non-sexual) समझा जाता है। इस कारण मुख्यधारा के यौन एवं जनन स्वास्थ्य कार्यक्रमों में नि: शक्ततों के लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं है। नि: शक्त व्यक्ति स्वयं भी इन कार्यक्रमों से कोई विशेष लाभ नहीं उठा पाते हैंं। राज्य एवं समाज यह बात समझने में विफल रहता है कि नि: शक्तों की भी यौन संबंध स्थापित करने की इच्छा होती है और स्वस्थ यौन संबंध स्थापित करना उनका अधिकार है। वास्तव में उनकी कई कमजोरियों के कारण वे स्वयं यौन हमले एवं शोषण के प्रति संवेदनशील होते हैं। नि: शक्त व्यक्तियों को गैर नि: शक्त व्यक्तियों की तुलना में एचआईवी/एड्‌स से पीड़ित होने की संभावना ज्यादा होती है। ऐसा इसलिए होता है कि उन पर यौन-हमले की संभावना ज्यादा होती है।

भारत की जनगणना 2011 और नि: शक्त जन (Disabled People in India and Census 2011)

भारतीय जनगणना का इतिहास 1872 से रहा है। हालाँकि स्वतंत्र भारत की किसी जनगणना में नि: शक्त जनों की गिनती नहीं हुई थी (केवल सन्‌ 1981 को छोड़कर क्योंकि यह नि: शक्त जनों का अंतरराष्ट्रीय वर्ष था) । 2001 में ही नि: शक्त व्यक्तियों के रोजगार के प्रोत्साहन के लिए राष्ट्रीय केन्द्र (National Centre for Promotion of Employment for Disabled People -NCPEDP) और नि: शक्त व्यक्तियों के अधिकार समूहों के अथक प्रयास व संघर्ष के बाद नि: शक्त जनों की जनगणना में जोड़ा गया। 2001 की जनगणना में नि: शक्त जनो के केवल 5 वर्ग थे-दृष्टि/देखना, सुनना, बोलना, चलना और मानसिक रोग। नि: शक्त जनसंख्या का एक बड़ा वर्ग जोकि ऑटिज्म, सेरेबल पाल्सी जैसी बीमारियों से ग्रसित है उसके पास कोई विकल्प नहीं है कि उनकी गणना कहाँ होगी। इस जनगणना में मानसिक रोगियों और मंदबुद्धि लोगों में कोई अंतर नहीं किया गया था।

जनगणना 2011 के अधीन नि: शक्त जनों की जनसंख्या का प्रावधान (Provisions under Census 2011 for Disabled Population Calculation)

2001 की जनगणना में नि: शक्त जनों के 5 वर्गों के विपरीत जनगणना 2011 में नि: शक्त जनों के 8 वर्ग बनाये गए-ये वर्ग हैं-

  • दृष्टि विकलांगता
  • श्रवण विकलांगता
  • मानसिक रोग
  • वाक विकलांगता
  • मानसिक मंदता
  • बहु विकलांगता
  • चलन विकलांगता
  • कोई अन्य विकलांगता

भारत में नि: शक्त जनों दव्ारा झेली जाने वाली प्रताड़ना और विभेद (Vulnerability and Discrimination Faced by Disabled in India)

भारत ने नि: शक्त जनों के अधिकार पर संयुक्त राष्ट्र की संधि (United Nation Convention on the Right of Persons with Disabilities -UNCRPD) पर हस्ताक्षर किये हैं और यह दायित्य संभाला है की सभी नि: शक्त जनों को बिना किसी भेदभाव के सभी मानवीय और मूलभूत अधिकार उपलब्ध कराये जाएगे, परन्तु सच्चाई यह है कि भारत में नि: शक्त जन कई मौकों पर विभेद का शिकार होते हैं-

  • इन्हें कार्यस्थल, शैक्षणिक संस्थान, परिवार में प्रत्यक्ष विभेद का सामना करना पड़ता है क्योंकि नि: शक्त होने के कारण इनके साथ बुरा व्यवहार होता है।
  • नि: शक्त महिलाओं और बच्चों का अकसर यौन शोषण भी होता हे।
  • सार्वजनिक यातायात, विश्वविद्यालय, कार्यस्थल (निजी और सार्वजनिक दोनों) नि: शक्त लोगों के प्रति संवेदनशील नहीं हैंं
  • ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और बुरी है क्योंकि नि: शक्त महिलायें और बच्चे समाज से बहिष्कृत समझे जाते हैं।

भारत में नि: शक्त लोगों के अधिकारों की सुरक्षा हेतु संवैधानिक प्रावधान (Constitutional Provisions for Safeguarding the Rights of Disabled People in India)

अपने उद्भव के समय से ही भारतीय संविधान नि: शक्त लोगों के हितों के लिए प्रावधान अंतर्निहित रहे हैं-

  • समानता का अधिकार: अनुच्छेद 14 के अधीन समानता का अधिकार घोषणा करता है कि “राज्य, भारत की सीमा के अंदर किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता और विधि के समान संरक्षण के अधिकार से वंचित नहीं कर सकता।” यह नि: शक्त लोगों के अधिकारों के संरक्षण हेतु सर्वाधिक महत्वपूर्ण अधिकार है। इससे तात्पर्य है कि लोगों की सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, ऐतिहासिक और अन्य जरूरतों के अनुसार अलग-अलग मांग होती है और सभी लोगों को एक जैसा कानून उपलब्ध कराना संभव नहीं है। इससे तात्पर्य है कि जिन लोगों को विशेष व्यवहार की आवश्यकता है उनके लिए विशेष कानून, नीतियाँ और कार्यक्रम होने चाहिए। अत: संविधान के अनुच्छेद 14 के अधीन किसी नि: शक्त व्यक्ति के साथ उसकी नि: शक्तता के कारण होने वाला विभेद इस अनुच्छेद का उल्लंघन माना जाएगा।
  • जीवन का अधिकार-भारतीय संविधान के अनुच्छेद -21 के अधीन आने वाला जीवन का अधिकार अपने साथ अन्य अधिकारों को भी शामिल करता है। कुछ महत्वपूर्ण अधिकार जो जीवन के अधिकार का हिस्सा हैं और जो नि: शक्त लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण हैं वे इस प्रकार हैं-
    • निवास का अधिकार
    • शिक्षा का अधिकार
    • स्वास्थ्य का अधिकार
    • भोजन का अधिकार
  • राज्य के नीति निदेशक तत्व: कुछ नीति निदेशक तत्व विशेष रूप से नि: शक्त लोगों के अधिकारों का उल्लेख करते हैं। ″ नि: शक्तता के मामले में अनुच्छेद -41 विशेष रूप से इन लोगों के लिए राज्य दव्ारा कार्य को अधिकार न्याय और नि: शुल्क विधिक सहायता प्रदान करता है तथा साथ ही यहांँ प्रावधान भी करता है कि आर्थिक अथवा अन्य नि: शक्तताओं के कारण किसी को भी न्याय प्राप्त करने से वंचित नहीं किया जाएगा। अनुच्छेद-46 और 47 में भी अक्षम व्यक्तियों की शिक्षा, रहन-सहन के स्तर और विकास के बारे में प्रावधान है।

नि: शक्तता को अनुसूची 11 (पंचायत से संबंधित) में इस शीर्षक के अधीन स्थान मिला है “सामाजिक कल्याण, जिसमें विकलांगों और मानसिक रूप से मंद लोगों का कल्याण भी हो” और अनुसूची 12 (नगरपालिकाओं से संबंधित) में इनसे संबंधित शीर्षक है “समाज के दुर्बल तबके की सुरक्षा, जिसमें मंदबुद्धि व विकलांग व्यक्ति भी शामिल हैं।”

भारत में नि: शक्त लोगों की बेहतरी व संरक्षण हेतु कानून एवं विधायन (Laws and Legislation for Betterment and Protection of Disabled People in India)

नि: शक्त व्यक्ति (समान अवसर, अधिकार सरंक्षण एवं पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 (Persons with Disabilities (Equal Opportunity, Protection of Rights and Full Participation) Act, 1995)

यह अधिनियम नि: शक्त लोगों को सभी गरीबी निवारण कार्यक्रमों, सरकारी पदों, राज्य शैक्षणिक संस्थाओं और अन्य अधिकारों में 3 प्रतिशत प्रदान करता है। इस अधिनियम के प्रमुख प्रावधान हैं-

  • अक्षमता/ नि: शक्तता की शीघ्र पहचान और रोकथाम
  • शिक्षा
  • रोजगार
  • सकारात्मक क्रिया (Affirmative Action)
  • विभेद की समाप्ति
  • अनुसंधान और मानवशक्ति का विकास
  • नि: शक्त लोगों हेतु संस्थानों की पहचान
  • गंभीर रूप से नि: शक्त लोगों हेतु संस्थान
  • नि: शक्त लोगों के लिए मुख्य आयुक्त और आयुक्त
  • सामाजिक सुरक्षा