Public Administration: Welfare Schemes for the Vulnerable Sections of the Population by the Centre and State

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केंद्र व राज्य दव्ारा समाज के असुरक्षत तबकों के लिए कल्याण योजनाएँ (Welfare Schemes for the Vulnerable Sections of the Population by the Centre and State)

बालक (Boy)

राष्ट्रीय बाल नीति (National Policy for Children)

परिचय (Introduction)

  • राष्ट्रीय बाल नीति, 1974 में बालकों को राष्ट्र की “सर्वाधिक महत्वपूर्ण परिसंपत्ति” घोषित करते हुए भारत सरकार ने बच्चों के अधिकारों को सुरक्षित रखने की अपनी प्रतिबद्धता संबंधी अंतर्राष्ट्रीय संधियों का अनुमोदन करके बाल अधिकारों के संरक्षण के संबंध में अपनी वचनबद्धता को एक बार फिर दोहराया। राष्ट्रीय बाल नीति 1974 ने इस तथ्य पर जोर दिया कि मानव संसाधनों के विकास के लिए बच्चों से संबंधित कार्यक्रमों को राष्ट्रीय नीतियों में उचित स्थान मिलना चाहिए, ताकि बच्चे बड़़े होकर मजबूत नागरिक, शारीरिक रूप से स्वस्थ मानसिक रूप से दक्ष, नैतिक, कुशल और समाज में सम्मानित बनें। इस नीति ने इस बात पर भी बल दिया कि सभी बच्चों को विकास के समान अवसर/उपलब्ध कराया जाए।
  • 9 फरवरी, 2004 को अपनाए गए बच्चों के राष्ट्रीय चार्टर, 2003 ने रेखांकित किया कि प्रत्येक बच्चे को स्वस्थ्य और खुशहाल बचपन पाने का अधिकार है। साथ ही इस नीति ने बच्चों की स्वस्थ्य वृद्धि और विकास को अवरुद्ध कराने वाली ऋणात्मक कारकों को भी संबोधित किया।
  • भारत सरकार ने अपने अधिकार आधारित दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए बच्चों की वर्तमान समस्याओं और चुनौतियों के अनुरूप राष्ट्रीय बाल नीति 2013 के प्रस्ताव को अपनाया।

इस नीति के निर्देशक सिद्धांत (Guiding Principles of this Policy)

  • प्रत्येक बच्चे के सार्वभौमिक, न छीने जाने वाले और अविभाज्य मानव अधिकार होते हैं।
  • बच्चों के अधिकार अंतसंबंधित और परस्पर निर्भर होते हैं ताकि बच्चे की गरिमाओं और कल्याण के लिए इनमें से प्रत्येक समान रूप से आवश्यक एवं मौलिक हैं।
  • प्रत्येक बच्चे को जीवन, अस्तित्व, विकास, शिक्षा, सुरक्षा और सहभागिता का अधिकार है।
  • जीवन उत्तरजीवित और विकास का अधिकार बच्चे के शारीरिक अस्तित्व से कई अधिक महत्वपूर्ण है और इसमें पहचान एवं राष्ट्रीयता का अधिकार भी शामिल है।
  • बच्चे का मानसिक, भावनात्मक, ज्ञान संबंधी, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास समग्रता में संबोधित होना चाहिए।
  • सभी बच्चों के अधिकार समान है और किसी बच्चे के साथ धर्म, जाति, प्रजाति, लिंग, जन्मस्थान, वर्ग, भाषा, अक्षमता, सामाजिक, आर्थिक या किसी अन्य स्तर के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा।
  • बच्चों के कल्याण के लिए उनकी सुरक्षा, अनिवार्य है और बच्चों की सभी प्रकार के नुकसान, दुर्व्यवहार हिंसा, उपेक्षा ओर शोषण से रक्षा होनी चाहिए, और इनमें देखभाल करने वाली संस्थायें, विद्यालय, अस्पताल, शिशु सदन, परिवार और समुदाय शामिल है।

नीति के प्रमुख बिंदू (Salient Features of this Policy)

राज्य निम्नलिखित के संबंध में सभी आवश्यक उपाय करेगा-

  • पोषण, स्वच्छ पेयजल, स्वच्छता औ स्वास्थ्य शिक्षा पर विशेष बल के साथ देखरेख आधारित हस्तक्षेप के माध्यम से बाल मृत्यु के मुख्य कारकों एवं निर्धारकों के संबंध में।
  • नवजात शिशुओं एवं बाल्यावस्था संबंधी बीमारियों के संबंध में रोकथाम, उपचार, देखरेख एवं प्रबंधन के लिए सार्वभौमिक एवं वहनीय लागत पर सेवाओं तक पहुँच सुनिश्चित करना और बालकों के सभी जल जनित, वेक्टर जनित, रक्त जनित, संक्रमिक एवं अन्य बाल्यावस्था संबंधी बीमारियों में रक्षा करना।
  • जन्म-पूर्व, नवजात और जन्म पश्चात्‌ स्वास्थ्य की समय-समय पर जाँच दव्ारा मानसिक और शारीरिक दोनों अक्षमताओं का बचाव। माता व शिशु के पोषण की देखभाल तथा अक्षमताओं की शीघ्र जाँच, उपचार व प्रबंधन हेतु सेवायें।
  • जन्म के समय HIV संक्रमण से बचाव और यह सुनिश्चित करना कि संक्रमित बच्चों को चिकित्सकीय सुविधा, पर्याप्त पोषण और देखभाल मिले तथा इन्हें अधिकारों तक पहुँचने में भेदभाव का सामना न करना पड़े।
  • यह सुनिश्चित करना कि 6 - 14 वर्ष के सभी बच्चे स्कूल जाएँ और संविधान में लिखित शिक्षा के मौलिक अधिकार को प्राप्त करें।
  • यह सुनिश्चित करना कि विद्यालय न जाने वाले सभी बच्चे जैसे बाल श्रमिक, प्रवासी बच्चे, तस्करी दव्ारा लाये गए बच्चे, प्रवासी श्रमिकों के बच्चे, गली के बच्चे, मद्यपान और दुर्व्यवहार के पीड़ित बच्चे, नागरिक विद्रोह वाले क्षेत्रों के बच्चे, अनाथ, अक्षम बच्चे, लंबी बीमारी से ग्रसित बच्चे और कैदियों के बच्चे इत्यादि सभी खोजे जायें, बचायें जायें और पुनर्वासित किये जायें तथा शिक्षा के अधिकार को प्राप्त करें।
  • नियमित विद्यालयों में ही विशेष जरूरतों वाले बच्चों को सेवायें उपलब्ध कराना और ये भी सुनिश्चित करना कि ये सेवायें विशिष्ट हों और प्रशिक्षित शिक्षक और विशेष अध्यापक हों।
  • माता-पिता की देखभाल से वंचित बच्चों के अधिकारों को स्थायी या अस्थायी रूप में सुनिश्चित करना। यह राज्य का दायित्व होगा कि वह पारिवारिक व सामुदायिक देखाभल की व्यवस्था करेगा जिसमें बच्चे की जिम्मेदारी लेना, अपनाना, गोद लेना और पालन-पोषण भी शामिल होगा।
  • राज्य बाल सुलभ विधिशास्त्र को बढ़ावा देगा, प्रगतिशील विधायन लागू करेगा एक सुरक्षात्मक और उत्तरदायित्व पूर्ण बाल सुरक्षा तंत्र का विकास करेगा।
  • इस नीति को लागू करने व इस पर नजर रखने के लिए महिला और बाल विकास मंत्रालय नोड्‌ल एजेंसी/संस्था होगा और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के प्रभारी मंत्री के अधीन एक राष्ट्रीय सहभागिता एवं कार्य समूह बनाया जाएगा जो बच्चों के मामलों में हुई प्रगति की संबंधित मंत्रालयों व उनके सदस्यों के साथ मिलकर निगरानी करेगा।
  • महिला और बाल विकास, संबंधित मंत्रालयों एवं विभागों के साथ सलाह करके बच्चों के लिए एक राष्ट्रीय कार्य योजना बनाएगा। राज्य, जिला एवं स्थानीय स्तर पर भी ऐसी ही योजनायें बनायी जाएगी ताकि इस नीति के प्रावधानों को लागू करने के लिए कार्य योजना बनाई जा सकें।
  • बाल अधिकारों की सुरक्षा पर राष्ट्रीय आयोग और बाल अधिकारों की सुरक्षा पर राज्य आयोग ये सुनिश्चित करेंगे कि इस नीति के सिद्धांतों को सभी क्षेत्रों के बच्चों से संबंधित नीति निर्माण के सभी स्तरों पर सम्मान प्राप्त हो।
  • सभी भागीदारों (जिसमें बच्चे भी शामिल है) के साथ मिलकर इस नीति का हर 5 सालों में मूल्यांकन किया जाएगा। इस मूल्यांकन प्रक्रिया का नेतृत्व महिला एवं बाल विकास मंत्रालय करेगा।

राष्ट्रीय प्रारंभिक शैशवावस्था की देखरेख और शिक्षा नीति (मसौदा) (National Early Childhood Care and Education (ECCE) Policy (Draft) )

परिचय (Introduction)

  • प्रारंभिक शैशवावस्था से तात्पर्य जीवन के शुरुआती 6 वर्षों से है। इसे सर्वाधिक महत्वपूर्ण समयावधि माना जाता है, क्योंकि विकास की दर बहुत अधिक होती है और संपूर्ण जीवन के विकास व सीखने की क्षमता हेतु आधार का निर्माण होता है। वैज्ञानिक प्रमाण बताते हैं कि प्रारंभिक वर्षों में मस्तिष्क का विकास उस पथ का निर्माण करता है जिससे संपूर्ण जीवन का मानसिक व शारीरिक विकास तथा सीखने और व्यवहार की क्षमता प्रभावित होती है।
  • चूँकि भारत में 0 से 6 आयु वर्ग के 158.7 मिलियन बच्चे हैं। प्रारंभिक शैशवावस्था की देखरेख और शिक्षा जीवन पर्यन्त सीखने तथा विकास का आधार है और शिक्षा के प्रारंभिक स्तर की सफलता पर इसका प्रभाव पड़ता है। अत: ये आवश्यक हो जाता है कि ECCE पर ध्यान दिया जाये और उसके अनुरूप संसाधन उपलब्ध कराकर पर्याप्त निवेश किया जाए।
  • भारत सरकार प्रारंभिक शैशवावस्था की देखरेख और शिक्षा (ECCE) के महत्व को समझती है, जिसे संवैधानिक प्रावधान के तौर पर संशोधित अनुच्छेद 45, जिसे संविधान (86वाँ संशोधन) अधिनियम, 2002 के माध्यम से संविधान में शामिल किया गया है; इसके अनुसार “राज्य प्रारंभिक शैशवावस्था की देखरेख और सभी बालकों को उस समय जब तक कि वे छ: वर्ष की आयु पूर्ण न कर लें शिक्षा प्रदान करने के लिए प्रयास करेगा।”
  • प्रारंभिक शैशवावस्था की देखरेख और शिक्षा (ECCE) को बच्चों के लिए राष्ट्रीय नीति (1974) में भी महत्व मिला है, फलस्वरूप 1975 में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में एकीकृत बाल विकास सेवाओं को इस उद्देश्य के साथ प्रारंभ किया गया कि बच्चे के संपूर्ण व एकीकृत विकास की नींव रखी जाये और देखभाल करने वालों में क्षमता निर्माण किया जाये। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986) , प्रारंभिक शैशवावस्था की देखरेख और शिक्षा (ECCE) को मानव विकास के लिए आवश्यक मानती है। राष्ट्रीय पोषण नीति (1993) ने भी प्रारंभिक शैशवावस्था में बच्चे की देखरेख व पोषण की बात स्वीकारी है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (2002) और बच्चों के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना (2005) भी प्रारंभिक शैशवावस्था में सहयोगी नीतिगत पहल के रूप में रहे हैं। 11वीं पंचवर्षीय योजना ने शुरुआती बचपन में देखभाल व शिक्षा के महत्व को स्वीकारा है और माना है कि यह अवस्था बच्चे के जीवन पर्यन्त विकास का आधार है। योजना ये निर्देश भी देती है कि “3 - 6 वर्ष के सभी बच्चों को कम से कम एक वर्ष की विद्यालय पूर्व शिक्षा मिलनी चाहिए।” 11वीं योजना में, ICDS कार्यक्रम सार्वभौमिक रूप से 14 लाख निवास स्थानों पर लागू कर दिया गया।
  • प्रारंभिक शैशवावस्था की देखरेख और शिक्षा (ECCE) संबंधी सेंवाये निजी, सार्वजनिक और गैर-सरकारी माध्यमों दव्ारा प्रदान की जाती हैं। सार्वजनिक क्षेत्र में ICDS विश्व की सबसे बड़ी योजना है, जो प्रारंभिक शैशवावस्था की देखरेख और शिक्षा (ECCE) को लागू करती है। शिक्षा का सार्वभैमीकरण करने वाले कार्यक्रम जैसे सर्व शिक्षा अभियान और प्रारंभिक स्तर पर बालिकाओं की शिक्षा हेतु राष्ट्रीय कार्यक्रम (NPEGEL) ने भी देश के कुछ जिलों में प्राथमिक विद्यालयों को इससे संबंद्ध करके प्रारंभिक शैशवावस्था की देखरेख और शिक्षा (ECCE) केन्द्र स्थापित करने में सहयोग दिया है। इसके साथ-साथ कार्यरत माताओं के लिए राजीव गांधी राष्ट्रीय शिशु सदन योजना, 6 वर्ष से कम के बच्चों को देखभाल व शिक्षा प्रदान करती है।

नीति के प्रमुख बिन्दु (Salient Features of the Policy)

  • इस नीति के प्रमुख उद्देश्य ECCE में सार्वभौमिक पहुँच, समानता और गुणवत्ता के साथ-साथ मजबूत करने की क्षमता बढ़ाना है।
  • नीति का दृष्टिकोण 6 वर्ष से कम आयु के सभी बच्चों का इष्टतम विकास और सीखने की क्षमता बढ़ाने के लिए समान और प्रासंगिक अवसर प्रदान किया जाएगें। यह व्यवस्था घर से की जाने वाली देखरेख व शिक्षा से केन्द्र आधारित ECCE में सफल व सरल परिवर्तन पर जोर देती है। इसके पश्चात्‌ देश भर में उचित तंत्र प्रक्रिया और प्रावधानों दव्ारा उचित वातावरण बनाकर स्कूली शिक्षा का प्रावधान करती है।
  • बच्चों के कल्याण व जरूरतों को ध्यान में रखते हुए व्यापक बाल सहयोगी व्यवस्था, अवसंरचना और सेवाओं का विकास।
  • सभी बच्चों के समावेशन हेतु अनुकूल रणनीति अपनाना।
  • ECCE प्रावधानों के लिए गुणात्मक मानक और पाठयक्रम रूपरेखा निर्धारित करना।
  • ECCE का महत्व के बारे में जागरूकता और समझ बढ़ाना और परिवारों एवं समुदायों में मजबूत सहयोग बनाना ताकि संस्थागत एवं कार्यक्रम के स्तर पर और तकनीक के दव्ारा छोटे बच्चों की जीवन की गुणवत्ता बढ़ायी जाए।
  • ICDS आँगनवाड़ी केन्द्र (AWC) को “जोशपूर्ण बाल सुलभ ECD केन्द्र” के रूप में पुन: स्थापित किया गया हैं जिसमें पर्याप्त संसाधन और अवसरंचना होगी ताकि बच्चों से संबंधित परिणामों में ECCE सातत्य बनाया जा सके।
  • ECCE कार्यक्रमों में बच्चे की मातृभाषा या गृहभाषा संपर्क की प्रारंभिक भाषा होगी।
  • NIPCD क्षेत्रीय केन्द्रों में हेल्पलाइन चलाने के आदेश के साथ बाल विकास संसाधन गृह स्थापित किये जाएगे।
  • ECCE कार्यक्रमों और सेवाओं का निरीक्षण करने के लिए महिला एवं बाल विकास मंत्रालय एक नोड्‌ल मंत्रालय होगा, जिसमें इसके राज्य स्तरीय संबंधित विभाग भी शामिल होंगे।
  • बहु-क्षेत्रीय और अंतर-एंजेसी सहयोग को बनाये रखने के लिए, सलाहाकारों एवं न्यायविदों को सदस्य के रूप में लेकर, ICDS मिशन के अधीन पहले एक समिति बनायी जाएगी, बाद में एक राष्ट्रीय ECCE परिषद का गठन किया जाएगा।
  • विकेन्द्रीकृत नियोजन और ECCE कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के लिए जिला स्तरीय प्रशासनिक इकाइयाँ और पंचायतों को शक्ति प्रदान की जाएगी। समुदाय आधारित संगठन जैसे ग्राम शिक्षा समितियाँ, मातायें (अभिभावक) समितियाँ, ग्राम संसाधन समूह और पंचायती राज संस्थाओं आदि को प्रत्यक्ष रूप्ज्ञ से शामिल किया जाएगा।

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