Public Administration 1: Constitutional Provisions for the Welfare of Children

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भारत में बच्चों के संरक्षण एवं बेहतरी हेतु तंत्र, कानून व संस्थायें (Mechanism, Laws and Bodies Constituted for the Protection and Betterment of Children in India)

भारत में बच्चों एवं बाल अधिकारों के कल्याण से संबंधित संवैधानिक प्रावधान (Constitutional Provisions for the Welfare of Children and Child Rights in India)

भारत में बाल अधिकारों के कल्याण एवं संरक्षण के संबंध में विभिन्न संवैधानिक विशेषाधिकारों का प्रावधान किया गया है। इन अधिकारों को संविधान में मूल अधिकार तथा राज्य के नीति निर्देशक तत्व दोनों के ही अंतर्गत शामिल किया गया है। ये अधिकार इस प्रकार है-

  • अनुच्छेद 14- राज्य भारत के राज्यक्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।
  • अनुच्छेद 15 (3) - इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य की स्त्रियों और बालकों के लिए कोई विशेष उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी।
  • अनुच्छेद 21- किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि दव्ारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं।
  • अनुच्छेद 21 क- राज्य छ: वर्ष से चौदह वर्ष की आयु तक के सभी बच्चे की नि: शुल्क और अनिवार्य शिक्षा इस प्रकार प्रदान करेगा जिस प्रकार राज्य विधि के अधीन निर्धारित करें।
  • अनुच्छेद 23 - मानव के दुर्व्यापार और बलात श्रम का प्रतिषेध।
  • अनुच्छेद 24 - चौदह वर्ष से कम आयु के किसी बालक को किसी कारखाने या खान में काम करने के लिए नियोजित नहीं किया जाएगा या किसी अन्य परिसंकटमय नियोजन में नहीं लगाया जाएगा।
  • अनुच्छेद 39 (ङ) -राज्य अपनी नीति का विशिष्टतया इस प्रकार संचालन करेगा कि पुरुष और स्त्री कर्मकारों के स्वास्थ्य और शक्ति का तथा बालकों के सुकुमार अवस्था का दुरुपयोग न हो और आर्थिक आवश्यकता से विवश होकर नागरिकों को ऐसे रोजगारों में न जाना पड़े जो उनकी आयु या शक्ति के अनुकूल न हो।
  • अनुच्छेद 39 (च) - बालकों को स्वतंत्र और गरिमामय वातावरण में स्वस्थ विकास के अवसर और सुविधाएँ दी जाएँ और बालकों और अल्पवय व्यक्तियों की शोषण से तथा नैतिक और आर्थिक परित्याग से रक्षा की जाए।
  • अनुच्छेद 45- राज्य प्रारंभिक शैशवावस्था की देखरेख और सभी बालकों को उस समय तक जब तक कि वे छ: वर्ष की आयु पूर्ण न कर लें शिक्षा प्रदान करने के लिए प्रयास करेगा।
  • अनुच्छेद 47 - राज्य अपने लोगों के पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊँचा करने और लोक स्वास्थ्य के सुधार को अपने प्राथमिक कर्तव्यों में मानेगा।
  • अनुच्छेद 51 क (ट) -जो माता-पिता या संरक्षक हों वह छ: से चौदह वर्ष के बीच की आयु के यथास्थिति, अपने बच्चे अथवा प्रतिपाल्य को शिक्षा प्राप्त करने के अवसर प्रदान करेगा।
  • अनुच्छेद 243 (छ) -इसे अनुसूची 11 के साथ पढ़ा जाए, जिसमें महिला एवं बाल विकास से संबंधित कार्यक्रमों/विषयों को पंचायत (11वीं अनुसूची का विषय संख्या 25) को सौंपकर बच्चों की देखभाल के संस्थाकरण की व्यवस्था की गई है। शिक्षा (विषय 17) , परिवार कलण (विषय 25) , स्वास्थ्य एवं स्वच्छता (विषय 23) के अतिरिक्त अन्य विषय भी बाल कल्याण के अंतर्गत ही आते हैं।

भारत में बाल कल्याण एवं बाल अधिकारों के संरक्षण एवं बेहतरी के लिए विधियाँ एवं विधायन (Laws and Legislations for the Protection and Betterment of Child Welfare and Child Rights in India)

बच्चों को नि: शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार, अधिनियम, 2009 (The Right of Children to Free and Compulsory Education Act, 2009)

  • संविधान 86वाँ (संशोधन) अधिनियम, 2002 के माध्यम से 6 से 14 वर्ष की आयु वर्ग के सभी बच्चों के लिए नि: शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा को एक मौलिक अधिकार के रूप में सुनिश्चित करने के लिए भारतीय संविधान में एक नए अनुच्छेद 21 क को शामिल किया गया। बच्चों के लिए नि: शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अनुच्छेद 21 क के अंतर्गत बनाए जाने वाले कानून को दर्शाता है, और यह स्पष्ट करता है कि प्रत्येक बच्चे को किसी भी औपचारक विद्यालय, जो कुछ आवश्यक शर्तें पूरी करता हो, से संतोषजनक एवं न्यायसंगत पूर्णकालिक प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है।
  • अनुच्छेद 21 क और शिक्षा का अधिकार अधिनियम 1 अप्रैल 2010 से प्रभावी है। ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम’ शीर्षक के अंतर्गत ‘नि: शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा’ अंतर्निहित है। ‘नि: शुल्क शिक्षा’ का तात्पर्य है कि कोई भी बच्चा, यहाँ तक कि ऐसा बच्चा जिसके माता पिता ने उसे ऐसे विद्यालय में प्रवेश दिलाया है जो किसी सरकार से सहायता प्राप्त नहीं है, उस विद्यालय में ऐसी किसी भी शुल्क व्यय इत्यादि के लिए बाध्य नहीं है जो उसकी प्राथमिक शिक्षा प्राप्ति के मार्ग में बाधक है। ‘अनिवार्य शिक्षा’ उपयुक्त सरकार तथा स्थानीय निकाय के लिए यह उत्तरदायित्व सुनिश्चित करती है कि 6 - 14 वर्ष की आयु वर्ग के सभी बच्चों की प्राथमिक शिक्षा पूरी कराने के संबंध में प्रवेश एवं उपस्थिति जैसी औपचारिकाताएँ पूरी हों।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम सुनिश्चित करता है कि (The RTE Act Provides for The)

  • किसी पड़ोस के विद्यालय में प्रारंभिक शिक्षा पूरी होने तक बच्चों को नि: शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार।
  • अनिवार्य शिक्षा के तहत प्रत्येक संबंधित सरकार का यह दायित्व होगा कि वह 6 - 14 वर्ष की आयु वर्ग के प्रत्येक बच्चे की नि: शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा व प्रवेश तथा प्राथमिक शिक्षा को सुनिश्चित करे।
  • जहाँ एक तरफ यह बच्चों को नि: शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के संबंध में संबंधित सरकार, स्थानीय निकाय एवं माता-पिताओं की जिम्मेदारी सुनिश्चित करता है, वहीं दूसरी ओर वित्तीय उत्तरादायित्व के संबंध में केन्द्र एवं राज्य सरकार के मध्य सहभागिता को निर्धारित भी करता है।
  • यह राज्य या जिले अथवा प्रखंड स्तर पर शिक्षकों की औसत संख्या के बजाय तार्किक ढंग से शिक्षकों की नियुक्ति का प्रावधान करता है ताकि छात्र-शिक्षक अनुपात व्यवस्थित रहे। साथ ही इससे ग्रामीण एवं नगरीय क्षेत्रों में शिक्षकों की नियुक्ति में असंतुलन भी उत्पन्न नहीं होता है।
  • यह निम्नलिखित गतिविधियों का निषेध करता है-
    • शारीरिक दंड एवं मानसिक उत्पीड़न।
    • बच्चों के दाखिले/प्रवेश से संबंधित अनुवीक्षण/जाँच प्रक्रियाएँ।
    • प्रतिव्यक्ति शुल्क।
    • शिक्षकों दव्ारा व्यक्तिगत ट्‌यूटशन।
    • बिना मान्यता प्राप्त विद्यालय चलाना।
  • यह संविधान में प्रतिष्ठापित मूल्यों के अनुरूप पाठयक्रम को विकसित करने में मदद करता है, जिससे बच्चे का बहुमुखी विकास सुनिश्चित होता है, बच्चों में ज्ञान, क्षमता एवं प्रतिभा का निर्माण होता है और इससे बच्चों के अनुकूल तथा उनके अध्ययन के प्रति केन्द्रित व्यवस्था के विकास से वे भय, मानसिक सदमें एवं चिंता से मुक्त हो जाते हैं।

बच्चों को नि: शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार (संशोधन) विधेयक, 2010 (The Right of Children to Free and Compulsory Education (Amendment) Bill, 2010)

  • इस विधेयक के माध्यम से बालकों का नि: शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार विधेयक, 2009 में संशोधन किया गया। इसमें ‘उपेक्षित समूहों के बच्चो’ की परिभाषा को विस्तृत करते हुए इसमें नि: शक्त बच्चों को भी शामिल किया गया। नि: शक्त बच्चों को परिभाषित करते हुए इसके अंतर्गत दृष्टिहीन, कुष्ठरोगी, बधिर, चलने में अक्षम तथा मानसिक रूप से पीड़ित बच्चों को शामिल किया गया है। इसके अतिरिक्त इसमें ऑटिज्म से पीड़ित, प्रमस्तिष्क पक्षाघात से पीड़ित, अपूर्ण मानसिक विकास वाले और बहुल नि: शक्तता से पीड़ित बच्चों को भी शामिल किया गया है।
  • ऑटिज्म, प्रमस्तिष्क पक्षाघात से पीड़ित, अपूर्ण मानसिक विकास वाले और बहुल विकलांगता से पीड़ित बच्चों को भी नि: शुल्क एवं अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा का उतना ही अधिकार प्राप्त है जितना कि नि: शक्त व्यक्ति (समान अवसर अधिकार संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 के तहत नि: शक्त बच्चों को प्राप्त है।
  • अधिनियम में विद्यालय विकास योजना तैयार करने के लिए विद्यालय प्रबंधन समिति के गठन का प्रावधान किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 30 में यह प्रावधान किया गया है कि धर्म या भाषा पर आधारित सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रुचि की शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन का अधिकार होगा। अधिनियम यह भी सुनिश्चित करता है कि अल्पसंख्यक संस्थानों की विद्यालय प्रबंधन समिति केवल परामर्शदात्री भूमिका में रहेगी।

बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 (Prohibition of Child Marriage Act, 2006)

  • बाल विवाह निषेध अधिनियम, 1929 को परंपरागत बाल विवाह को निषिद्ध करने के लिए बनाया गया। अधिनियम को पुरुष एवं महिला की विवाह की आयु सीमा बढ़ाने के लिए क्रमश: 1949 एवं 1978 में संशोधित भी किया गया। यद्यपि यह अधिनियम परंपरागत बाल विवाह पर रोक लगाता है, लेकिन ऐसे किसी भी विवाह को अवैध या अमान्य घोषित नहीं करता। इस कानून के तहत बाल विवाह को दंडनीय माना गया है।
  • एक लबे समय से यह मांग की जा रही है कि इस कानून को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए दंड के प्रावधान को और अधिक कठोर बनाए जाए ताकि बाल विवाह की परंपरागत बुराई का प्रभावी तरीके से उन्मूलन किया जा सके।

अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ (Salient Features of the Act)

  • इस अधिनियम के अनुसार ऐसे महिला एवं पुरुष जिन्होंने क्रमश: 18 एवं 21 वर्ष की आयु पूरी नहीं की है, बालकों की श्रेणी में आएँगे।
  • न्यायालय यह आदेश जारी कर सकता है कि यदि कोई पति (बाल विवाह की स्थिति में) विवाह को अमान्य घोषित करता है तो पति अथवा उसका परिवार तब तक उस लड़की के भरण-पोषण का व्यय वहन करेगा जब तक कि उस लड़की का पुन: विवाह नहीं हो जाता है।
  • यदि 18 वर्ष से अधिक आयु का कोई व्यस्क पुरुष, बाल विवाह के लिए अनुबंध करता है तो इसके लिए उसे 2 वर्ष तक का कारावास अथवा 1 लाख रुपये तक का जुर्माना अथवा दोनों हो सकते हैं।
  • यही दंड उस व्यक्ति के लिए भी सुनिश्चित होगा जो या तो बाल विवाह करता या करवाता है या फिर बाल विवाह करने के संबंध में निर्देश देता है।
  • यदि किसी बच्चे को उसके माता-पिता अथवा अभिभावक से अलग रखा जाता है, किसी अन्य स्थान पर जाने के लिए मजबूर किया जाता है, विवाह के लिए बेच दिया जाता है, या फिर-विवाह करके अनैतिक उद्देश्यों के लिए उपयोग अथवा दुर्व्यापार किया जाता है तो ऐसे विवाह को अमान्य समझा जाएगा।
  • न्यायालय के पास यह शक्ति है कि किसी अधिकारी अथवा किसी व्यक्ति दव्ारा दिए गए आवेदन के आधार पर किसी संदिग्ध बाल विवाह के संबंध में किसी व्यक्ति के विरुद्ध निषेधाज्ञा जारी कर सकता है और वह व्यक्ति किसी संगठन या संघ का सदस्य या कोई भी हो सकता है। साथ ही न्यायालय स्वत: संज्ञान के आधार पर किसी संदिग्ध बाल विवाह के विरुद्ध कार्यवाही कर सकता है और उक्त बाल विवाह के संबंध में जारी निषेधाज्ञा का जवाब देने के लिए आदेश जारी कर सकता है।
  • इस अधिनियम के तहत एक बाल विवाह निषेध अधिकारी की नियुक्ति की जाएगी, जो न्यायालय की निषेधाज्ञा दव्ारा दोषी व्यक्ति के विरुद्ध साक्ष्य जुटाकर, बाल विवाह के प्रतिकूल प्रभावों के संबंध में लोगों को जागरूक करके तथा बाल विवाह के संबंध में आँकड़े जुटाकर अपने क्षेत्राधिकार में बाल विवाह पर रोक लगाने के लिए उत्तरदायी होगा। इस अधिनियम में बाल विवाह निषेध अधिकारी को एक जन सेवक माना गया है।

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