Public Administration 1: Other Important Law and Legislation for Welfare of Women in India

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भारत में महिलाओं की उन्नति एवं संरक्षण के लिए गठित तंत्र, विधि, संस्थाएँ एवं निकाय (Mechanism, Laws, Institutions and Bodies Constituted for the Protection and Betterment of Women in India)

भारत में महिलाओं के कल्याण हेतु अन्य महत्वपूर्ण कानून एवं विधायन (Other Important Law and Legislation for Welfare of Women in India)

बाल विवाह निरोधक (संशोधन) अधिनियम, 1976 (The Child Marriage Restraint (Amendment) Act, 1976)

यह अधिनियम बालिकाओं की विवाह की आयु को 15 वर्ष से बढ़ाकर 18 वर्ष तथा लड़कों की विवाह की आयु को 18 वर्ष से 21 वर्ष करने का प्रावधान करता है। इस अधिनियम के अंतर्गत किए गए अपराध को संज्ञेय (Cognizable) बनाया गया है।

कारखाना अधिनियम, 1948, खदान अधिनियम, 1952 तथा बागान-श्रम अधिनियम, 1951 (The Factories Act, 1948, Mines Act 1952 and Plantation Labour Act, 1951)

ये अधिनियम महिलाओं के कारखानों, खदानों एवं बगानों में शाम 7 बजे से लेकर सुबह 6 बजे तक काम करने पर रोक लगाते हैं तथा उनकी सुरक्षा एवं कल्याण का प्रावधान करते हैं। सरकार को यह अधिकार है कि वह एक महिला दव्ारा उठाए जाने वाले अधिकतम भार को निश्चित करे तथा बच्चों के लिए शिशु सदन (Crèches) खोले।

कारखाना (संशोधन) अधिनियम, 1976 (The Factories (Amendment) Act, 1976)

यह अधिनियम 30 से ज्यादा रोजगार करने वाली महिलाओं के कार्य स्थलों पर शिशु सदन का प्रावधान करता हैं। रोजगार करने वाली महिलाएँ ठेके पर या अनौपचारिक रूप से कार्य करने वाली हो सकती हैं। इससे पहले 50 बच्चों पर एक शिशु सदन का प्रावधान था।

समान पारिश्रमिक अधिनियम (The Equal Remuneration Act, 1976)

यह अधिनियम (a) महिला एवं पुरुष कामगारों को समान पारिश्रमिक (b) रोजगार के मामलों में महिलाओं के विरुद्ध लैंगिक आधार पर या इससे संबंधित मामलें या उनकी पहचान के आधार पर उनके साथ होने वाले भेदभाव पर प्रतिबंध लगाता है। इस अधिनियम में संशोधन के लिए श्रम मंत्रालय के पास एक प्रस्ताव है ताकि इसके प्रावधानों को महिलायें के हक में और अधिक उदार बनाया जा सके।

संविदा श्रमिक (विनियमन एवं उन्मूलन) अधिनियम 1978 (The Contract Labour (Regulation and Abolition) Act, 1978)

यह अधिनियम संविदा श्रमिकों (जिसमें महिलाएँ भी शामिल हैं) की कार्य परिस्थितियों एवं मजदूरी के भुगतान का विनियमन करता है तथा निर्माण कार्ये में लगी कामगार महिलाओं के बच्चों के लिए शिशु सदन एवं कल्याणकारी सुविधाएँ उपलब्ध कराने का प्रावधान करता है।

दहेज (प्रतिषेध) अधिनियम, 1961 (The Dowry (Prohibition) Act, 1961)

दहेज (प्रतिषेध) अधिनियम पहली बार 1961 में बनाया गया था। 1984 में इस अधिनियम में संशोधन किया गया। इस संशोधन के माध्यम से संज्ञेय बनाया गया, दंड में वृद्धि की गई तथा इसमें जुर्माना एवं कारावास दोनों को शामिल किया गया। इसे और ज्यादा प्रभावी बनाने के लिए इसके क्षेत्र का विस्तार किया गया था। इस अधिनियम के दंडात्मक प्रावधानों को ज्यादा प्रभावी एवं कठोर बनाने के लिए 1986 में भी संशोधन किया गया था।

महिलाओं एवं लड़कियों का अनैतिक व्यापार (दमन) अधिनियम 1956 (The Suppression of Immoral Traffic in Women and Girls Act, 1956)

महिलाओं एवं लड़कियों का अनैतिक व्यापार (दमन) अधिनियम आजीविका के संगठित साधन के रूप में वेश्वावृत्ति कराने के उद्देश्य से महिलाओं एवं लड़कियों के अवैध व्यापार को प्रतिबंधित करता है। इस अधिनियम में 1978 तथा 1986 में संशोधन किया गया था। अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1986 के दंडात्मक प्रावधानों को ज्यादा कठोर बना दिया गया था तथा इसकी प्रमुख विशेषताओं के अंतर्गत इसके क्षेत्र का विस्तार कर इसके अंतर्गत सभी व्यक्तियों को शामिल कर दिया गया चाहे वे पुरुष हों या महिला और जिनका वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए यौन शोषण किया गया हो।

परिवार न्यायालय (Family Courts)

शादी, विवाह एवं संबंधित मामलों से जुड़े विवादों में सामन्जस्य को बढ़ावा देने तथा विवादों के शीघ्र समाधान के उद्देश्य से देश में परिवार न्यायालयों के गठन हेतु 1984 में एक अधिनियम पास किया गया था।

सती प्रथा (रोकथाम) अधिनियम, 1987 (The Commission of Sati (Prevention) Act, 1987)

सती प्रथा (रोकथाम) अधिनियम, 1987 संसद दव्ारा वर्ष 1987 में पास किया गया ताकि सती प्रथा एवं इसके महिमागान या इससे संबंधित मामलों या घटनाओं को ज्यादा प्रभावी तरीके से रोका जा सके। अधिनियम सती को व्यापक रूप से परिभाषित करता है तथा इसमें न केवल किसी विधवा को उसके पति के साथ बल्कि उसके किसी अन्य संबंधी के साथ जलाने या जिंदा दफनाने को भी शामिल करता है।

वित्तीय सुरक्षा एवं संपत्ति पर अधिकार (Financial Security and Rights over Property)

इस संबंध में महिलाओं को जो सबसे ज्यादा सशक्त बनाता है वह है हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956। इस अधिनियम ने संपत्ति पर महिलाओं के अधिकार को क्रांतिकारी बना दिया या इस संबंध में क्रांतिकारी परिवर्तन लाया है। एक महिला को संपत्ति पर पुरुष की तरह उत्तराधिकार प्राप्त है। संपत्ति की पूर्ण स्वामिनी होने के कारण महिला वसीयत स्थिति पर पूर्ण अधिकार रखती है।

समाधान के एक वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में भारत में महिलाओं के कल्याण के लिए जेंडर संवेदनशील कानूनी और न्यायिक प्रणाली को बढ़ावा देने के लिए सुझाव (Suggestions for Promoting Gender-Sensitive Legal and Judicial System for the Welfare of Women in India as an Alternaive Systems of Redressal)

एक निश्चित सीमा तक सवैंधानिक प्रावधान एवं विभिन्न कानून महिलाओं को पूर्णतया समानता एवं न्याय उपलब्ध कराने में सक्षम नहीं रहे हैं। इस स्थिति को बदलने के लिए विधि प्रारूप तकनीक, प्रवर्तन तंत्र जिसमें पुलिस, न्यायपालिका तथा अन्य घटकों की समीक्षा करने तथा इन्हें संवेदनशील एवं मजबूत बनाने की आवश्यकता है।

  • राज्य सरकारों तथा भारत सरकार के जन शिकायत विभाग (Department of Public Grievances) दव्ारा महिलाओं के अधिकारों एवं उनका संरक्षण सुनिश्चित करने वाले कानूनों के प्रवर्तन के लिए विशेष सेल (Special Cells) का गठन करना चाहिए। इस तरह के विशेष सेलों के साथ इन नोडल विभागों का संबंध स्थापित करने के लिए महिला अधिकार आयुक्त के अधीन एक विशेष प्रभाग (Secial Division) का गठन किया जा सकता है।
  • न्यायपालिका एवं परिवार अदालतों में बड़ी संख्या में महिला न्यायाधीशों की नियुक्ति अवश्य की जानी चाहिए।
  • बड़ी संख्या में महिला थानों की स्थापना की जानी चाहिए तथा महिला पुलिस अधिकारियों एवं महिला पुलिस कर्मियों की भर्ती की जानी चाहिए।
  • सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता को अपनाया जाना चाहिए।
  • विवाहित जीवन के दौरान पति या पत्नी दव्ारा अर्जित की गई संपूर्ण संपत्ति पर पति-पत्नी को संयुक्त स्वामित्व होना चाहिए और उन्हें ऐसी संपत्ति पर समान भागीदारी के आधार पर रहना चाहिए, लेकिन यदि पति पत्नी में से किसी को उपहार, वसीयत या राज्य उत्तराधिकार (State Succession) के रूप में संपत्ति प्राप्त होती है तो उसे इस सिद्धांत से अलग रखा जाना चाहिए।
  • महिलाओं की वैवाहिक स्थिति पर ध्यान दिए बिना कानून के दव्ारा उनके मातृत्व एवं गर्भावस्था या प्रसव संबंधी अधिकारों को सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
  • प्रत्येक तालुका में राज्य खर्च पर एक जिला अधिवक्ता (District Advocate) की नियुक्ति की जानी चाहिए जिससे कि वह अपने क्षेत्राधिकार में महिलाओं को कानूनी सलाह दे तथा न्यायालय में उनके मामलों को उठाए।
  • स्थायी रूप से एक विशेष आयुक्त की नियुक्ति की जानी चाहिए ताकि वह प्रासंगिक कानूनों एवं उनके क्रियान्वयन की निगरानी कर सके तथा इनका किस सीमा तक प्रवर्तन हो रहा है इसका मूल्यांकन कर सके।
  • महिलाओं की भूमि एवं संपत्ति का अधिकार देना चाहिए।
  • कन्या भ्रूण हत्या को बढ़ावा देने में मददगार पूर्व लिंग निर्धारण परीक्षणों (Pre Sex Determination Tests) को केन्द्रीय कानून दव्ारा प्रतिबंधित किया जाना चाहिए।
  • महिलाओं के लिए सामाजिक बीमा सुरक्षा (Social Insurance Security) सुनिश्चित की जानी चाहिए। यह महिलाओं को राज्य से जीवन का अधिकार तथा अंगीकरण का अधिकार (Right to adoption) सुनिश्चित कराने में सक्षम बनाएगा।
  • कौशल सुधार एवं विकास के लिए व्यवसायिक प्रशिक्षण सुविधाओं का विकास किया जाना चाहिए तथा विधवाओं, परित्यक्त महिलाओं को सरकारी सेवाओं में आयु सीमा में छूट दिए जाने के साथ रोजगार अवसर उपलब्ध कराना चाहिए।

अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, (आईटीपीए) 1956 (Immoral Traffic (Prevention) Act, (ITPA) 1956)

महिलाओं एवं लड़कियों का अनैतिक व्यापार (दमन) अधिनियम, 1956 में मूलभूत परिवर्तन कर इसका पुन: नामकरण किया गया है। यह मुख्यतया आजीविका के संगठित साधन के रूप में वेश्यावृत्ति कराने के उद्देश्य से महिलाओं एवं लड़कियों के अवैध व्यापार पर रोक लगाता है या समाप्त करता है।

इस अधिनियम के अंतर्गत अपराध (Offence under this Act)

  • वेश्यावृत्ति के लिए व्यक्ति की खरीद करना।
  • किसी व्यक्ति को ऐसी जगह या भवन में रोकना जहाँ वेश्यावृत्ति होती है।
  • सार्वजनिक स्थलों पर होने वाली वेश्यावृत्ति।
  • वेश्यावृत्ति के लिए फुसलाना या आग्रह करना।
  • वेश्यावृत्ति की कमाई पर जीवन-यापन करना।
  • हिरासत में व्यक्ति को फुसलाना या पथभ्रष्ट करना।
  • वेश्यालय चलाना या घर या भवन को वेश्यालय के रूप में उपयोग करने की अनुमति देना।
  • बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम 1986 के अंतर्गत अपराध।
  • कुछ निश्चित प्रकार के कार्यों में बच्चों के रोजगार को प्रतिबंधित किया जाना।

अनैतिक व्यापार (निवारण) संशोधक विधेयक, 2006 (The Immoral Traffic (Prevention) Amendment Bill, 2006)

अनैतिक अवैध व्यापार (निवारण) अधिनियम 1956 वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए अवैध व्यापार एवं यौन शोषण को दंडात्मक अपराध बनाता है।

प्रमुख विशेषताएँ (Key Features)

इस विधेयक की पाँच प्रमुख विशेषताएँ हैं; -

  • पहली यह वेश्याओं दव्ारा ग्राहकों को लुभाने के मामलें में मुकदमा चलाए जाने के प्रावधन को समाप्त करता है।
  • दूसरी, यह ग्राहकों कर मुकदमा चलाने का प्रावधान करता है।
  • तीसरी, यह व्यक्ति के अवैध व्यापार को परिभाषित करता है और उसके लिए दंड का प्रावधान करता है।
  • चौथी यह कुछ अपराधों के लिए दंड में बढ़ोत्तरी करता है।
  • पाँचवी, यह केन्द्र एवं राज्य स्तर पर अनैतिक व्यापार को रोकने के लिए प्राधिकरण का गठन करता है। (यह विधेयक संसद में व्यपगत हो गया है)

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