Public Administration 1: Women Labour, Agriculture and Health

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भारत में महिलाओं की उन्नति एवं संरक्षण के लिए गठित तंत्र, विधि, संस्थाएँ एवं निकाय (Mechanism, Laws, Institutions and Bodies Constituted for the Protection and Betterment of Women in India)

आंतरिक विस्थापन, अपादा एवं प्रवासन से प्रभावित महिलाएँ (Women Impacted by Internal Displacement, Disaster and Migration)

  • या तो आर्थिक कारणों से
  • विवाद से, जैसे शरणार्थी महिलाएँ
  • विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) , बाँधों के निर्माण आदि के कारण विस्थापित महिलाएँ।
  • प्राकृतिक या मानव जनित आपदा से प्रभावित महिलाएँ

महिलायें एवं श्रम (Women and Labour)

  • घरेलू श्रमिक
  • बंधुआ श्रमिक
  • आवास विहीन निराश्रित महिलाएँ

महिलायें एवं कृषि (Women and Agriculture)

  • भूमिहीन महिलाएँ
  • सीमांत किसान
  • कृषि श्रमिक

महिलायें और स्वास्थ्य (Women and Health)

  • एचआईवी/एड्‌स से पीड़ित महिलाएँ
  • जानलेवा बीमारियों से पीड़ित महिलाएँ
  • नि: शक्तता से पीड़ित महिलाएँ
  • बुजुर्ग महिलाएँ

झुग्गीवासी (Slum Dwellers)

महिला कैदी (Women Prisoners)

नृजातीय व सामाजिक रूप से असुरक्षित समुदायों की महिलाएँ (Women Belonging to Ethnic and Socially Vulnerable Communities)

  • नृजातीय एवं धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाएँ (विशेषकर मुसलमान)
  • सामाजिक रूप से पिछड़े समुदायों (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति) की महिलाएँ।

एकल महिला (Single Women)

  • किशोर लड़कियाँ
  • विधवाएँ
  • वैसी महिलाएँ जिनके पति संघर्ष या आर्थिक प्रवासन के कारण अनुपस्थित हैं।
  • तलाकशुदा महिलाएँ

उपरोक्त श्रेणी की महिलाएँ अपनी अदव्तीय सामाजिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों या हिंसा दुर्व्यहार की पीड़ित होने के कारण अपने को ज्यादा कमजोर स्थिति में पाती हैं। इन समूहों की विशिष्ट आवश्यकताओं का समाधान करने के लिए विशेष हस्तक्षेप या उपायों की आवश्यकता होती है। उनकी विशिष्ट आवश्यकताओं का समाधान करने के लिए प्रायोगिक तौर पर शुरू की जाने वाली परियोजनाओं की संभावना का परीक्षण किया जा सकता है।

भारत में महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण संवैधानिक एवं विधिक प्रावधान (Important Constitutional and Legal Provisions for Women in India)

भारतीय संविधान की प्रस्तावना में मौलिक अधिकारों, मौलिक कर्त्तव्यों तथा नीति निदेशक सिद्धांतों में लैंगिक समानता के सिद्धांत को प्रतिष्ठापित किया गया है। संविधान न केवल महिलाओं के लिए समानता का प्रावधान करता है, बल्कि महिलाओं के पक्ष में सरंक्षणात्मक भेदभाव (Positive Discrimination) की नीति अपनाने के लिए राज्य को प्राधिकृत भी करता है। एक लोकतांत्रिक राजनीतिक संरचना के अंतर्गत हमारे कानूनों, विकास नीतियों, योजनाओं एवं कार्यक्रमों का लक्ष्य विभिन्न क्षेंत्रों में महिलाओं का विकास करना है। महिलाओं को समान अधिकार देने के उद्देश्य से भारत ने कई अंतरराष्ट्रीय अभिसमयों (Conventions) तथा मानवाधिकार दस्तावेजों की अभिपुष्टि की है। जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण 1993 का महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन संबंधी अभिसमय (Convention on Elimination of All forms of Discrimination Against Women-CEDAW) हैं।

संवैधानिक प्रावधान (Constitutional Provisions)

भारत का संविधान न केवल महिलाओं के लिए समानता का प्रावधान करता है; बल्कि उनके समक्ष आने वाली विभिन्न सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक और राजनीतिक अलाभकर दशाओं को प्रभाव शून्य बनाने के लिए महिलाओं के पक्ष में संरक्षणात्मक भेदभावों के उपायों को अपनाने के लिए राज्य को प्राधिकृत भी करता है। मौलिक अधिकार, विधि के समक्ष समता तथा विधियों के समान संरक्षण, किसी भी नागरिक के विरुद्ध, धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध और राज्य के अधीन नियोजन में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समानता सुनिश्चित करते हैं और इस संबंध में संविधान के अनुच्छेद 14,15 (3) , 16,39 (क) , 39 (क) , 39 (ख) , 39 (ग) और 42 का विशेष महत्व हैं।

संवैधानिक विशेषाधिकार (Constitutional Privileges)

  • महिलाओं को विधि के समक्ष समता (अनुच्छेद 14) ।
  • राज्य किसी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म, मूलवंश-जाति लिंग, जन्मस्थान या उनमें से किसी एक के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा। (अनुच्छेद 15 (1) ) ।
  • राज्य महिलाओं एवं बच्चों के पक्ष में विशेष प्रावधान कर सकता है। (अनुच्छेद 15 (3) ) ।
  • राज्य के अधीन किसी भी पद पर नियोजन या नियुक्ति के संबंध में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समानता। (अनुच्छेद 16) ।
  • राज्य अपनी नीति का, इस प्रकार संचालन करेगा कि सुनिश्चित रूप से पुरुष और स्त्री सभी नागरिकों को समान रूप से जीविका का पर्याप्त साधान प्राप्त करने का अधिकार हो। (अनुच्छेद 39 (क) ) ।
  • राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि विधिक तंत्र इस प्रकार काम करें कि समान अवसर के आधार पर न्याय सुलभ हो और वह, विशिष्टतया यह सुनिश्चित करने के लिए आर्थिक या किसी अन्य नियोग्यता के कारण कोई नागरिक न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न रह जाए, उपयुक्त विधान या स्कीम या किसी अन्य रीति से नि: शुल्क विधिक सहायता की व्यवस्था करेगा। (अनुच्छेद 39 क) ।
  • राज्य काम की न्यायसंगत और मानवांचित दशाओं की सुनिश्चित करने के लिए और प्रसुति सहायता के लिए उपबंध करेगा। (अनुच्छेद 42) ।
  • राज्य, जनता के दुर्बल वर्गों के विशिष्टतया, अनुसूचित जातियों और अनुसचित जनजातियों के शिक्षा एवं अर्थ संबंधी हितों की विशेष सावधानी से अभिवृद्धि करेगा और सामाजिक अन्याय और सभी प्रकार के शोषण उसे उनकी संरक्षा करेगा। (अनुच्छेद 46) ।
  • राज्य अपने लोगों के पोषाहार स्तर एवं जीवन स्तर को ऊँचा करेगा। (अनुच्छेद 47) ।
  • भारत के सभी लोगों में समरसता एवं समान भातृत्व की भावना का निर्माण करें तथा ऐसी प्रथाओं का त्याग करें जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध हैं। (अनुच्छेद 51 क (ङ) ) ।
  • प्रत्येक पंचायत में प्रत्यक्ष निर्वाचन दव्ारा भरे जाने वाले स्थानों की कुल संख्या के कम से कम एक-तिहाई स्थान (जिनके अंतर्गत अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की स्त्रियों के लिए आरक्षित स्थानों की संख्या भी शामिल है) स्त्रियों के लिए आरक्षित रहेंगे और ऐसे स्थान किसी पंचायत में भिन्न-भिन्न निर्वाचन क्षेत्रों को चक्रानुक्रम से आवंटित किए जा सकेंगे। (अनुच्छेद 243 घ (3) ) ।
  • प्रत्येक स्तर पर पंचायतों में अध्यक्षों के पदों की कुल संख्या के कम से कम एक-तिहाई पर स्त्रियों के लिए आरक्षित रहेंगे। (अनुच्छेद 243 D (4) ) ।
  • प्रत्येक नगरपालिका में प्रत्यक्ष निर्वाचन दव्ारा भरे जाने वाले स्थानों की कुल संख्या के कम से कम एक-तिहाई स्थान (जिनके अंतर्गत अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की स्त्रियों के लिए आरक्षित स्थानों की संख्या भी है) स्त्रियों के लिए आरक्षित रहेंगे और ऐसे स्थान किसी नगर पालिका के भिन्न-भिन्न निर्वाचन-क्षेत्रों को चक्रानुक्रम से आवंटित किए जा सकेंगे। (अनुच्छेद 243 न (3) ) ।
  • नगरपालिकाओं में अध्यक्षों के पद अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और स्त्रियों के लिए ऐसी रीति से आरक्षित रहेंगे, जो राज्य का विधानमंडल, विधि दव्ारा उपबंधित करे। (अनुच्छेद 243 न (4) ) ।

संवैधानिक आदेश (Mandate) का पालन करने के लिए राज्य ने समान अधिकारों को सुनिश्चित करने, सामाजिक भेदभाव, भिन्न प्रकार की हिंसा एवं अत्याचार और विशेषकर कामकाजी महिलाओं को सहायक सेवाएँ उपलब्ध कराने के लिए अनेक विधायी उपाय किए हैं। यद्यपि महिलाएँ हत्या, डकैती, धोखेबाजी आदि की शिकार हो सकती हैं लेकिन वैसे अपराध जो विशेषकर महिलाओं के विरुद्ध किए जाते हैं वे महिलाओं के विरुद्ध अपराध (Crimes Against Women) की श्रेणी में आते हैं।

भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत चिन्हित किए गए अपराध (The Crime Identified under the Indian Penal Code (IPC) )

  • बलात्कार (भारतीय दंड संहिता की धारा-376)
  • अपहरण एवं विभिन्न उद्देश्यों के लिए किसी को बलपूर्वक उठा ले जाना (भारतीय दंड संहिता की धारा 363 - 373)
  • दहेज के लिए हत्या, दहेज हत्या का प्रयास (भारतीय दंड संहिता की धारा 302/304-बी)
  • प्रताड़ता, मानसिक और शारीरिक दोनों। (भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए)
  • छेड़छाड़ (भारतीय दंड संहिता की धारा 354)
  • यौन उत्पीड़न (भारतीय दंड संहिता की धारा 509)
  • लड़कियों को लाना- ले -जाना (21 वर्ष की आयु तक)

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