Quasi-Judicial Institutions: National Commission for Backward Classes

Get top class preparation for CTET-Hindi/Paper-1 right from your home: get questions, notes, tests, video lectures and more- for all subjects of CTET-Hindi/Paper-1.

राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (National Commission for Backward Classes)

  • मंडल मामले के फैसले (1992) में उच्चतम न्यायालय ने केन्द्र सरकार को एक ऐसे स्थायी वैधानिक निकाय को गठित करने का निर्देश दिया था, जो पिछड़े वर्गों की सूची में नागरिकों के किसी भी वर्ग के अल्प समावेशन या गैर समावेशन की शिकायतों का परीक्षण कर सके।
  • उच्चतम न्यायालय के दिशानुसार संसद दव्ारा पिछड़ा वर्ग के लिए राष्ट्रीय आयोग अधिनियम, 1993 (1993 का अधिनियम संख्या 27) पारित किया गया और 1993 में भारत सरकार दव्ारा राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग स्थापित किया गया। यह आयोग एक अर्द्ध न्यायिक निकाय है। यह जम्मू और कश्मीर राज्य के अलावा पूरे भारत में फैली हुई है।
  • “पिछड़ा वर्ग” शब्द का मतलब, अनुसूचित जनजातियों और जनजातियों को छोड़कर नागरिकों के ऐसे सभी पिछड़े वर्गों से है, जा केन्द्र सरकार की सूचियों में उपलब्ध किया जा सकता है।

आयोग की संरचना (Commission Structure)

केन्द्र सरकार को प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करने के लिए पिछड़ा वर्ग के लिए राष्ट्रीय आयोग के रूप में जाना जाता है। इस अधिनियम के तहत यह साैेपे गये कार्य को करने के लिए केन्द्र सरकार दव्ारा आयोग में नामित निम्नलिखित सदस्य होंगे-

  • एक अध्यक्ष, जो उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय का न्यायाधीश है अथवा रहा हो।
  • पिछड़े वर्ग से संबंधित मामलों में विशेष ज्ञान रखने वाले दो व्यक्ति एवं
  • एक सदस्य सचिव हो केन्द्र सरकार में सचिव श्रेणी में समकक्ष अधिकारी है अथवा रहा हो।

सदस्यों का कार्यकाल (Tenure of Members)

आयोग के सदस्यों का कार्यकाल पद ग्रहण करने की तारीख से 3 वर्ष का होता है। फिर भी केन्द्र सरकार को संबोधित अपने त्याग पत्र के दव्ारा किसी भी समय अपना पद त्याग कर सकते हैं। यही नियम अध्यक्ष पर भी लागू होगा। इसके अतिरिक्त केन्द्र सरकार दव्ारा निम्नलिखित परिस्थितियों में आयोग के किसी भी सदस्य को उसके कार्यकाल से पूर्व भी हटा सकती है यदि-

  • वह दिवालिया घोषित हो जाता है।
  • उसे सक्षम न्यायायल दव्ारा मानसिक रूप से अस्वस्थ्य घोषित किया गया है।
  • उसे किसी ऐसे अपराध के लिए दोषी या दंडित किया जाता है जो केन्द्र सरकार की दृष्टि में नैतिक भ्रष्टता के अंदर आता है।
  • वह कार्य करने से मना करता है या कार्य करने में अक्षम होता है।
  • आयोग की अनुपस्थिति की छुट्‌टी प्राप्त किये बिना, आयोग की लागतार तीन बैठकों से अनुपस्थित है अथवा
  • वह अपने पद का इस तरह से दुरुपयोग करता है कि केन्द्र सरकार की दृष्टि में उसका पद पर बने रहना पिछड़ा वर्ग के हितों या लोकहितो के लिए हानिकर माना जाता है।

परन्तु इसके बावजूद, किसी भी सदस्य को हटाने से पहले उस मामले में अपने पक्ष की सुनवाई किये जाने का अवसर दिया जाना आवश्यक है।

आयोग के कार्य (Commission Work)

पिछड़े वर्गो के संदर्भ में आयोग के कार्य निम्नलिखित हैं-

  • पिछड़े वर्गो की केन्द्रीय सूचियों में आयोग पिछड़े वर्ग के रूप में नागरिकों के किसी भी वर्ग के समावेशन हेतु प्रस्तुत आवेदनों का परीक्षण करेगा और सूचियों में किसी भी पिछड़े वर्ग के अति समावेशन या अल्प समावेशनों की शिकायतों को सुनेगा तथा केन्द्र सरकार को उचित परामर्श देगा।
  • आयोग की सलाह आमतौर पर केन्द्र सरकार पर बाध्यकारी होगा।
  • केन्द्र सरकार प्रत्येक 10 वर्ष के पश्चात्‌ इन सूचियों का पुनरीक्षण करेगी ताकि इनमें से कुछ वर्गों को बाहर रखा जा सके एवं कुछ नये वर्गो को इनमें शामिल किया जा सके। इस पुनरीक्षण के कार्य में केन्द्र सरकार आयोग के साथ परामर्श करेगी।

आयोग की शक्तियाँ (Powers of Commission)

धारा 9 की उपधारा (1) के तहत आयोग की अपनी प्रक्रिया खुद विनियमित करने की शक्ति प्राप्त है। पिछड़े वर्गो की सूची में नागरिकों के किसी वर्ग के समावेशन अथवा अति समावेशन या अल्प समावेशन से जुड़े कार्यो को निष्पादित करते समय आयोग के पास एक सिविल अदालत की सभी शक्तियाँ प्राप्त होगी जो निम्नलिखित मामलों में विशेष रूप से प्रभावी होगी-

  • भारत के किसी भी हिस्से से किसी भी व्यक्ति को हाजिर कराना तथा शपथ पत्र पर उसकी परीक्षा करना।
  • किसी भी दस्तावेज की खोज और उत्पादन की मांग करना।
  • शपथ-पत्रों पर साक्ष्य प्राप्त करना।
  • किसी अदालत या कार्यालय से किसी भी सार्वजनिक रिकार्ड की मांग करना।
  • साक्ष्यों एवं दस्तावेजों के परीक्षण हेतु सम्मन जारी करना।
  • केन्द्र सरकार दव्ारा निर्धारित किया गया कोई भी अन्य विषय।

आयोग की रिपोर्ट (Commission Report)

  • केन्द्र सरकार को आयोग एक वार्षिक रिपोर्ट भेजता है इस रिपोर्ट में पिछले वर्ष के दौरान आयोग की गतिविधियों का पूरा लेखा-जोखा होता है। केन्द्र सरकार इस रिपोर्ट को आयोग की सलाह पर की गयी कार्यवाही के व्याख्यात्मक स्मरण पत्र के साथ संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखती है।
  • इस स्मरण पत्र में ऐसी किसी भी सिफारिश को अस्वीकार करने के कारणों का उल्लेख होना भी आवश्यक होता है।

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (National Commission for Minorities)

  • राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग पाँच धार्मिक अल्पसंख्यकों में विश्वास की भावना पैदा करने के उद्देश्य से एक सांविधिक निकाय के रूप में 1993 में स्थापित किया गया। अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के लिए 1978 में भारत सरकार ने एक कार्यकारी प्रस्ताव के माध्यम से एक अल्पसंख्यक आयोग के गठन के लिए उत्तरदायी कारणों की व्याख्या की गयी।
  • बाद में यह आवश्यकता महसूस की गयी कि अल्पसंख्यक आयोग को एक वैधानिक दर्जा प्रदान किया जाय ताकि यह आयोग के कार्यप्रणाली एवं प्रभावशीलता के बारे में अल्पसंख्यकों के बीच विश्वास को बढ़ा सके।
  • इससे यह आयोग राज्य सरकारों, संघ शासित प्रशासनों एवं मंत्रालयों, केन्द्र सरकार के विभागों एवं अन्य संगठनों के साथ मिलकर कार्य कर सकेगा।
  • अल्पसंख्यकों के लिए राष्ट्रीय आयोग अधिनियम (1992) के पारित होने के साथ ही अल्पसंख्यक आयोग एक वैधानिक निकाय बन गया। ऐसे पहले वैधानिक आयोग का गठन 1993 में हुआ।
  • यह अधिनियम “अल्पसंख्यक” शब्द को परिभाषित नहीं करता है किन्तु यह अधिनियम के उद्देश्यों के लिए केन्द्र सरकार को यह शक्ति प्रदान करता है कि वह “अल्पसंख्यकों” को अधिसूचित कर सके। उसके अनुसार केन्द्र सरकार ने 1993 में पाँच धार्मिक समुदायों मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध एवं पारसी को अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में अधिसूचित किया है।

आयोग की संरचना (Commission Structure)

  • केन्द्र सरकार को प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करने के लिए राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के रूप में जाना जाता है। आयोग एक बहुसदस्यीय निकाय है, जिसमें एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष और पाँच सदस्य शामिल होते हैं। केन्द्र सरकार दव्ारा श्रेष्ठ गुणों, योग्यता और सत्यनिष्ठा के आधार पर सदस्यों को नामित किया जाता है फिर भी अध्यक्ष सहित पाँच सदस्यों का अल्पसंख्यक समुदायों के बीच से होना आवश्यक है।
  • अध्यक्ष एवं सदस्यों के वेतन, भत्ते तथा सेवा-शर्ते केन्द्र सरकार (अल्पसंख्यकों का मंत्रालय) दव्ारा निर्धारित किया जाता है, सदस्यों में उपाध्यक्ष भी शामिल हैं।

सदस्यों का कार्यकाल एवं पदच्युति (Tenure and Dismissal of Members)

इनका कार्यकाल तीन वर्ष का होता है फिर भी अध्यक्ष या सदस्य केन्द्र सरकार को संबोधित करके अपने त्याग-पत्र दव्ारा वे किसी भी समय अपना पद छोड़ सकते हैं।

अध्यक्ष या किसी सदस्य को उसके कार्यकाल पूरा होने से पूर्व भी केन्द्र सरकार निम्नलिखित परिस्थितियों में उनको पद से बर्खास्त कर सकती है यदि-

  • वह दिवालिया घोषित हो जाता है।
  • उसे सक्षम न्यायालय दव्ारा मानसिक रूप से अस्वस्थ्य घोषित किया गया है।
  • उसे किसी ऐसे अपराध के लिए दोषी या दंडित किया जाता है, जो केन्द्र सरकार की दृष्टि में नैतिक भ्रष्टाचार के अंतर्गत आता है।
  • वह कार्य करने से मना करता है या कार्य करने में अक्षम होता है।
  • वह आयोग की लगातार तीन बैठकों में अनुपस्थित रहता है।
  • वह अपने पद का इस तरह से दुरुपयोग करता है कि केन्द्र सरकार की दृष्टि से उसका पद पर बने रहना अल्पसंख्यकों के हितों या लोकहितों के लिए हानिकर माना जाता है।

परन्तु इसके बावजूद, किसी भी सदस्य को हटाने से पहले उस मामले में अपने पक्ष की सुनवाई किये जाने का अवसर दिया जाना आवश्यक है।

आयोग के कार्य (Commission Functions)

आयोग को एक 9 सूत्रीय जनादेश उपलब्ध कराया गया है जो निम्नलिखित है-

  • संघ एवं राज्यों में अल्पसंख्यकों के विकास की प्रगति का मूल्यांकन करना।
  • संविधान में और संसद दव्ारा पारित कानूनों और राज्य विधानमंडलों में उपलब्ध कराये गये सुरक्षा उपायों के काम की निगरानी।
  • केन्द्रीय सरकार दव्ारा अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा या राज्य सरकारों के लिए सुरक्षा उपायों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सिफारिशें करना।
  • अल्पसंख्यकों के अधिकारों और सुरक्षापायों के वंचन से जुड़ी शिकायते देखना तथा ऐसे मामलों को उपयुक्त प्राधिकारियों के समक्ष रखना।
  • अल्पसंख्यकों के विरुद्ध किसी भी प्रकार के भेदभाव से पैदा होने वाली समस्याओं का अध्ययन करना तथा उनके समाधान हेतु उपायों की अनुशंसा करना।
  • अल्पसंख्यकों के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक विकास से संबंधित मुद्दों पर अध्ययन, अनुसंधान और विश्लेषण का संचालन करना।
  • केन्द्र सरकार या राज्य सरकारों के अंतर्गत आने वाले किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय के संबंध में उचित उपाय सुझावित करना।
  • अल्पसंख्यकों से जुड़े किसी भी मामलें या उनके समक्ष आने वाली कठिनाइयों के बारे में केन्द्र सरकार को आवधिक या विशेष रिपोर्ट सौंपना।
  • केन्द्र सरकार दव्ारा आयोग को सौंपे गये किसी अन्य मामले को देखना।

आयोग की शक्तियाँ (Powers of Commission)

आयोग किसी भी मामले या शिकायत की जाँच-पड़ताल करते समय इसको एक सिविल अदालत की शक्तियाँ प्राप्त होती है। इन शक्तियों के तहत आयोग-

  • भारत के किसी भी भाग से किसी भी व्यक्ति को हाजिर कराना तथा शपथ पर उसकी परीक्षा करना।
  • किसी भी दस्तावेज की खोज या उत्पादन की माँग करना।
  • शपथ-पत्र पर साक्ष्य प्राप्त करना।
  • किसी भी अदालत या कार्यालय से कोई भी सार्वजनिक रिकार्ड की मांग करना।
  • गवाहों एवं दस्तावेजों के परीक्षण हेतु सम्मन जारी कर सकता है।
  • केन्द्र सरकार दव्ारा इसे सौंपा गया कोई अन्य मामला।

आयोग की रिपोर्ट (Commission Report)

आयोग केन्द्र सरकार को एक वार्षिक रिपोर्ट भेजता है। यह आवश्यकता पड़ने पर अन्य विशेष रिपोर्ट भी प्रेषित कर सकता हैं। केन्द्र सरकार ऐसी सभी रिपोर्टों को आयोग दव्ारा की गयी सिफारिशों पर होने वाली कार्यवाही के विस्तृत स्मरण पत्र के साथ संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखती है। इस स्मरण पत्र में किसी भी प्रकार की सिफारिश को अस्वीकार करने के कारणों का उल्लेख भी होता है। यदि ऐसी किसी भी रिपोर्ट का संबंध राज्य सरकार से जुड़े किसी मामले से होता है, तो आयोग ऐसी रिपोर्ट की एक प्रतिलिपि उस राज्य सरकार को भी अग्रसारित करता है। वह राज्य सरकार उस रिपोर्ट को आयोग की सिफारिशों पर की गयी कार्यवाही के स्मरण-पत्र के साथ विधानमंडल के समक्ष रखती है। इस स्मरण-पत्र में ऐसी किसी भी सिफारिश को अस्वीकार करने के कारणों का भी उल्लेख किया जाना जरूरी होता है।

Developed by: