Quasi-Judicial Institutions: Central Commissioner for Disabled Persons

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विकलांग व्यक्तियों के लिए केंद्रीय आयुक्त (Central Commissioner for Disabled Persons)

  • विकलांग व्यक्तियों के लिए केंद्रीय आयुक्त (अथवा आधिकारिक रूप से, विकलांग व्यक्तियों के लिए मुख्य आयुक्त) का पद विकलांग व्यक्तियों (समान अवसर, अधिकारियों का संरक्षण व पूर्ण भागीदारी) अधिनियम 1995 के अंतर्गत गठित किया गया था और इसे विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों की सुरक्षा हेतु कदम उठाने के लिए अधिदेशित किया गया है।
  • विकलांग व्यक्ति अधिनियम, (1995) मूलत: उन सुविधाओं को सूचीबद्ध करता है, जो विभिन्न प्रकार के विकलांग व्यक्तियों को उपलब्ध करायी जानी है तथा यह उन जिम्मेदारियों एवं प्रतिबद्धताओं को भी निर्धारित करता है जो केन्द्र सरकार, राज्य सरकारों, स्थानीय निकायों और अन्य संगठनों पर लागू होती है। इसमें विकलांगता की शुरूआती पहचान और रोकथाम, शिक्षा, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, शोध और मानव शक्ति विकास, बाधारहित पहुँच इत्यादि से जुड़े उपायों को शामिल किया गया है। इसमें इन प्राथमिकताओं एवं सुविधाओं के संबंध में किये जाने वाले उपायों को शामिल किया गया है, जो विकलांग व्यक्तियों को उपलब्ध हैं। यह अधिनियम विकलांग व्यक्तियों के विरुद्ध होने वाले किसी भी प्रकार के भेदभाव को रोकने के लिए आवश्यक कार्यवाहियों के लिए भी अनुशंसाएं करने का प्रावधान करता है। इस अधिनियम के अनुसार भारत सरकार के स्तर पर एक मुख्य आयुक्त एवं प्रत्येक राज्य में एक आयुक्त की व्यवस्था की गयी है।

मुख्य आयुक्त की नियुक्ति (Appointment of Chief Commissioner)

  • केन्द्र सरकार, अधिसूचना दव्ारा इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए विकलांग व्यक्तियों के लिए एक मुख्य आयुक्त नियुक्त कर सकता है।
  • पुनर्वास से जुड़े मामलों में विशेष ज्ञान या व्यवहारिक अनुभव रखने वाले व्यक्ति को ही मुख्य आयुक्त के रूप में नियुक्ति का पात्र माना जाएगा।
  • मुख्य आयुक्त का वेतन, भत्ते व अन्य सेवा शर्तें (पेंशन, ग्रेच्युटी एवं अन्य सेवानिवृत्ति लाभों सहित) केन्द्र सरकार दव्ारा निर्धारित किया जाएगा।
  • केन्द्र सरकार मुख्य आयुक्त को उनके कार्यो के निष्पादन में सहायता देने के लिए आवश्यक अधिकारियों एवं अन्य कर्मचारियों की प्रकृति एवं श्रेणियों का निर्धारण करेगी और इस प्रकार के उपयुक्त अधिकारी एवं कर्मचारी मुख्य आयुक्त के लिए उपलब्ध कराएगी।
  • मुख्य आयुक्त के लिए उपलब्ध कराये गये कर्मचारी एवं अधिकारी मुख्य आयुक्त के सामान्य अधिवीक्षण के तहत अपने कार्यों का निर्वहन करेगा।
  • मुख्य आयुक्त को उपलब्ध कराये गये अधिकारियों और कर्मचारियों की सेवा के वेतन एवं भत्ते तथा अन्य सेवा-शर्तें केन्द्र सरकार दव्ारा निर्धारित किया जा सकता है के रूप में इस तरह किया जाएगा।

मुख्य आयुक्त के कार्य (Functions of Chief Commissioner)

  • विकलांगता अधिनियम के अनुसार, मुख्य आयुक्त स्वयं की पहल पर या किसी भी पीड़ित व्यक्ति के आवेदन पर या अन्य के संबंध में शिकायतों पर गौर कर सकते हैं-
    • विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों की हानि।
    • विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों के संरक्षण एवं उनके कल्याण हेतु सरकारों या स्थानीय प्राधिकारियों दव्ारा निर्मित या जारी कानूनों, नियमों, उपनियमों, विनियमों, कार्यकारी आदेशों, निर्देशों का गैर-क्रियान्वयन।
  • इसके अतिरिक्त अन्य कार्य हैं-
    • मुख्य आयुक्त राज्य आयुक्तों के कार्य के साथ समन्वय स्ाापित करेगा।
    • केन्द्र सरकार दव्ारा वितरित धनराशि के उपयोग पर निगरानी रखना।
    • विकलांग व्यक्तियों के लिए उपलब्ध अधिकारी एवं सुविधाओं की रक्षा के लिए कदम उठाना।
    • वह केन्द्र सरकार को निश्चित समयांतराल पर या सरकार दव्ारा निर्धारित अवधि में अधिनियम के कार्यान्वयन से जुड़ी रिपोर्ट प्रेषित करेगा।

मुख्य आयुक्तों की शक्तियाँ (Powers of Chief Commissioners)

मुख्य आयुक्त को अधिनियम के अधीन अपने कार्यों का निष्पादन करने के उद्देश्य से निम्नलिखित मामलों में सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 के अंतर्गत एक सिविल अदालत की शक्तियाँ प्राप्त होगी-

  • गवाहों की उपस्थिति के लिए समन जारी करना।
  • किसी भी दस्तावेज की खोज या उत्पादन की माँग करना।
  • शपथ-पत्र पर साक्ष्य प्राप्त करना।
  • किसी भी अदालत या कार्यालय से कोई भी सार्वजनिक रिकार्ड की मांग करना।
  • गवाहों एवं दस्तावेजों के परीक्षण हेतु सम्मन जारी कर सकता है।

मुख्य चुनाव आयुक्त के समक्ष होने वाली कोई भी प्रक्रिया या कार्यवाही भारतीय दंड संहिता 1860 के अधीन एक न्यायिक प्रक्रिया या कार्यवाही होगी। मुख्य आयुक्त को अपराध प्रक्रिया संहिता 1973 के उद्देश्य के लिए भी एक सिविल अदालत के रूप में देखा जाएगा।

वार्षिक रिपोर्ट (Annual Report)

मुख्य आयुक्त पिछले वर्ष की अपनी गतिविधियों का पूरा लेखा-जोखा सहित एक वार्षिक रिपोर्ट केन्द्र सरकार को प्रेषित करता है। वार्षिक रिपोर्ट में निम्नलिखित मामलों से संबंधित सूचनाएंँ शामिल होती हैं-

  • अधिकारियों के नाम, कार्यालय के कर्मचारी और संगठनात्मक संरचना को दर्शाने वाला एक चार्ट।
  • अधिनियम के अधीन मुख्य आयुक्त दव्ारा निष्पादित किये गये कार्य और इस संबंध में उसके काम निष्पादन की जानकारी।
  • मुख्य आयुक्त दव्ारा दी गयी सिफारिशें।
  • अधिनियम के कार्यान्वयन में होने वाली राज्यवार प्रगति।
  • समय-समय पर केन्द्र सरकार दव्ारा निर्दिष्ट या मुख्य आयुक्त दव्ारा उचित समझा गया कोई अन्य विषय।

केन्द्र सरकार मुख्य आयुक्त दव्ारा दी गयी सिफारिशों पर होने वाली कार्यवाही के एक स्मरण-पत्र के साथ उसकी रिपोर्ट की संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखती है। इस स्मरण-पत्र में ऐसी किसी भी सिफारिश को अस्वीकार करने के कारणों का उल्लेख होना आवश्यक होता है।

राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (National Commission Disputes Redresses Commission)

  • राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग एक अर्ध न्यायिक निकाय है। इस आयोग की स्थापना उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत 1988 में किया गया था। यह अधिनियम उपभोक्ताओं के अधिकारों का संवर्द्धन और संरक्षण के लिए उनको एक उदार सामाजिक विधान प्रदान करता है। भारत में अपनी तरह का यह पहला अधिनियम है क्योंकि यह उपभोक्ताओं की शिकायतों का कम खर्चीला एवं अक्सर शीघ्र निवारण तथा उनको सुरक्षित करने के लिए सक्षम है।
  • यह अधिनियम उपभोक्ता विवादों के समाधान हेतु एक त्रिस्तरीय उपागम उपलब्ध कराता है। उपभोक्ता अदालत के इन तीन स्तरों को क्रमश: जिला उपभोक्ता विवाद निवारण फॉरेम (जिला फोरम) , राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (राज्य आयोग) तथा राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (राष्ट्रीय आयोग) कहा जाता है।
  • जिला फोरम और राज्य आयोग केन्द्र सरकार की अनुमति के बाद राज्यों दव्ारा गठित किये जाते है, जबकि राष्ट्रीय आयोग केन्द्र सरकार दव्ारा गठित होता है। इन अदालतों ने सिविल अदालतों के क्षेत्राअधिकार का अतिक्रमण नहीं किया है किन्तु ये एक वैकल्पिक उपचार उपलब्ध कराती हैं।
  • वर्तमान में देश में 629 जिला फोरम, 35 राज्य आयोग और राष्ट्रीय आयोग का गठन किया जा चुका है। उपभोक्ता अदालतों के त्रिस्तरीय पर अनुक्रम में सबसे शीर्ष पर राष्ट्रीय आयोग होता है।

आयोग की संरचना (Commission Structure)

  • राष्ट्रीय आयोग उपभोक्ता विवादों का सस्ता, त्वरित और संक्षिप्त निवारण प्रदान करता है। राष्ट्रीय आयोग में एक अध्यक्ष और कम से कम 4 सदस्य (जिसमें एक सदस्य का महिला होना आवश्यक है) शामिल होते हैं। अध्यक्ष के पद ऐसे व्यक्ति को नियुक्त किया जाता है जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश हो या रहा है। सदस्यों का चुनाव ऐसे लोगों में से किया जाता है जो योग्यता, सत्यनिष्ठा के अलावा अर्थशास्त्र, कानून, वाणिज्य, लेखा, उद्योग, लोक मामले या प्रशासन से संबंधित समस्याओं से निपटने में कम से कम 10 वर्ष का अनुभव और पर्याप्त ज्ञान रखते हों।
  • आयोग की नियुक्ति भारत के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से केन्द्र सरकार दव्ारा की जाती है। आयोग के अन्य सदस्यों की नियुक्ति एक चयन समिति की सिफारिश पर केन्द्र सरकार दव्ारा की जाती है। इस चयन समिति में निम्न व्यक्ति शामिल होते है-
    • एक व्यक्ति जो उच्चतम न्यायालय का न्यायधीश हो और जिसे मुख्य न्यायाधीश दव्ारा नामित किया जाये (अध्यक्ष) ।
    • भारत सरकार के कानूनी मामलों के विभाग का सचिव (सदस्य)
    • भारत सरकार के उपभोक्ता मामलों के विभाग का सचिव (सदस्य) ।
  • राष्ट्रीय आयोग का प्रत्येक सदस्य 5 वर्ष या 70 वर्ष की आयु तक (जो भी पहले हो) पद धारण करता है। अध्यक्ष या एक सदस्य के पद में होने वाली रिक्त को उसके कार्यकाल पूरा करने, उसकी मृत्यु होने, त्याग-पत्र या पदच्युति के बाद ही भरा जा सकता है।

पदच्युति (Dismissal)

अध्यक्ष या किसी सदस्य को केन्द्र सरकार निम्नलिखित आधारों पर हटा सकती है-

  • दिवालिया घोषित हो जाता है।
  • किसी ऐसे अपराध के लिए दोषी सिद्ध किया गया हो जो केन्द्र सरकार की दृष्टि में नैतिक भ्रष्टाचार के अंतर्गत आता है।
  • शारीरिक या मानसिक रूप से अक्षम हो।
  • ऐसे वित्तीय या अन्य हितों की पूर्ति करे, जो अध्यक्ष या सदस्य के रूप में उसके गलत कार्यों से प्रभावित कर सकते हैं।
  • आयोग की लगातार तीन बैठकों में अनुपस्थित रहा हो।
  • अपने पद का इस प्रकार दुरुपयोग करे कि उसका पद पर बने रहना लोकहित के लिए हानिकर हो।

अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction)

  • आर्थिक अधिकार क्षेत्र: राष्ट्रीय आयोग उपभोक्ता अदालतों का उच्चतम स्तर है, इसलिए यह उन सभी मामलों की सुनवाई कर सकता है जहाँ दावें का मूल्य 1 करोड़ रूपये से अधिक हो।
  • प्रादेशिक अधिकार क्षेत्र: राष्ट्रीय आयोग का प्रादेशिक क्षेत्राधिकार समस्त भारत में (जम्मू एवं कश्मीर को छोड़कर) व्याप्त है। फिर भी यह अधिनियम तब लागू होता है जब कार्यवाही का कारण भारत में पैदा हुआ हो। यदि कार्यवाही का कारण भारत से बाहर उत्पन्न होता है तो उस मामले में राष्ट्रीय आयोग के पास सुनवाई का कोई अधिकार नहीं होगा।
  • अपीलीय क्षेत्राधिकार: राष्ट्रीय आयोग किसी भी राज्य आयोग के विरुद्ध अपीलें सुनता है। राज्य आयोग के आदेश की तारीख से 30 दिनों के भीतर ऐसी अपील की जा सकती है फिर भी राज्य आयोग 30 दिनों की अवधि के बाद भी दाखिल की गयी किसी अपील को सुन सकता है। यदि वह इस बात से संतुष्ट हो कि दिये गये समय के भीतर अपील न दाखिल करने को कोई पर्याप्त कारण मौजूद था।
  • पुनरीक्षणात्मक अधिकार क्षेत्र : राष्ट्रीय आयोग किसी भी राज्य आयोग दव्ारा निर्णीत या उसके समक्ष लंबित किसी उपभोक्ता विवाद के संबंध में रिकार्ड मांग सकता है और उपयुक्त आदेश जारी कर सकता हैं परन्तु ऐसे मामले में राज्य को आभास होना चाहिए कि राज्य आयोग ने
    • अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया हैं।
    • अपने अधिकार क्षेत्र का उपयोग नहीं किया है।
    • अपने अधिकार क्षेत्र का अवैधानिक या भौतिक अनियमितता के साथ उपयोग किया है।
  • राष्ट्रीय आयोग के विरुद्ध 30 दिनों के भीतर या उच्चतम न्यायालय दव्ारा निर्धारित समयावधि में उच्चतम न्यायालय के समक्ष अपील की जा सकती है।

प्रशासनिक नियंत्रण (Administrative Control)

राष्ट्रीय आयोग निम्नलिखित मामलों में सभी राज्य आयोगों पर प्रशासनिक नियंत्रण रखता हैं-

  • वादों के संस्थापन, लंबन और निपटान के संबंध में आवधिक ब्यौरे की मांग करना।
  • मामले की सुनवाई में एकरूप प्रक्रिया के अंगीकरण, एक पक्ष दव्ारा प्रतिपक्षियों के लिए उत्पादित दस्तावेजों की प्रतियों की अग्रिम सेवा, किसी भाषा में लिखित निर्णयों के अंग्रेजी अनुवाद की पूर्ति, दस्तावेजों की प्रतियों की त्वरित मंजूरी आदि के बारे में निर्देश जारी करना।
  • राज्य आयोगों या जिला फोरमों के कार्यप्रणाली पर सामान्य निगरानी रखना ताकि उनकी अर्द्ध न्यायिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप किये बिना अधिनियम के उद्देश्यों एवं लक्ष्यों की पूर्ति को सुनिश्चित किया जा सके।

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