Quasi-Judicial Institutions: Central Information Commission and Structure of Commission

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राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (National Commission for Scheduled Castes)

  • संविधान निर्माताओं ने इस बात को महसूस किया कि हमारे देश में कुछ समुदाय सामाजिक, शैक्षिक एवं आर्थिक तौर पर अत्यधिक पिछड़े हुए हैं। इस पिछड़ेपन का मुख्य कारण सदियों से चली आ रही अस्पृश्यता, परंपरागत कृषि प्रणाली, आधारभूत सुविधाओं का अभाव एवं भौगोलिक अलगाव आदि रहे हैं तथा इनके हितों के संरक्षण एवं तीव्र सामाजिक आर्थिक विकास हेतु विशेष प्रावधान किये जाने की जरूरत है। इन समुदायों को संविधान के अनुच्छेद 341 एवं 342 के अंतर्गत अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति कहा गया। शासन में इनकी उचित भागीदारी सुनिश्चित करने और विकास की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए आरक्षण की नीति अपनाना महत्वपूर्ण समझा गया। इनके हितों की अभिवृद्धि के लिए किए गए संवैधानिक प्रावधानों एवं अन्य विधिक उपबंधों के संरक्षण के लिए संविधान के अनुच्छेद 338 के अंतर्गत एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति का प्रावधान किया गया। संसद सदस्यों दव्ारा किए जा रहे निरंतर मांग के परिप्रेक्ष्य में इसे 1978 में बहुसदस्यीय बना दिया गया। 1987 में इसका नाम अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग से बदलकर राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग कर दिया गया। 89वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 के माध्यम से राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग को दो भागों में बाँट दिया गया। यह अधिनियम 2004 से प्रभावी हुआ।
  • राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग।
  • राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग का गठन संविधान के अनुच्छेद 338 के तहत किया गया है। इस तरह राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग एक संवैधानिक निकाय (Constitutional Body) है। इस अधिकारी का दायित्व अनुसूचित जातियों से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के क्रियान्वयन का निरीक्षण करना तथा इससे संबंधित वार्षिक प्रतिवेदन राष्ट्रपति को सौंपना है।

आयोग के कार्य (Functions of Commission)

  • संविधान में अनुसूचित जातियों के संरक्षण से संबंधित प्रावधानों के साथ-साथ समय-समय पर उनके लिए सरकार दव्ारा बनाए गए कानूनों का क्रियान्वयन सुनिश्चित करना। साथ ही इनका निरीक्षण अधीक्षण एवं समीक्षा भी करना।
  • अनुसूचित जातियों के संरक्षण एवं उनके अधिकारों के उल्लघंन से संबंधित किन्हीं विशेष शिकायतों की जांच करना।
  • अनुसूचित जातियों के सामाजिक आर्थिक विकास से संबंधित योजना प्रक्रिया में सहभागिता करना एवं परामर्श देना और केन्द्र एवं राज्यों के अधीन उनके विकास का मूल्यांकन करना।
  • इनके संरक्षण से संबंधित किए जा रहे कार्यो का वार्षिक विवरण राष्ट्रपति को सौंपना। अन्य समय में भी जब आयोग उचित समझे रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंप सकता है।
  • इनके संरक्षण से संबंधित प्रावधानों के प्रभावी क्रियान्वयन की तथा इनके संरक्षण, कल्याण एवं सामाजिक-आर्थिक विकास हेतु अन्य उपायों की सिफारिश करना।
  • इनके संरक्षण, कल्याण, विकास एवं उन्नति से संबंधित अन्य विशेष कानूनों को लागू करने से संबंधित अन्य कार्य करना जो राष्ट्रपति उसे सौंपे।

आयोग अनुसूचित जातियों पर होने वाले अत्याचार या उत्पीड़न के मामलों में स्वत: संज्ञान लेकर कार्रवाई शुरू कर देती है। यह अनुसूचित जातियों के लिए विधायन से संबंधित मामलों में स्वत: संज्ञान लेकर अपनी राय जाहिर करती है।

आयोग की शक्तियाँ (Power of Commission)

किसी मामले या शिकायत की जाँच के संदर्भ में आयोग को सिविल कोर्ट की शक्तियाँ प्राप्त हैं। इस संबंध में उसे निम्नलिखित अधिकार प्राप्त हैं-

  • भारत के किसी भी भाग से किसी व्यक्ति को समन करना, हाज़िर करना तथा शपथ पर परीक्षण करना।
  • किसी साक्ष्य की खोज करवाना एवं उसे पेश करवाना।
  • शपथपत्र पर साक्ष्य लेना।
  • किसी भी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या उसके प्रति को प्राप्त करना।
  • गवाहों एवं दस्तावेजों के परीक्षण के लिए समन जारी करना।
  • कोई अन्य मामला जिसे राष्ट्रपति विधि दव्ारा निर्धारित करे।
    • यह भी प्रावधान किया गया है कि अनुसूचित जातियों से संबंधित बड़े नीतिगत फैसले लेते समय केन्द्र एवं राज्य सरकारों दव्ारा आयोग से परामर्श किया जाएगा। इसके साथ ही सार्थक कार्य निष्पादन हेतु अपनी प्रक्रियाओं को विनियमित करने का अधिकार आयोग को प्राप्त है।
    • आयोग के राज्य स्तर पर भी कार्यालय हैं जो इसके आँख और कान की तरह कार्य करते हैं। ये कार्यालय समय-समय पर अनुसूचित जातियों के हित में लिए गए नीतिगत फैसलों एवं जारी दिशा-निर्देशों के बारे में राज्यों एवं संघ शासित क्षेत्रों से मुख्यालय को सूचित करते रहते हैं। राज्य स्तर पर लिए गए किसी निर्णय से यदि अनुसूचित जातियों के अधिकार प्रभावित होते हैं तो संबंधित प्राधिकरणों से इनमें आवश्यक सुधार हेतु अनुरोध करते हैं। इस संबंध में प्रमुख बातों का उल्लेख आयोग की वार्षिक रिपोर्ट में किया जाता है। राष्ट्रपति इस रिपोर्ट को संबंधित राज्य के राज्यपालों के पास भी भेजता है। राज्यपाल इस रिपोर्ट को राज्य विधानमंडल में रखवाता है। इसके साथ वह ज्ञापन भी होता है जिसमें राज्य से संबंधित की गई सिफारिशों पर कार्रवाई या अस्वीकृति के कारणों का स्पष्ट उल्लेख होता हैं।

केन्द्रीय सूचना आयोग (Central Information Commission)

केन्द्रीय सूचना आयोग की स्थापना सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत की गई है। स्पष्ट है कि सूचना आयोग एक सांविधिक संस्था है, संवैधानिक नहीं। प्रत्येक लोक प्राधिकारी के कार्यकारण में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के संवर्द्धन के लिए तथा लोक प्राधिकारियों के नियंत्रणाधीन सूचना तक पहुँच सुनिश्चित करने के लिए नागरिकों के सूचना के अधिकार की व्यावहारिक शासन पद्धति स्थापित करने हेतु एक केन्द्रीय सूचना आयोग तथा राज्यों में राज्य सूचना आयोग का गठन किया गया है।

आयोग की संरचना (Structure of Commission)

  • केन्द्रीय सूचना आयोग में एक मुख्य सूचना आयुक्त तथा अधिकतम 10 सूचना आयूक्त हो सकते हैं। मुख्य सूचना आयुक्त एवं सूचना आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति दव्ारा एक समिति की सिफारिश पर की जाती है। इस समिति का अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता है। सदस्य के तौर पर लोकसभा में विपक्ष का नेता तथा प्रधानमंत्री दव्ारा नाम निर्दिष्ट एक मंत्री शामिल होता है।
  • केन्द्रीय सूचना आयोग के कार्यो का साधारण अधीक्षण, निदेशन और प्रबंधन मुख्य सूचना आयुक्त दव्ारा होता है। इसकी सहायता सूचना आयुक्तों दव्ारा की जाती है। मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त विधि, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, समाजसेवा, प्रबंधन, पत्रकारिता, जनसंपर्क माध्यम या प्रशासन का व्यापक ज्ञान और अनुभव रखने वाले प्रख्यात व्यक्ति होते है। मुख्य सूचना आयुक्त या सूचना आयुक्त संसद या विधान मंडल के सदस्य नहीं होते और न ही कोई लाभ का पद धारण कर सकते हैं। इनके लिए यह भी प्रावधान है कि ये किसी राजनीतिक दल से संबंधित नहीं होगे और न ही किसी वृत्ति या व्यापार में शामिल होंगे। केन्द्रीय सूचना आयोग का मुख्यालय दिल्ली में है, लेकिन आयोग केन्द्र सरकार की अनुमति से देश में अन्य स्थानों पर कार्यालय स्थापित कर सकता है।

पदावधि एवं सेवाशर्तें (Term and Service Conditions)

मुख्य सूचना आयुक्त तथा सूचना आयुक्त पद ग्रहण करने की तारीख से 5 वर्ष या 65 वर्ष की उम्र (इनमें जो भी पहले हो) तक पद धारण करता है। इस स्थिति में मुख्य सूचना आयुक्त या सूचना आयुक्त पुनर्नियुक्ति के पात्र नहीं होंगे। परन्तु जहाँ सूचना आयुक्त को मुख्य सूचना आयुक्त के रूप में नियुक्त किया जाता है वहाँ उसकी पदावधि सूचना आयुक्त तथा मुख्य सूचना आयुक्त के रूप में कुल मिलाकर 5 वर्ष से अधिक नहीं होगी। मुख्य सूचना आयुक्त तथा सूचना आयुक्त राष्ट्रपति या उसके दव्ारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अन्य व्यक्ति के समक्ष शपथ ग्रहण करते हैं।

पदमुक्ति या त्यागपत्र (Removal or Resignation)

मुख्य सूचना आयुक्त या कोई सूचना आयुक्त किसी भी समय राष्ट्रपति को संबोधित कर अपने हस्ताक्षर सहित लेख दव्ारा अपना पद त्याग सकता है। इसके अतिरिक्त मुख्य सूचना आयुक्त तथा सूचना आयुक्त को साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर राष्ट्रपति उनके पद से हटा सकता है, लेकिन हटाने से पहले उच्चतम न्यायालय राष्ट्रपति दव्ारा उसे दिए गए निर्देश पर जाँच के बाद ऐसी रिपोर्ट दी हो कि यथास्थिति मुख्य सूचना आयुक्त या सूचना आयुक्त को उस आधार पर हटा दिया जाना चाहिए। इसके अलावा राष्ट्रपति मुख्य सूचना आयुक्त एवं सूचना आयुक्त को निम्न आधारों पर भी हटा सकता है-

  • यदि वह दिवालिया घोषित किया गया हो।
  • यदि वह ऐसे अपराध के लिए दोषी ठहराया गया हो जो राष्ट्रपति की नज़र में नैतिक अद्यमता की श्रेणी में आता हो।
  • यदि वह अपनी पदावधि के दौरान किसी अन्य वैतनिक नियोजन में लगा हो।
  • राष्ट्रपति की राय में, मानसिक या शारीरिक अक्षमता के कारण पद पर बने रहने के अयोग्य हो।
  • यदि उसने ऐसे वित्तीय और अन्य हित अर्जित किए हों, जिनसे मुख्य सूचना आयुक्त या किसी सूचना आयुक्त के रूप में उसके कृत्यों या कर्तव्यों पर प्रतिकूल पड़ने की संभावना हो।

यदि मुख्य सूचना आयुक्त या कोई सूचना आयुक्त किसी प्रकार भारत सरकार दव्ारा या उसकी ओर से की गई किसी संविदा या करार से संबंद्ध है या उससे हितबद्ध है या किसी निगमित कंपनी के किसी सदस्य के रूप में या उसके अन्य सदस्यों के साथ उसके लाभ में या किसी तरह के फायदे में हिस्सा लेता है, तो वह कदाचार का दोषी माना जाएगा।

वेतन एवं भत्ते (Salary and Allowances)

मुख्य सूचना आयुक्त के वेतन, भत्ते एवं अन्य सेवा शर्ते वही होंगी जो मुख्य निर्वाचन आयुक्त की है तथा सूचना आयुक्त की वहीं होगी जो निर्वाचन आयुक्त की है। मुख्य सूचना आयुक्त एवं सूचना आयुक्त के वेतन, भत्तों एवं अन्य सेवा शर्तों में उनकी नियुक्ति के पश्चात्‌ कोई अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा।

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