Quasi-Judicial Institutions: Criticism and Challenges Before Planning Commission

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योजना आयोग (Planning Commission)

योजना आयोग के समक्ष चुनौतियाँ (Challenges Before Planning Commission)

  • योजना आयोग के समक्ष आज सबसे बड़ी चुनौती बदलते समय एवं परिस्थिति के अनुसार अपने आपको ढालने की है। यह देखा गया कि प्रथम पंचवर्षीय योजना से लेकर आठवीं पंचवर्षीय योजना तक योजना आयोग का मुख्य ध्यान सार्वजनिक क्षेत्रों के विस्तार पर रहा। हालाँकि नौवीं पंचवर्षीय योजना से उसने एक सलाहकार या सुविधा प्रदाता की भूमिका ग्रहण की। उदारीकरण एवं वैश्वीकरण के दौर में कोई भी देश आर्थिक सामर्थ्य को तब तक हासिल नहीं कर सकता है जब तक कि वह विश्व के अन्य देशों के साथ प्रतिस्पर्द्धा की क्षमता हासिल नहीं कर लेता है। हम आर्थिक रूप से सशक्त देशों के साथ तभी प्रतिस्पर्द्धा कर पाएंगे जब देश का आर्थिक एवं मानव संसाधन उत्कृष्ट श्रेणी का हो। यहाँ पर योजना आयोग की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। योजना आयोग पूरे देश के लिए जिसमें केन्द्र एवं राज्य दोनों शामिल होते हैं, योजना बनाता है। योजना बनाने के साथ ही उसके लिए चुनौतियाँ भी पैदा होने लगती हैं।
  • सबसे पहली चुनौती तो वित्त आबंटन की आती है। इसके लिए पर्याप्त धन की आवश्यकता होती है, जिसके लिए विकास दर को बढ़ाना होता है और यह वैश्वीकरण के उठते गिरते दौर में एक मुश्किल काम है। दूसरी तरफ वार्षिक योजनाओं के माध्यम से जब विभिन्न राज्यों को वित्त आबंटित किया जाता है तो राज्य सरकारें उचित-अनुचित आधारों पर योजना आयोग पर आरोप लगाते हैं। यह प्रवृत्ति तब और भी बढ़ी हुई देखने को मिलती है, जब राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारें होती हैं। ऐसे आरोप न लगे, यह योजना आयोग के समक्ष एक चुनौती है।
  • योजना को लेकर केन्द्र-राज्यों के बीच विवाद देखने को मिलता है। आयोग देश की योजना के लिए कुछ आधारभूत विषय निश्चित करता है। लेकिन प्रत्येक राज्य की समस्याएँ अलग-अलग हैं। यही कारण है कि उनकी मूल-समस्याओं का निराकरण नहीं हो पाता। केन्द्रीय कैबिनेट योजना के संबंध में अंतिम निर्णय लेती है जबकि इसका क्रियान्वयन राज्य की कार्यपालिका दव्ारा होता है। राज्यों के पास अपने योजना बोर्ड नहीं है, जो योजनाओं को तकनीकी दृष्टि से निश्चित कर सके।
  • योजना आयोग की अगली चुनौती योजना क्रियान्वयन से जुड़ी होती है। योजना आयोग के पास प्रभावी क्रियान्वयन एजेन्सी का अभाव है। देश के अलग-अलग भागों में अलग-अलग तरह की समस्याएँ है। कहीं कानून व्यवस्था और नक्सलवाद जैसी समस्याएँ हैं तो कहीं अन्य स्थानीय एवं सामूदायिक समस्याएँ हैं। ऐसी स्थिति में योजना आयोग के सामने यह चुनौती बन जाती है कि वह एक प्रभावी क्रियान्वयन एजेन्सी के साथ-साथ योजना निर्माण में पर्याप्त लचीलापन लाए ताकि क्रियान्वयन एजेन्सियों को स्थानीय जरूरतों के प्रति उत्तरदायी एवं नवप्रवर्तनशील (Responsive and Innovative) होने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके।
  • कई बार यह देखने को मिलता है कि योजना आयोग दव्ारा तय मानदंड या आँकड़, राज्यों दव्ारा स्वीकार नहीं किए जाते हैं। ऐसे मामले ज्यादातर उन विषयों से जुड़े होते हैं जिन पर ज्यादा वित्तीय व्यय की आवश्यकता होती है। गरीबी निवारण या पिछड़ापन दूर करने से संबंधित आँकड़ों पर राज्यों दव्ारा आपत्ति किए जाने के उदाहरण सामने आते रहे हैं। इस संदर्भ में योजना आयोग के सामने यह चुनौती है कि वह अपनी विश्वसनीयता बहाल करे। विश्वसनीयता बहाल हो, इसके लिए यह भी जरूरी है कि आयोग दव्ारा जो आँकड़े जारी किए जाएँ वे वास्तविकता के नज़दीक हो। आयोग के समक्ष आज समावेशी विकास को बढ़ावा देने की चुनौती है। योजना आयोग पर संपन्न एवं विपन्न दोनों प्रकार के राज्यों का दबाव होता है। संपन्न राज्य जहाँ अपने राज्य के करों को अपने पास ही देखना चाहते है वहीं गरीब राज्य आयोग से ज्यादा से ज्यादा वित्तीय आबंटन चाहते हैं ताकि वे अपने प्रदेश से जुड़ी समस्याओं को जल्द से जल्द हल कर सके। समकालीन समय में योजना आयोग के समक्ष विकास की रूपरेखा निर्धारित करते समय ग्रामीण-शहरी, पुरुष-महिला और अमीर -गरीब के बीच विद्यमान असमानता को समाप्त करने की चुनौती तो है ही, इसके साथ ही उसके दव्ारा पर्यावरणी रूप से ग्राह्य या सतत विकास को बढ़ावा देने की भी चुनौती है।
  • योजनाओं के क्रियान्वयन में आज स्पष्ट उत्तरदायित्व का अभाव दिखाई देता है। लालफीताशाही एवं भ्रष्टाचार योजनाओं के क्रियान्यवन में बड़ी बाधा है। जिस तेजी से ऑडिट एवं मूल्यांकन की आवश्यकता होती है, उसका अभाव देखा जाता है। इस संबंध में समवर्ती लेखा-परीक्षा या मूल्यांकन (Concurrent Audit or Evaluation) उपयोगी साबित हो सकता है। लेकिन विशेष तौर पर इस कार्य को संपन्न करने के लिए योजना आयोग के पास स्वतंत्र मूल्यांकन संस्था (Independent Evaluation Office) का नेटवर्क होना चाहिए। इसके अलावा योजना आयोग के समक्ष यह भी चुनौती है कि वह लालफीताशाही जो एक मंत्रालय से दूसरे मंत्रालय में कोष स्थानांतरण (Fund Transferring) के मामले में देखने को मिलती है, उसे दूर करे। जल्दी-जल्दी आने वाली विपतियों एवं प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों में विकास को पटरी पर लाने की चुनौती भी योजना आयोग के समक्ष आती रहती है। इन सबके साथ योजना आयोग के समक्ष यह भी चुनौती है कि किस तरह विकेन्द्रीकरण के माध्यम से योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाए। इसके लिए पंचायती राज्य संस्थाओं को सुदृढ़ करने की आवश्यकता है।

आलोचना (Criticism)

  • योजना आयोग का गठन मूल रूप से एक सलाहकारी संस्था के रूप में की गई थी लेकिन पूरे देश के लिए योजना बनाने तथा उसे राज्यों दव्ारा मान लेने के क्रम में इसने शक्तिशाली प्राधिकरण का रूप धारण कर लिया। आलोचक इसे ‘सुपर कैबिनेट’ तक कहने लगे। इसके अलावा इसे आर्थिक मंत्रिमंडल भी एवं समानान्तर मंत्रिमंडल कहा जाने लगा।
  • अशोकचंदा के अनुसार आयोग की अपरिभाषित और व्यापक स्थिति केन्द्र एवं राज्यों के लिए ‘आर्थिक मंत्रिमंडल’ की तरह है। योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष डी. आर. -नाडगिल ने आयोग की आलोचना करते हुए कहा हैं कि आयोग का गठन एक सलाहकारी संस्था के रूप में की गई थी लेकिन यह अपने मूल कार्य को भूलकर नीतियों का निर्माण करने लगा है। प्रधानमंत्री एवं वित्त मंत्री की सदस्यता के कारण इसने असाधारण महत्ता एवं प्रतिष्ठा हासिल कर ली है। पी. पी. राजामन्नार ने योजना आयोग एवं वित्त आयोग के कार्यों में उत्पन्न आच्छादन (Overlapping) के बारे में चर्चा की है। के सन्थानम का मानना है कि योजना आयोग ने संविधान का उल्लंघन किया है। इसके कारण संघीय व्यवस्था का उल्लंघन हुआ है और केन्द्रीय व्यवस्था उभरी है। प्रशासनिक सुधार आयोग का मानना है कि केन्द्र और राज्य की वास्तविक कार्यकारी शक्ति योजना आयोग ने ग्रहण कर ली है। इसने ‘सुपर कैबिनेट’ की भूमिका अपना ली है।
  • योजना आयोग का गठन एक व्यावसायिक संगठन (Professional Organisation) के तौर पर किया गया था जिससे यह आशा की गई थी कि सरकार से अलग रहकर राष्ट्रीय विकास हेतु वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण अपनाएगा लेकिन आगे चलकर यह स्वयं नौकरशाही से लैस होकर एक सरकारी विभाग की तरह कार्य करने लगा। मंत्रियों से जुड़ाव ने इसकी स्थिति बदल दी है। आयोग से यह अपेक्षा थी कि वह पंचवर्षीय एवं वार्षिक योजनाआंे की रूपरेखा तय करेगा लेकिन यह योजनाओं के क्रियान्वयन एवं मूल्यांकन कार्य में भी शामिल हो गया जो कि प्रशासन का उत्तरदायित्व होना चाहिए। राज्यों को दिये जाने वाले अनुदान के मामले में जिस एक-तरफा अधिकार का प्रयोग किया जाता है। वह भी राज्यों दव्ारा पसंद नहीं किया जाता है। योजना बनाते समय आयोग देश की बहुलता या विविधता को नहीं समझ पाता और पूरे देश के लिए एकरूप योजना का निर्माण करता है। इस तरह ऐसा आभास होता है कि देश में संवैधानिक रूप से संघात्मक व्यवस्था न होकर एकात्मक शासन व्यवस्था कार्य कर रही हो।
  • यह भी आलोचना की जाती है कि सरकार के एक कार्यकारी आदेश से गठित योजना आयोग ने केन्द्र-राज्य के बीच संबंधों को सौहार्द्रपूर्ण बनाए रखने के लिए गठित वित्त आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं के कार्य में दखल दिया है जो एक तरह से संविधान के साथ धोखाधड़ी है तथा जिसने संवैधानिक संस्थाओं को गौण बना दिया है।
  • उपरोक्त आलोचनाओं के बावजूद योजना आयोग की देश के आयोजन (Planning) में महत्वपूर्ण भूमिका है तथा यह सरकार को अपने संवैधानिक लक्ष्यों की ओर सतत्‌ अग्रसर होने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता है।

राष्ट्रीय विकास परिषद (National Development Council)

योजना के समर्थन में देश के संसाधनों एवं प्रयासों को गतिशील बनाने सभी महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सामान्य आर्थिक नीतियों को बढ़ावा देने तथा देश के सभी भागों में संतुलित एवं तीव्र विकास (Balanced and Rapid Development) को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय विकास परिषद का गठन 6 अगस्त 1952 को किया गया था। योजना आयोग की तरह यह भी एक संविधानेत्तर (Extra-constitutional) संस्था है। इसका गठन केन्द्र सरकार के एक शासकीय आदेश के दव्ारा हुआ था।

उद्देश्य (Objectives)

राष्ट्रीय विकास परिषद की स्थापना निम्नलिखित उद्देश्यों के लिए थी-

  • योजना निर्माण एवं क्रियान्वयन में राज्यों का सहयोग प्राप्त करना।
  • योजना के समर्थन में राष्ट्र के संसाधनों एवं प्रयासों को गतिशील बनाना।
  • सभी अहम क्षेत्रों में सामान्य आर्थिक नीतियों को बढ़ावा देना।
  • देश के सभी भागों में तीव्र एवं संतुलित विकास को बढ़ावा देना।

कार्य (Functions)

राष्ट्रीय विकास परिषद के निम्नलिखित कार्य हैं-

  • योजना आयोग दव्ारा बनाई गई पंचवर्षीय योजना पर विचार करना।
  • योजना निर्माण हेतु दिशा-निर्देश देना।
  • योजना के क्रियान्वयन हेतु संसाधनों का अनुमान लगाना।
  • राष्ट्रीय विकास को प्रभावित करने वाली सामाजिक व आर्थिक नीति से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों पर विचार करना।
  • समय-समय पर योजना संचालन की समीक्षा करना तथा ऐसे उपायों की अनुशंसा करना जिससे राष्ट्रीय योजना के उद्देश्यों एवं लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सके।

संरचना (Structure)

  • राष्ट्रीय विकास परिषद में प्रधानमंत्री, सभी कैबिनेट, सभी राज्यों के मुख्यमंत्री, सभी केन्द्रशासित प्रदेशों के प्रशासक/मुख्यमंत्री तथा योजना आयोग के सभी सदस्य शामिल होते हैं।
  • इसके अलावा स्वतंत्र प्रभार वाले मंत्रियों को भी इसकी बैठकों में बुलाया जाता है। इस परिषद का अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता है। योजना आयोग का सचिव ही राष्ट्रीय विकास परिषद का सचिव होता है।
  • वर्ष में दो बार राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक होती है। योजना आयोग दव्ारा पंचवर्षीय योजना के प्रारूप को सबसे पहले कैबिनेट के समक्ष रखा जाता है। कैबिनेट की संस्तुति के बाद इसे राष्ट्रीय विकास परिषद के पास स्वीकृति के लिए भेजा जाता है। राष्ट्रीय विकास परिषद से स्वीकृति मिलने के बाद इसे संसद में पेश किया जाता है। संसद की संस्तुति मिलने के बाद इसे आधिकारिक तौर पर सरकारी राजपत्र में प्रकाशित कर दिया जाता है।

उपयोगिता (Relevance)

  • राष्ट्रीय विकास परिषद सहकारी संघवाद की भावना को बढ़ावा देता है। केन्द्र- राज्यों के बीच योजनाओं के प्रारूप के संबंध में यह विस्तृत विचार-विमर्श करता है। केन्द्र -राज्य के बीच सहभागिता, समन्वय एवं सहयोग को बढ़ावा देता है। यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि परिषद में केन्द्र-राज्यों के अलावा अन्य हितों से जुड़े प्रतिनिधियों को भी अपनी बात कहने का मौका दिया जाता है। राष्ट्रीय विकास परिषद संघवादी व्यवस्था का प्रतीक है। इसके संगठन का चरित्र राष्ट्रीय है। स्वयं प्रधानमंत्री के अध्यक्ष होने के कारण इसे एक विशेष प्रकार का नेतृत्व, नियंत्रण, निर्देशन तथा महत्व प्राप्त है। विकास की गति को बढ़ाने, क्षेत्रीय असंतुलन को समाप्त कर संतुलित विकास को बढ़ावा देने, गरीबी, बेरोजगारी व पिछड़ापन को दूर करने में परिषद की महत्वपूर्ण भूमिका है।
  • अन्तर्गत प्रवाह को समन करना एवं अपने समक्ष उपस्थित करना, किसी दस्तावेज को अपने पास मंगवाना तथा किसी भी सरकारी कार्यालय या न्यायालय से रिकॉर्ड मंगवाना शामिल है।

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