Quasi-Judicial Institutions: Delimitation and Law Commission of India

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भारत का परिसीमन आयोग (Delimitation Commission of India)

  • भारत का परिसीमन आयोग एक वैधानिक निकाय है। इसकी स्थापना संसद दव्ारा बनाये गये कानून के उपबंधों के अधीन केन्द्रीय सरकार दव्ारा की जाती है। इसके कार्यप्रणाली के अंतर्गत देश में संसदीय एवं विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं को निर्धारित करना है।
  • आयोग एक शक्तिशाली निकाय है क्योंकि इसके आदेशों को कानूनी शक्ति प्राप्त होती है और इन्हें किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। इसके आदेश राष्ट्रपति दव्ारा निर्दिष्ट एक निश्चित तारीख को लागू होते हैं। इन्हें लोकसभा और संबंधित राज्य की विधानसभा के समक्ष रखा जाता है किन्तु इनमें संशोधन नहीं किया जा सकता है।
  • भारत में अब तक इस प्रकार के चार आयोग गठित किये जा चुके हैं- जिनमें पहला परिसीमन आयोग अधिनियम, 1952 के तहत 1952 में, दूसरा परिसीमन आयोग अधिनियम, 1962 के तहत 1963 में, तीसरा परिसीमन आयोग अधिनियम, 1972 के तहत 1973 में एवं चौथा परिसीमन आयोग अधिनियम, 2002 के तहत 2002 मेंं।

संवैधानिक उपबंध (Constitutional Provision)

भारतीय संविधान के अनुच्छेद-81, 82,170, 330 और 332 का संबंध संसदीय एवं विधान सभा क्षेत्रों के परिसमन से हैं इन अनुच्छेदों को 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 एवं 87वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 के दव्ारा संशोधित किया गया था। इन दोनों संशोधनों का प्रभाव निम्नलिखित है-

  • लोक सभा में विभिन्न राज्यों के आवंटित वर्तमान सीटों की कुल संख्या 1971 की जनगणना के आधार पर वर्ष 2026 के बाद की जाने वाली पहली जनगणना तक अपरिवर्तित बनी रहेगी।
  • सभी राज्यों में विधान सभा सीटों की कुल संख्या 1971 की जनगणना के आधार पर वर्ष 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक अपरिवर्तित रहेगी।
  • 2001 की जनगणना के आधार पर लोक सभा एवं राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनाजातियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या पुन: निश्चित की जाएगी।
  • संसदीय एवं विधानसभा क्षेत्रों का पु: परिसीमन प्रत्येक राज्य में 2001 की जनगणना के आधार पर किया जाएगा और अब परिसीमित होने वाले ऐसे चुनाव क्षेत्रों का विस्तार वर्ष 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक यथावत बना रहेगा।
  • चुनावी क्षेत्रों का इस प्रकार पुन: परिसीमन किया जाएगा कि एक राज्य में प्रत्येक संंसदीय और विधान सभा क्षेत्रों की जनसंख्या (2001 की जनगणना के आधार पर) जहाँ तक व्यावहारिक हो सके, पूरे राज्य में समान होगी।

चौथा परिसीमन आयोग (Fourth Delimitation Commission)

भारतीय संसद ने चौथा परिसीमन आयोग अधिनियम, 2002 के तहत वर्ष 2002 में पारित किया। इस आयोग का कार्य संविधान एवं परिसीमन अधिनियम, 2002 के अंतर्गत भारत के सभी राज्यों में (जम्मू एवं कश्मीर को छोड़कर) , 2001 की जनगणना के आधार पर संसदीय एवं विधान सभा क्षेत्रों को पुन: व्यवस्थापन करना था। यह आयोग एक 3 सदस्यीय निकाय था। इसमें निम्नलिखित बातें शामिल थीं-

  • अध्यक्ष जो उच्चतम न्यायालय का सेवारत या सेवानिवृत्ति था।
  • राज्य चुनाव आयुक्त संबंधित राज्य या संघशासित प्रदेश का जो कि दूसरा पदेन सदस्य था।
  • मुख्य चुनाव आयुक्त या मुख्य चुनाव आयुक्त दव्ारा नामित एक चुनाव, आयुक्त जो कि पदेन सदस्य था।

इसके अतिरिक्त इस आयोग में प्रत्येक राज्य के संबंध में 10 सहायक सदस्य भी शामिल थे। इनमें से 5 सदस्य उस राज्य से चुने गये, जो लोक सभा के सदस्य थे एवं अन्य शेष 5 सदस्य विधान सभा के सदस्य थे। इन सहायक सदस्यों को मतदान करने या आयोग के किसी भी आदेश पर हस्ताक्षर करने का अधिकार नहीं था।

सिफारिशों का क्रियान्वयन (Implementation of Recommendations)

  • सरकार को आयोग की सिफारिशें, 2007 में प्रस्तुत की गयी। भारत के राष्ट्रपति ने 2008 में आयोग की सिफारिशों को क्रियान्वित करने के लिए अधिसूचना पर हस्ताक्षर किये तथा इसी तरह संसदीय एवं विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन लागू किया गया।
  • आयोग की सिफारिशें कुछ राज्यों में लागू नहीं होती है जिनमें शामिल है-असम, मणिपुर, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और झारखंड। इसमें से प्रथम चार राज्यों में परिसीमन की कार्यवाही को स्थगित कर दिया गया एवं झारखंड के संदर्भ में अंतिम आदेश को रद्द कर दिया गया था। 2009 के आम चुनाव में सभी राज्यों राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली एवं पुडुचेरी (जम्मू-कश्मीर, झारखंड, असम, मणिपुर नागालैंड एवं अरूणाचल प्रदेश को छोड़कर) 543 में 499 संसदीय चुनाव क्षेत्रों में नये परिसीमन चुनाव क्षेत्रों के आधार पर संपन्न हुए थे।

भारत का विधि आयोग (Law Commission of India)

समाज में न्याय को बढ़ावा देने के लिए कानून में सुधार और कानून के शासन के तहत सुशासन को बढ़ावा देने के लिए भारत में विधि आयोग एक गैर-वैधानिक कार्यकारी निकाय है। केन्द्र सरकार के एक आदेश दव्ारा इसका गठन समय-समय पर एक निश्चित कार्यकाल के लिए किया जाता है। आयोग का मुख्य कार्य कानूनों के समेकन और संहिताकरण के उद्देश्य से विधायी उपायों की अनुशंसा करना है। इसकी सिफारिशें सरकार के लिए बाध्यकारी नहीं होती है।

ऐतिहासिक पृष्ठीभूमि (Historical Background)

19वीं शताब्दी में अंग्रेजी शासन के दौरान 4 विधि आयोग गठित किये गये थे। इन आयोगों का योगदान भारतीय संदर्भ में यह रहा कि भारतीय विधान पुस्तिका की समृद्धि हुई। कानून और व्यवस्था की स्थिति में सुधार करने के लिए एवं कानूनी प्रशासन की एकरूपता सुनिश्चित करने के लिए इन्होंने तत्कालीन अंग्रेजी कानूनों के प्रतिरूप के आधार पर भारतीय परिस्थितियों में अपनाये जाने वाले कई प्रकार के कानूनों की सिफारिश की थी। भारतीय दंड संहिता, अपराध प्रक्रिया संहिता, सिविल प्रक्रिया संहिता, भारतीय कंपनी अधिनियम (1866) , न्यासी अधिनियम (1866) , तलाक अधिनियम (1869) , भूमि अधिग्रहण अधिनियम (1870) , भारतीय साक्ष्य अधिनियम (1872) , भारतीय संविदा अधिनियम (1872) , विशेष विवाह अधिनियम (1872) , संपत्ति का हस्तांतरण अधिनियम और अन्य कई कानून इन चार आयोग की सिफारिशों का ही परिणाम थे।

भारत की आजादी से पूर्व विधि आयोग (Law Commission Before Independence of India)

Law Commission Before Independence of India
प्रथम विधिदूसरा विधितीसरा विधिचौथा विधि
आयोग (1834)आयोग (1853)आयोग (1861)आयोग (1879)
लार्ड मैकाले

(अध्यक्ष)

सरजान रोमिली (अध्यक्ष)सरजान रोमिली (अध्यक्ष)डा. ह्वीटली स्टोक्स

स्वतंत्र भारत में गठित विधि आयोग (Law Commission Set up in Independent India)

  • विधि आयोग, कानून सुधार संचालित करने की पंरपरा के माध्यम से स्वतंत्र भारत में जारी किया गया। स्वतंत्र भारत में पहली बार विधि आयोग 1955 में स्थापित किया गया। इस आयोग का गठन भारत में एक प्रमुख कानूनविद की अध्यक्षता में किया गया है और भारत की कानूनी प्रवासी भारतीयों के लिए एक महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
  • प्रथम विधि आयोग- स्वतंत्र भारत के प्रथम विधि आयोग 1955 में स्ाापित किया गया था। इस आयोग के अध्यक्ष एम. सी. शीतलवाड़ थे, जो कि भारत के तत्कालीन अटार्नी जनरल थे। इस आयोग का कार्यकाल तीन-वर्ष का था और इस आयोग ने 16 सितंबर, 1958 को अपनी अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। तब से अब तक 20 और विधि आयोग गठित किये जा चुके हैं।

आयोग की संरचना (Commission Structure)

  • विधि आयोग की संरचना प्रत्येक आयोग के लिए भिन्न-भिन्न होती है। प्राय: इसमें एक अध्यक्ष, कुछ पूर्णकालिक सदस्य, एक सदस्य सचिव और आयोग को विचार हेतु सौंपे गये विषय की प्रकृति के आधार पर कुछ अल्पकालिक सदस्य शामिल होते हैं।
  • आयोग के अध्यक्ष और पूर्णकालिक सदस्य उच्चतम न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायाधीश, वैधानिक विशेषज्ञ या किसी भारतीय विश्वविद्यालय में कानून के प्रोफेसर होते हैं।
  • भारतीय विधिक सेवा सदस्य सचिव से संबंध रखता है। भारत सरकार के अतिरिक्त सचिव या सचिव के समकक्ष होता है अल्पकालिक सदस्यों की नियुक्ति के बारे में श्रेष्ठ सदस्यों, शैक्षिक क्षेत्र में श्रेष्ठ अध्येयताओं या कानून की किसी विशिष्ट शाखा में विशेषीकृत ज्ञान रखने वाले लोगों में से की जाती है।
  • विधि आयोग के नियमित कर्मचारी में विभिन्न पद श्रेणियों एवं अनुभवी लगभग 1 दर्जन शोध कार्मिक शामिल होते हैं। सचिवालय स्टाफ का एक छोटा-सा समूह आयोग के प्रशासनिक कार्यचालन को देखता है।

आयोग की कार्यप्रणाली (Working of the Commission)

विधि आयोग आम तौर पर देश में कानून में सुधार के लिए दीक्षा बिन्दु के रूप में कार्य करता है। आंतरिक विधि आयोग एक शोध उन्मुख ढंग से काम करता है। आयोग का कार्यचालन निम्न चरणों के साथ एक प्रक्रिया के रूप में वर्णित किया जा सकता है-

  • आयोग की बैठकों में परियोजनाओं की शुरूआत की जाती है।
  • प्राथमिकताओं की चर्चा, सदस्य के लिए प्रारंभिक कार्य के विषयों और काम की पहचान की जाती है।
  • प्रस्तावित सुधार के क्षेत्र को ध्यान में रखकर आंकड़ा के संग्रह एवं अनुसंधान हेतु अलग-अलग पद्धतियाँ अपनायी जाती हैं।
  • समस्याओं एवं सुधार के लिए क्षेत्रों के निर्धारण की रूपरेखा।
  • सार्वजनिक, व्यावसायिक निकायों एवं शैक्षणिक संस्थानों के साथ परामर्श
  • प्रतिक्रियाओं और रिपोर्ट का मसौदा तैयार करने का मूल्यांकन।
  • चर्चा और रिपोर्ट की जांच अपने को अंतिम रूप देने के लिए अग्रणी है
  • विधि और न्याय मंत्रालय को रिपोर्ट अग्रसरित की जाती है।
    • विधि आयोग की रिपोर्ट पर कानून एवं न्याय मंत्रालय संबंधित प्रशासनिक मंत्रालयों के परामर्श के साथ विचार-विमर्श करता है और इसे समय-समय पर संसद में पेश किया जाता है। आयोग ने अब तक अपनी 234 रिपोर्ट पेश की हैं, जिनमें से 225 को संसद के समक्ष रखा गया है।
    • अत: आयोग अपने अतीत और वर्तमान सभी काम करता है। आयोग ने देश में कानूनी अनुसंधान के लिए एवं कानूनी परिदृश्य बदलने के लिए काम किया गया है, जो अपने आप में भारत में कानून सुधार को आगे बढ़ाने में आयोग की भूमिका के पर्याप्त सूचक हैं।

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