Quasi-Judicial Institutions: Election Commission: Commission Structure

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निर्वाचन आयोग (Election Commission)

देश में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के उद्देश्य से निर्वाचन आयोग का गठन भारत के संविधान के तहत एक स्थायी और स्वतंत्र निकाय के रूप में हुआ था। संविधान के अनुच्छेद-324 में संसदीय चुनावों, विधान सभा चुनावों, भारत के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पदों के लिए चुनावों की देखरेख उनके निर्देशन और नियंत्रण का अधिकार चुनाव आयोग को दिया गया है। इस प्रकार चुनाव आयोग, इस अर्थ में अखिल भारतीय स्तर का निकाय है कि यह केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों दोनों के लिए एक है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद-324 में निर्वाचन आयोग को प्रदान की गयी शक्तियों में संसदीय अधिनियमों तथा वर्णित नियमों और आदेशों के दव्ारा और वृद्धि की गयी हैं जैसे-

  • 1950 की जन प्रतिनिधित्व (मतदाता सूचियों की तैयारी) नियमावली।
  • जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950, जो मतदाताओं की योग्यता, मतदाता सूचियों की तैयारी चुनाव क्षेत्रों के निर्धारण संसद में तथा विधानसभा में सीटों के बंटवारे से संबंधित है।
  • जन प्रतिनिधित्व (चुनाव संचालन और चुनाव याचिका) नियमावली 1951
  • जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951, जिसके संबंध में चुनावों के आयोजन से जुड़े प्रशासनिक तंत्र, मतदान, चुनाव संबंधी विवाद, उपचुनाव, राजनीतिक दलों का पंजीकरण आदि से है।
  • राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव अधिनियम, 1952
  • संघ शासित अधिनियम, 1963
  • राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली-सरकार अधिनियम, 1991

यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि राज्यों में होने वाले पंचायतों व निगम चुनावों से निर्वाचन आयोग का कोई संबंध नहीं है। इसके लिए भारतीय संविधान में अलग से राज्य चुनाव आयोग का प्रावधान किया गया है।

आयोग की संरचना (Commission Structure)

संविधान के अनुच्छेद-324 में चुनाव आयोग की संरचना के संबंध में निम्नलिखित उपबंध है-

  • निर्वाचन आयोग में एक मुख्य चुनाव आयुक्त होगा तथा राष्ट्रपति दव्ारा समय-समय पर निर्धारित संख्या में चुनाव आयुक्त होंगे।
  • मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति दव्ारा की जाएगी।
  • किसी निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति जब इस प्रकार होती है तो मुख्य चुनाव आयुक्त चुनाव आयोग के अध्यक्ष के रूप में कार्य करेगा।
  • राष्ट्रपति, निर्वाचन आयोग की सलाह पर प्रादेशिक आयुक्तों की नियुक्ति कर सकता है, जिसे वह निर्वाचन आयोग की सहायता के लिए आवश्यक समझे।
  • निर्वाचन आयुक्तों और क्षेत्रीय आयुक्तों की सेवा शर्तों और कार्यकाल का निर्धारण राष्ट्रपति दव्ारा किया जाएगा।

वर्ष 1950 में अपने गठन से लेकर 15 अक्टूबर, 1989 तक निर्वाचन आयोग मात्र मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ एक सदस्यीय निकाय के रूप में कार्य करता था। मत देने की न्यूनतम आयु 21 से 18 वर्ष करने के बाद 16 अक्टूबर, 1989 को राष्ट्रपति ने आयोग के काम के भार को कम करने के लिए दो अन्य निवार्चन आयुक्तों को नियुक्त किया। इसके बाद आयोग बहुसदस्यीय संस्था के रूप में कार्य करने लगा, जिसमें तीन निर्वाचन आयुक्त थे। तथापि, 1990 में चुनाव आयुक्तों के दो पद समाप्त कर दिये गये तथा चुनाव आयोग को पहले जैसी स्थिति में ला दिया गया। अक्टूबर 1993 में राष्ट्रपति ने पुन: दो चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की तब से अब तक निर्वाचन आयोग तीन चुनाव आयुक्तों के साथ कार्य कर रहा है।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की शक्तियों, वेतन, भत्ते और सुविधाएँ समान हैं। मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो अन्य निर्वाचन आयुक्तों के बीच यदि विचार में मतभेद होता है तो आयोग बहुमत के आधार पर निर्णय करता है।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान ही वेतन तथा अन्य सुविधाएँ मिलती हैं। ये तीनों आयुक्त 6 वर्ष की अवधि तक या 65 वर्ष की आयु होने तक (जो भी पहले हो) के लिए अपने पद पर बने रह सकते हैं। वे किसी भी समय त्यागपत्र दे सकते हैं या उन्हें कार्यकाल समाप्त होने से पूर्व भी हटाया जा सकता हैं।

स्वतंत्रता (Freedom)

संविधान के अनुच्छेद-324 में निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्ष कार्य प्रणाली को सुरक्षित और सुनिश्चित करने के संदर्भ में निम्नलिखित प्रावधान किये गये हैं-

  • मुख्य निर्वाचन आयुक्त का कार्यकाल निश्चित है। उसे उसके पद में उसी आधार पर और उस ढंग से हटाया जा सकता है जैसे सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है, मुख्य निर्वाचन आयुक्त को राष्ट्रपति दव्ारा तब ही हटाया जा सकता है जब संसद के दोनों सदन उसके दव्ारा दुर्व्यवहार अथवा उसकी अक्षमता के आधार पर विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित करें। राष्ट्रपति दव्ारा नियुक्त किये जाने के बावजूद मुख्य निर्वाचन आयुक्त राष्ट्रपति की सहमति से पद पर बने नहीं रह सकता।
  • मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सेवा -शर्ते उसकी नियुक्ति के बाद इस तरह नहीं बदली जा सकती जिससे उसे हानि होती है।
  • अन्य निर्वाचन आयुक्त का प्रादेशिक आयुक्त को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश पर ही हटाया जा सकता है, अन्यथा नहीं।

संविधान में यद्यपि निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता के साथ-साथ उसकी रक्षा के भी प्रबंध किये गये हैं, फिर भी कुछ कमियों का उल्लेख यहाँ पर किया जा रहा है जो निम्नवत हैं-

  • संविधान में निर्वाचन आयोग के सदस्यों की अर्हता (विधिक, शैक्षणिक, प्रशासिक या न्यायिक) संविधान में निर्धारित नहीं की गयी है।
  • संविधान में चुनाव आयोग के सदस्य के कार्यकाल का उल्लेख नहीं किया गया है।
  • संविधान में सेवानिवृत्ति के बाद निर्वाचन आयुक्तों को सरकार दव्ारा अन्य दूसरी नियुक्तियों पर रोक नहीं लगायी गयी है।

शक्तियाँ और कार्य (Powers and Functions)

संसदीय चुनावों, विधान सभा चुनावों और राष्ट्रपति तथा उपराष्ट्रपति पद के लिए चुनावों के संदर्भ में निर्वाचन आयोग की शक्तियों और कार्यों को तीन श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है जैसे-प्रशासनिक, सलाहकारी और अर्द्धन्यायिक।

इन शक्तियों और कार्यों का विवरण इस प्रकार है-

  • वर्ष 1962 और 1972 में संशोधित संसद के परिसीमन आयोग अधिनियम 1952 के आधार पर देशभर में चुनावी क्षेत्रों की सीमा का निर्धारण करना।
  • समय-समय पर निर्वाचक नामावली तैयार करना और सभी योग्य मतदाताओं को पंजीकृत करना।
  • चुनावी तिथियों और अनुसूचियों को अधिसूचित करना तथा नामांकन पत्रों की जांच करना।
  • राजनीतिक दलों को मान्यता प्रदान करना और उन्हें चुनाव चिन्ह आवंटित करना।
  • राजनीतिक दलों को मान्यता प्रदान करने और उन्हें चुनाव चिन्ह आवंटित करने संबंधी विवादों के निपटान के लिए न्यायालय का कार्य करना।
  • चुनावी प्रबंधों से संबंधित विवादों की जांच के लिए अधिकारियों की नियुक्ति करना।
  • निर्वाचन के समय दलों एवं उम्मीदवारों के लिए आचार-संहिता का निर्धारण करना।
  • चुनावों के समय राजनीतिक दलों की नीतियों को रेडियों और टेलीविजन पर प्रसारित करने का कार्यक्रम तैयार करना।
  • संसद के सदस्यों की अयोग्यता से संबंधित मामलों पर राष्ट्रपति को सलाह देना।
  • विधानमंडल के सदस्यों की निर्रहता से संबंधित मसलों पर राज्यपाल को परामर्श देना।
  • मतदान केन्द्रों पर कब्जा, हिंसा और अन्य अनियमितताओं की स्थिति में चुनावों को रद्द करना।
  • देशभर में निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए चुनाव तंत्र का पर्यवेक्षण करना।
  • निर्वाचन करने के लिए कर्मचारियों की आवश्यकता के बारे में राष्ट्रपति या राज्यपाल से आग्रह करना।
  • चुनावों के प्रयोजन से राजनीतिक दलों को पंजीकृत करना और चुनाव में उनके परिणामों के आधार पर उन्हें राष्ट्रीय अथवा राज्य स्तर के दल का दर्जा प्रदान करना।
  • आपातकाल की अवधि को एक वर्ष के बाद भी बढ़ाने की दृष्टि से राष्ट्रपति को यह सलाह देना कि राष्ट्रपति शासन के तहत राज्य में चुनाव कराये जा सकते हैं या नहीं।

किसी राजनीतिक दल को राष्ट्रीय दल का दर्जा तब प्रदान किया जाता है जब-

  • उसे किसी चार राज्यों के वैध मतों से 60 प्रतिशत मत हासिल हुए हों और
  • उसे किसी राज्य या राज्यों से लोकसभा की 4 सीटें प्राप्त हुई हो, या
  • उसे लोकसभा में सीटों की संख्या को 2 प्रतिशत सीट मिली हो और
  • ये सदस्य अलग-अलग राज्यों से चुने गये हों।

इसी प्रकार किसी राजनीतिक दल को प्रांतीय दल का दर्जा तब प्रदान किया जाता है जब-

  • उसे राज्य के वैध मतों में से 6 प्रतिशत हासिल हुए हों, और
  • उसे विधानसभा में कुल सीटों के 3 प्रतिशत के बराबर सीट मिली हो अथवा विधानसभा में 3 सीट मिली हो (जो भी अधिक हो) ।
    • निर्वाचन आयोग की सहायता उप-निर्वाचन आयुक्त करतेे हैं ये सिविल सेवा से लिये जाते है और आयोग दव्ारा उन्हें कार्यकाल व्यवस्था के आधार पर लिया जाता है। इन दोनों अधिकारियों की सहायतार्थ सचिव, संयुक्त सचिव, निदेशक, उपनिदेशक और अवर सचिव होते है जो आयोग के सचिवालय में पदस्थ होते हैं।
    • राज्य स्तर पर, राज्य निर्वाचन आयोग की सहायता मुख्य चुनाव अधिकारी करते हैं, जिनकी नियुक्ति राज्य सरकार के परामर्श से मुख्य निर्वाचन आयुक्त दव्ारा की जाती है। इनके नीचे जिला स्तर पर कनेक्टर, जिला निर्वाचन अधिकारी होता है। जिलाधिकारी संबद्ध जिलों के प्रत्येक चुनाव क्षेत्र के लिए निर्वाचन अधिकारी नियुक्त करता है तथा प्रत्येक चुनाव क्षेत्र में प्रत्येक मतदान केन्द्र के लिए निर्वाचन अध्यक्ष की नियुक्ति भी करता है।

भाषाई अल्पसंख्यक वर्गों के लिए विशेष अधिकारी (Special Officer for Linguistic Minorities)

भाषाई अल्पसंख्यक वर्गों के लिए विशेष अधिकारी के संबंध में भारत के मूल संविधान में कोई प्रावधान नहीं है। बाद में राज्य पुनर्गठन आयोग (1953 - 55) ने इस संबंध में एक सिफारिश की तदनुसार, 1956 में सातवें संविधान अधिनियम के दव्ारा संविधान के भाग XVII में एक ना अनुच्छेद-350 (क) जोड़ा गया।

इस आलेख में निम्न प्रावधान है-

  • भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए एक विशेष अधिकारी होगा, जिसकी नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति दव्ारा की जाएगी।
  • विशेष अधिकारी का यह कर्तव्य होगा कि वह इस संविधान के अधीन भाषाई अल्पसंख्यक वर्गों के लिए उपबंधित रक्षोपायों से संबंधित सभी विषयों का अन्वेषण करें और उन विषयों के संबंध में अंतरालों पर जो राष्ट्रपति को प्रतिवेदन दे और राष्ट्रपति ऐसे प्रतिवेदनों को संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगा और संबंधित राज्यों की सरकारों को भिजवाएगा।

यहाँ ध्यान दिया जाना चाहिए कि यह संविधान भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी की योग्यता, कार्यकाल, सेवाशर्तें, वेतन और भत्ते तथा इनको हटाने की प्रक्रिया आदि के संबंध में कोई उल्लेख नहीं करता है।

गठन (Build)

  • संविधान के अनुच्छेद-350 (ख) के अनुसार, 1957 में भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी के कार्यालय की स्थापना की गयी। इस अधिकारी को भाषायी अल्पसंख्यकों के लिए आयुक्त (कमिश्नर) का पदनाम दिया गया है।
  • इस कमिश्नर का मुख्यालय इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश) में है तथा बेलगांव (कर्नाटक) चेन्नई (तमिलनाडु) , एवं कोलकाता (प. बंगाल) में इसके तीन क्षेत्रीय कार्यालय हैं। प्रत्येक क्षेत्रीय कार्यालय का प्रमुख उप-आयुक्त (असिस्टेंट कमिश्नर) होता है।
  • मुख्यालय में आयुक्त को उसके कार्यो में सहायता देने के लिए एक उपायुक्त तथा एक सहायक आयुक्त होते हैं। आयुक्त इस संदर्भ में राज्य सरकारों के साथ समन्वय स्थापित करता है।
  • केन्द्रीय स्तर पर आयुक्त, अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के अधीन काम करता है। आयुक्त अपने कार्यों का वार्षिक प्रतिवेदन अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के माध्यम से राष्ट्रपति को प्रेषित करता है।

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