Quasi-Judicial Institutions: National Commission for Women

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राष्ट्रपति महिला आयोग (National Commission for Women)

  • भारत सरकार दव्ारा भारत में महिलाओं की स्थिति पर 1974 में एक समिति गठित की गयी, जिसमें महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक विकास को गति देने और शिकायतों के निपटारें को बढ़ावा देने तथा निगरानी कार्यों को पूरा करने के लिए एक राष्ट्रीय आयोग के गठन की सिफारिश की गई थी। इसके बाद गठित की गयी कई महिला संबंधी समितियों, आयोगों एवं योजनाओं (महिलाओं से संबंधित राष्ट्रीय प्ररिप्रेक्ष्य योजना-1988 सहित) दव्ारा भी महिलाओं के लिए इस प्रकार के एक शीर्ष निकाय के गठन की सिफारिश की गयी। उसके अनुसार 1992 में महिलाओं के हितों एवं अधिकारों के संरक्षण व संवर्द्धन हेतु महिलाआंे के लिए राष्ट्रीय आयोग की देश में स्थापना की गयी।
  • राष्ट्रीय महिला आयोग एक सांविधिक (न कि एक संवैधानिक) निकाय है। इसका गठन महिलाओं के लिए राष्ट्रीय आयोग अधिनियम, 1990 (भारत सरकार का 1990 का अधिनियम संख्या 20) के अधीन किया है। पहले आयोग की अध्यक्ष श्रीमती जंयती पटनायक थीं। भारत सरकार का महिला एवं बाल विकास मंत्रालय आयोग का नोडल मंत्रालय है।

अपने जनादेश के साथ आयोग महिलाओं के विकास एवं सशक्तिकरण के लगभग सभी पहलुओं को अपने अधिकार क्षेत्र में शामिल करता है। आयोग के उद्देश्य इस प्रकार हैं-

  • महिलाओं के लिए संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा उपायों की समीक्षा करना।
  • उपचारात्मक विधायी उपायों की सिफारिश करना।
  • शिकायतों के निवारण को बढ़ावा देना।
  • महिलाओं को प्रभावित करने वाले सभी नीतिगत मामलों पर सरकार को सलाह देना।

आयोग की संरचना (Commission Structure)

  • धारा 3 के तहत 1990 के अधिनियम में आयोग की संरचना का प्रावधान है। आयोग एक बहुसदस्यीय आयोग है, जिसमें एक अध्यक्ष, पाँच सदस्य और एक सदस्य सचिव शामिल होते हैं। आयोग का अध्यक्ष महिलाओं के हितों के लिए प्रतिबद्ध व्यक्ति को बनाया जाना चाहिए। पाँच सदस्यों का चयन योग्यता एवं सत्यनिष्ठा के अलावा कानून या विधायन ट्रेड -यूनियनवाद, महिलाओं की रोजगार संभावना बढ़ाने वाले उद्योग या संगठन के प्रबंधन महिलाओं के गैर-सरकारी संगठनों, प्रशासन आर्थिक विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा या सामाजिक कल्याण से जुड़े अनुभवों के आधार पर किया जाता है। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति से जुड़ा एक-एक सदस्य भी आयोग में होना चाहिए।
  • अध्यक्ष, सदस्य और सदस्य-सचिव का नामांकन केन्द्र सरकार (महिला एवं बाल विकास मंत्रालय) दव्ारा किया जाता है। उनके वेतन, भत्ते और अन्य सेवा शर्तों भी केन्द्र सरकार दव्ारा निर्धारित होती है।
  • सदस्य सचिव प्रबंधन संगठनात्मक संरचना या सामाजिक आंदोलनों के क्षेत्र में एक विशेषज्ञ होना चाहिए या केन्द्र की सिविल सेवा या अखिल भारतीय सेवा का एक अधिकारी होना चाहिए।

सदस्यों का कार्यकाल (Tenure of Members)

आयोग के अध्यक्ष या सदस्यों का कार्यकाल तीन वर्ष का होता है परन्तु वे अपना पद किसी भी समय केन्द्र सरकार को अपना त्यागपत्र दे सकते है। इसके अलावा केन्द्र सरकार निम्नलिखित परिस्थितियों में इनके कार्यकाल से पूर्व भी हटा सकती है यदि-

  • वह दिवालिया घोषित किया जाता है।
  • उसे सक्षम अदालत दव्ारा मानसिक रूप से अस्वस्थ घोषित किया गया है।
  • वह कार्य करने में अक्षम हो जाता है।
  • उसे किसी ऐसे अपराध के लिए दोषी सिद्ध किया गया है और सजा दी गयी है जो केन्द्र सरकार की दृष्टि में नैतिक कदाचार माना जाता है।
  • वह आयोग की लगातार तीन बैठकों में अनुपस्थित रहता है।

इसके बावजूद अध्यक्ष या सदस्य को तब तक उसके पद से नहीं हटाया जा सकता जब तक कि उसे सुनवाई का एक उचित अवसर न प्रदान किया जाये।

आयोग के कार्य (Commission Functions)

1990 के अधिनियम की धारा 10 (1) राष्ट्रीय महिला आयोग के लिए चौदह सूत्रीय जनादेश प्रदान करता है। जनादेश की सामान्य अवलोकन प्रदान की गयी है जिनमें है-

  • संविधान और कानूनों के अधीन महिलाओं को उपलब्ध कराये गये सुरक्षा उपाय से जुड़े सभी मामलों की जांच एवं परीक्षण करना।
  • इन सुरक्षापायों के कार्यपालन के संबंध में केन्द्र सरकार को वार्षिक या अन्य अनुकूल समय पर रिपोर्ट भेजना।
  • केन्द्र या किसी राज्य दव्ारा महिलाओं की दशा सुधारने के लिए सुरक्षापायों के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु सिफारिशें देना।
  • महिलाओं को प्रभावित करने वाले संविधान के मौजूदा उपबंधों और कानूनों की समीक्षा करना तथा इस प्रकार के कानूनों में किसी भी प्रकार की कमी को पूरा करने के लिए संशोधनों का सुझाव देना।
  • महिलाओं से जुड़े संविधान के उपबंधों एवं कानूनों के उल्लंघन के मामले को हाथ में लेना।
  • महिलाओं के विरुद्ध भेदभाव और उत्पीड़न से पैदा होने वाली समस्याओं या स्थितियों में विशेष अध्ययनों और जांच का आह्नान करना तथा इन समस्याओं के समाधान के लिए अनुमोदित की गयी रणनीतियों के समक्ष आने वाली बाधाओं की पहचान करना।
  • महिलाओं से जुड़े मसलों में शिकायतों को देखना और खुद की पहल पर ध्यान देना-
    • महिलाओं के अधिकारों का वंचन।
    • महिलाओं के संरक्षण उपलब्ध कराने हेतु बनाये कानूनों का गैर-क्रियान्वयन तथा समानता और विकास के उद्देश्य की उपलब्धि।
    • महिलाओं की कठिनाइयों को दूर करने हेतु लिए गये नीतिगत निर्णय और निर्देशों का गैर अनुपालन एवं महिलाओं के लिए राहत एवं कल्याण सुनिश्चित करना।
  • महिलाओें के सामाजिक, आर्थिक विकास की नियोजन प्रक्रिया पर परामर्श देना और उसमेंं भागीदारी करना।
  • संवर्द्धनशील एवं शैक्षिक शोध को हाथ में लेना ताकि सभी क्षेत्रों में महिलाओं के अपेक्षित प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के तरीके सुझाये जा सके।
  • संघ एवं राज्य के अधीन महिलाओं के विकास की प्रगति का मूल्यांकन करना।
  • किसी भी कारागार, पूछताछ गृह, महिलाओं की संस्था या अन्य ऐसे स्थान का निरीक्षण करना जहाँ महिलाओं को बंदी या अन्य रूप में रखा जाता है।
  • किसी भी ऐसे मुकदमें को वित्त उपलब्ध कराना, जिसमें महिलाओं के एक बड़े हिस्से को प्रभावित करने वाले मुद्दे निहित हैं।
  • महिलाओं से जुड़े किसी भी मामले पर सरकार को समय-समय पर रिपोर्ट तैयार करना।
  • केन्द्र सरकार दव्ारा इसे सौंपे गये किसी अन्य मामलों को देखना।

आयोग का कार्यचालन (Functioning of the Commission)

आयोग महिलाओं से जुड़े मामलों पर स्वयं की पहल पर, मौखिक या लिखित रूप में प्राप्त शिकायतों पर कार्यवाही करता है। महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की विभिन्न श्रेणियों से जुड़ी शिकायतें आयोग दव्ारा प्राप्त की जाती हैं जैसे-घरेलू हिंसा, उत्पीड़न, दहेज, शारीरिक यातना, हत्या, अपहरणों, एनआरआई विवाहों के विरुद्ध शिकायतें, बलात्कार, परित्याग, दव्-विवाह, पुलिस उत्पीड़न क्रूरता, पति दव्ारा क्रूरता, अधिकारों का वंचन, लैंगिक भेदभाव कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न, रेलवे में अभद्रता इत्यादि।

आयोग इन शिकायतों की समस्याओं से निपटने के एक तीन सूत्रीय विधि अपनाता है-

  • पुलिस दव्ारा जांच में तेजी लाई जा रही एवं निगरानी कर रहे हैं।
  • पारिवारिक विवादों को हल या परामर्श के माध्यम से समझौता कर रहे हैंं।
  • गंभीर अपराधों के मामलों में आयोग एक जांच समिति गठित करती है, जो हिंसा और उत्पीड़न के शिकार लोगों को तत्काल राहत और न्याय प्रदान करने में मदद करते हैं।

आयोग की शक्तियाँ (Powers of Commission)

आयोग अपनी प्रक्रियाएँ खुद विनियमित करता है एवं अपनी समिति की प्रक्रियाओं को भी निर्धारित करता है। किसी भी शिकायत की जांच-पड़ताल या किसी मामलें की जांच करते समय आयोग को एक सिविल अदालत की सभी शक्तियाँ विशेष रूप से निम्नलिखित मामलों में प्राप्त होती है-

  • भारत के किसी भी हिस्से से किसी भी व्यक्ति को हाजिर कराना तथा शपथ पर उसकी परीक्षा करना।
  • किसी भी दस्तावेज की खोज और उत्पादन की मांग करना।
  • हलफनामों पर सबूत प्राप्त करना।
  • किसी भी सार्वजनिक रिकॉर्ड की, किसी भी अदालत या कार्यालय से मांग करना।
  • साक्ष्यों एवं दस्तावेजों के परीक्षण हेतु समन जारी करना।
  • केन्द्र सरकार दव्ारा निर्धारित किया गया कोई भी अन्य विषय।

आयोग की रिपोर्ट (Commission Report)

  • केन्द्र सरकार को आयोग एक वार्षिक रिपोर्ट भेजता है इस रिपोर्ट में पिछले वित्त वर्ष के दौरान आयोग की गतिविधियों का पूरा लेखा-जोखा होता है। केन्द्र सरकार इस रिपोर्ट को आयोग की सलाह पर की गयी कार्यवाही के लिए एक स्मरण पत्र के साथ संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखती है। इस स्मरण-पत्र में ऐसी किसी भी सिफारिश को अस्वीकार करने के कारणों का उल्लेख होना भी आवश्यक होता है।
  • यदि ऐसी कोई भी रिपोर्ट किसी भी राज्य सरकार से जुड़े मामले से संबंधित है, तो आयोग इस रिपोर्ट की एक प्रतिलिपि संबंधित राज्य सरकार को भेजता है। राज्य सरकार इसको राज्य विधानमंडल के समक्ष एक स्मरण पत्र के रूप में रखती है। इस स्मरण पत्र में आयोग की सिफारिशों पर की गयी कार्यवाहियों का विश्लेषण होता है एवं ऐसी किसी भी सिफारिश को अस्वीकार करने के कारणों का उल्लेख होता है।

आयोग की रणनीतियाँ (Commission Strategies)

महिलाओं के खिलाफ हिंसा की समस्या बहुआयामी है। राष्ट्रीय महिला आयोग ने इन समस्याओं से निपटने के लिए एवं अपने जनादेश को ध्यान में रखते हुए महिलाओं के दर्जे और महिलाओं के विकास को सुधारने के लिए निम्नलिखित रणनीतियाँ अपनायी है-

  • महिलाआंे के बीच कानूनी जागरूकता की सृजन, कौशल निर्माण के माध्यम से आर्थिक सशक्तिकरण और लाभपूर्ण रोजगार तक पहुँच सुनिश्चित करना।
  • स्ांविधान और अन्य कानूनों के तहत महिलाओं के लिए उपलब्ध करायी गयी सुरक्षा उपायों से संबंधित सभी मामलों की जांच करना।
  • सभी मंचों पर समानतापूर्ण प्रतिनिधित्व के लिए जागरूकता, प्रशिक्षण एवं समूहीकरण के माध्यम से राजनीतिक सशक्तिकरण।
  • वंचित महिलाओं की दशा में सुधार।
  • समय-समय पर संविधान और महिलाओं को प्रभावित करने वाले अन्य कानूनों से बाहर निकलने के प्रावधानों की समीक्षा करना।
  • वैधानिक एवं सामाजिक प्रतिबंधों के माध्यम से मीडिया में महिलाओं के अशिष्ट प्रदर्शन पर रोक।
  • संघ और किसी भी राज्य में महिलाओं के विकास की प्रगति का मूल्यांकन।
  • महिलाओं के खिलाफ भेदभाव और अत्याचार से उत्पन्न विशिष्ट समस्याओं की स्थितियों की जांच या विशेष अध्ययन करना।

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