Quasi-Judicial Institutions: Impact of Planning Commission and National Commission for Scheduled Tribes

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योजना आयोग का प्रभाव (Impact of Planning Commission)

  • स्ांविधान के अंतर्गत वित्त आयोग को केन्द्र-राज्य के बीच वित्तीय संतुलन बनाए रखने की जिम्मेदारी सौंपी गई है, लेकिन व्यवहार में यह कार्य तीन तरीके से संपन्न होता है। वित्त आयोग तो अपना दायित्व निभाता ही है, योजना आयोग एवं संबंधित मंत्रालय भी कतिपय वित्तीय आवंटन में अपनी भूमिका निभाते है। देखने में आता है कि वित्तीय आवंटन का बड़ा भाग योजना आयोग के माध्यम से किया जाता है। भारत दव्ारा योजनागत विकास का मार्ग चुने जाने के कारण योजना आयोग की बड़ी भूमिका देखने को मिलती है। राज्यों के बीच राजकोषीय समानता स्थापित करने का कार्य योजना आयोग दव्ारा ही किया जाने लगा है जबकि संवैधानिक रूप से वह कार्य वित्त आयोग को सौंपा गया था। योजना आयोग के गठन के पश्चात्‌ निश्चित तौर पर वित्त आयोग का कार्यक्षेत्र सीमित हुआ है। भारत में सामान्य तौर पर योजना, नीति एवं कार्यक्रम योजना आयोग के अधिकार क्षेत्र में चला गया है। योजना आयोग की अनुशंसाओं के आधार पर ही योजनागत परियोजनाओं के लिए वित्तीय आवंटन किया जाता है जिससे वित्त आयोग की भूमिका सीमित हो गई है। वित्त आयोग एवं योजना आयोग के कार्यों में आच्छादन (Overlapping) पैदा होने से राज्यों की वित्तीय स्थिति की व्यापक समीक्षा भी बाधित हुई है।
  • बदलते राजकोषीय स्थिति एवं अपने कार्यों में विस्तार के बावजूद वित्त आयोग ने केन्द्र -राज्य वित्तीय संबंधों को सामान्य बनाये रखने में महत्वपूर्ण भमिका निभाई है। यदि अब तक केन्द्र-राज्य संबंध भंग नहीं हुए हैं तो उसमें वित्त आयोग का बहुत बड़ा योगदान रहा है। अब वित्त आयोग केन्द्र-राज्य वित्तीय संबंधों में केवल मध्यस्थ (Arbitrator) की भूमिका ही नहीं निभाता बल्कि पूरे वित्तीय पुनर्सरंचना (Restructuring) में अग्रणी भूमिका निभाता है। वित्त आयोग की यह भूमिका उभरती चुनौतियों एवं बदलते वित्तीय वातावरण के बीच और भी बढ़ने की संभावना है।

राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (National Commission for Scheduled Tribes)

जनजातियों के कल्याण एवं विकास को बढ़ावा देने के लिए सन्‌ 1999 में जनजातीय मंत्रालय की स्थापना की गई। इससे यह उम्मीद बनी कि अनुसूचित जनजातियों से संबंधित योजनाओं में समन्वय स्थापित किया जा सकेगा। यह भी प्रस्ताव रखा गया कि जनजातियों के हितों के प्रभावी संरक्षण के लिए राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग को विभाजित कर दिया जाए और दोनों समूहों के लिए अलग-अलग आयोग का गठन किया जाए। इसके लिए 2003 में 89वाँ संविधान संशोधन किया गया और उसमें एक नया अनुच्छेद 338-क जोड़ा गया। इस अनुच्छेद के तहत राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग का प्रावधान किया गया। सन्‌ 2004 से राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग एक अलग संस्था के रूप में अस्तित्व में आया।

आयोग की संरचना (Structure of Commission)

  • राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग में एक अध्यक्ष एक उपाध्यक्ष एवं तीन सदस्य होते हैं। इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति दव्ारा की जाती है। इनकी सेवा शर्तें एवं कार्यकाल भी राष्ट्रपति दव्ारा निर्धारित किया जाता है।
  • देश में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के 6 क्षेत्रीय कार्यालय है जो इसके आँख और कान का कार्य करते हैं। वे राज्य स्तर पर अनुसूचित जनजातियों के कल्याण से संबंधित नीतिगत फैसलों पर नज़र रखते हैं तथा इनसे संबंधित दिशा-निर्देश जारी करते हैं और समय-समय पर राष्ट्रीय मुख्यालय को घटनाक्रम की जानकारी देते रहते हैं।

आयोग के कार्य (Functions of Commission)

  • अनुसूचित जनजातियों के लिए संवैधानिक प्रावधानों, किसी विशेष समय में बनाए गए कानूनों या किसी सरकारी आदेश के अधीन किये गए विशेष रक्षोपायों से संबंधित सभी विषयों का अन्वेषण एवं निगरानी करना तथा रक्षोपायों के कार्यकरण का मूल्यांकन करना।
  • अनुसूचित जनजातियों को उनके अधिकारों और रक्षोपायों से वंचित करने के संबंध में विशिष्ट शिकायतों की जाँच करना।
  • अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक-आर्थिक विकास की योजना प्रक्रिया में सहभागिता करना एवं परामर्श देना तथा केन्द्र एवं राज्यों के अधीन उनके विकास की प्रगति का मूल्यांकन करना।
  • इनके रक्षोपायों से संबंधित वार्षिक या ऐसे समय पर जब आयोग ठीक समझे, राष्ट्रपति को रिपोर्ट देना।
  • ऐसी रिपोर्टों में उनके रक्षोपायों के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु उन उपायों का उल्लेख किया जाता है, जो केन्द्र एवं राज्यों दव्ारा किये जाने चाहिए। इसके साथ उन उपायों का उल्लेख भी किया जाता है जो अनुसूचित जनजातियों के संरक्षण, कल्याण एवं सामाजिक आर्थिक विकास के लिए जरूरी हो।
  • अनुसूचित जनजातियों के संरक्षण, कल्याण, विकास एवं उन्नति के लिए ऐसे अन्य कृत्यों का निवर्हन करना जो राष्ट्रपति, संसदीय विधि के अधीन विनिर्दिष्ट करे।

आयोग अनुसूचित जनजातियों पर होने वाले अत्याचार या उत्पीड़न के मामलों में स्वत: संज्ञान लेकर कार्रवाई शुरू कर देती है। यह अनुसूचित जनजातियों के लिए विधायन से संबंधित मामलों में भी स्वत: संज्ञान लेकर अपनी राय जाहिर करती है।

आयोग की शक्तियाँ (Powers of Commission)

राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को अपने जाँच और अनुसंधान कार्यों को सुगमतापूर्वक जारी रखने के लिए सिविल कोर्ट की शक्ति दी गई है। इसके तहत उसे निम्नलिखित शक्तियाँ प्राप्त है-

  • किसी व्यक्ति को समन करना, हाजिर करवाना एवं शपथ पर परीक्षा करना।
  • किसी दस्तावेज की खोज एवं पेश करवाना।
  • शपथपत्र पर साक्ष्य प्राप्त करना।
  • किसी न्यायालय या कार्यालय से कोई रिकॉर्ड या उसकी कॉपी मंगवाना।
  • दस्तावेजों एवं साक्ष्यों के परीक्षण के लिए आदेश जारी करना।
  • कोई अन्य मामला जिसे राष्ट्रपति विधि दव्ारा निर्धारित करे।

आयोग अपने कार्यों से संबंधित वार्षिक प्रतिवेदन राष्ट्रपति को सौंपता है। यदि आयोग आवश्यक समझे तो समय से पहले भी रिपोर्ट दे सकता है। राष्ट्रपति उस रिपोर्ट को संसद के समक्ष रखवाता है। इस रिपोर्ट के साथ उसकी अनुशंसाओं पर की गई कार्रवाई तथा यदि किसी अनुशंसा को अस्वीकृत किया गया तो उसका कारण भी ज्ञापन के रूप में होता है। ऐसी कोई रिपोर्ट जो किसी राज्य से संबंधित हो तो ऐसी रिपोर्ट की एक प्रति उस राज्य के राज्यपाल को भेजी जाती है। राज्यपाल इस रिपोर्ट को राज्य विधान मंडल के समक्ष रखवाता है। साथ ही राज्य से संबंधित रिपोर्ट पर की गई कार्रवाई या किसी अनुशंसा की अस्वीकृति के कारणों को स्पष्ट करने वाला ज्ञापन भी होता है। संघ तथा राज्यों दव्ारा अनुसूचित जनजातियों को प्रभावित करने वाली सभी महत्वपूर्ण नीतिगत विषयों पर आयोग से परामर्श करने का प्रावधान किया गया है।

राष्ट्रीय आयुक्त भाषायी अल्पसंख्यक (National Commissioner Linguistic Minorities)

संविधान का अनुच्छेद 350-ख राष्ट्रपति दव्ारा भाषायी अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी की नियुक्ति का प्रावधान करता है। इस अधिकारी को राष्ट्रीय आयुक्त भाषायी अल्पसंख्यक (National Commissioner Linguistic Minorities) कहा जाता है। विशेष अधिकारी का यह कर्तव्य होगा कि वह संविधान के अधीन भाषायी अल्पसंख्यकों के लिए किए गए संरक्षण से संबंधित सभी मामलों की जाँच करे और इसकी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपे। राष्ट्रपति इस रिपोर्ट को संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखवाता है।

राष्ट्रीय भाषायी अल्पसंख्यक आयुक्त कार्यालय की स्थापना सन्‌ 1957 में की गई थी। आयुक्त का कार्यालय निम्नलिखित प्रकार से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर अपनी रिपोर्ट तैयार करता है-

  • आयुक्त दव्ारा भेजे जाने वाले प्रश्नावली का राज्य सरकारों दव्ारा दिए गए उत्तर।
  • अन्य संगठनों से प्राप्त सूचनाएँ
  • राज्यों के दौरा के दौरान संग्रहित सूचनाएँ।
  • विभिन्न संगठनों एवं सरकारों दव्ारा प्रकाशित रिपोर्ट।
  • शिक्षाविदों दव्ारा प्रकाशित पुस्तक एवं लेख।

आयुक्त का मुख्यालय इलाहाबाद में है। बेलगाँव (कर्नाटक) , कोलकाता तथा चेन्नई में इसके क्षेत्रीय कार्यालय हैं। प्रत्येक क्षेत्रीय कार्यालय का प्रमुख असिस्टेंट कमिश्नर होता है।

भाषायी अल्पसंख्यक (Linguistic Minorities)

प्रत्येक राज्य में अधिसंख्यक निवासियों की एक मातृभाषा होती है। अन्य लोग जो उस भाषा को नहीं बोलते हैं वे भाषायी अल्पसंख्यक होते हैं लेकिन इनमें से वे व्यक्ति अलग कर दिए जाते हैं जिनकी भाषा राज्य की आधिकारिक भाषा होती है। उदाहरणस्वरूप जम्मू-कश्मीर में उर्दू भाषायी व्यक्ति संख्या में अल्पसंख्यक हैं, लेकिन वे भाषायी अल्पसंख्यकों में शामिल नहीं क्योंकि उर्दू जम्मू-कश्मीर राज्य की आधिकारिक (Official) भाषा है।

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