Quasi-Judicial Institutions: National Human Rights Commission

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राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (National Human Rights Commission)

कार्यकाल (Term of Office)

आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्ष या 70 वर्ष की उम्र (इनमें जो भी पहले हो) का होता है। कार्यकाल समाप्ति के पश्चात्‌ आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्य केन्द्र सरकार या राज्य सरकार में किसी पद के योग्य नहीं होते हैं। कोई भी व्यक्ति जो सदस्य के रूप में पद-ग्रहण करता है, वह 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा करने के पश्चात्‌ अगले 5 वर्ष के कार्यकाल के लिए नियुक्ति के योग्य होगा लेकिन शर्त यह है कि उसने 70 वर्ष की आयु प्राप्त न की हो।

पदमुक्ति या त्यागपत्र (Removal or Resignation)

  • यदि वह दिवालिया हो जाए।
  • यदि वह कार्यकाल के दौरान अपने कार्य क्षेत्र से बाहर किसी व्यवसाय में संलिप्त होता है।
  • यदि वह शारीरिक व मानसिक कारणों से कार्य करने में असमर्थ हो।
  • यदि वह मानसिक रूप से अस्वस्थ हो तथा सक्षम न्यायालय ऐसी घोषणा करे।
  • यदि वह न्यायालय दव्ारा किसी अपराध का दोषी या सजायाफ्ता हो।

इसके अतिरिक्त राष्ट्रपति आयोग के अध्यक्ष या सदस्य को साबित कदाचार या अक्षमता के कारण भी पद से हटा सकता है हालाँकि इस स्थिति में राष्ट्रपति इस विषय को उच्चतम न्यायालय में जाँच के लिए सौंपेगा। यदि जाँच के उपरांत उच्चतम न्यायालय इन आरोपों को सही पाता है तो उसकी सलाह पर राष्ट्रपति सदस्यों या अध्यक्ष को उनके पद से हटा सकता है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष, सदस्य राष्ट्रपति को हस्तलिखित सूचना देकर अपना पदत्याग कर सकता है।

आयोग के कार्य (Functions of the Commission)

  • आयोग को यह अधिकार प्राप्त है कि वह मानवाधिकार उल्लंघन से संबंधित मामलों की जाँच करें।
  • लोक सेवकों दव्ारा किये जाने वाले मानवाधिकार हनन से संबंधित मामलों की जाँच करना (न्यायालयीय आदेश या स्वत: संज्ञान लेकर)
  • जेलों एवं बंदीगृहों में जाकर वहाँ की स्थिति देखना एवं सुधार हेतु आवश्यक अनुशंसा करना।
  • आतंकवाद सहित उन सभी मामलों की समीक्षा करना, जिससे मानवाधिकारों का उल्लंघन होता हैं।
  • मानवाधिकारों से संबंधित संधियों अंतरराष्ट्रीय समझौतों का अध्ययन एवं उनके प्रभावी क्रियान्वयन हेतु सिफारिश करना।
  • मानवाधिकारों के क्षेत्र में शोध एवं प्रोत्साहन प्रदान करना।
  • मानवाधिकारों एवं उनके संरक्षण से संबंधित विधिक उपायों के प्रति जन जागरूकता पैदा करना।
  • मानवाधिकारों के क्षेत्र में कार्यरत संगठनों को सहयोग एवं उनके प्रयासों की सराहना करना।
  • न्यायालय के समक्ष मानवाधिकार हनन से संबंधित विचारधीन मामलों में न्यायालय की पूर्व अनुमति से हस्तक्षेप करना।
  • स्ांविधान या किसी कानून के तहत मानवाधिकार संरक्षण उपायों की समीक्षा करना तथा उनके प्रभावी क्रियान्वयन के उपायों की अनुशंसा करना।

जाँच के संबंध में शक्तियाँ (Powers Relating of Inquiries)

आयोग को सिविल न्यायालय जैसे अधिकार एवं शक्तियाँ प्राप्त हैं। यह केन्द्र या राज्य सरकारों से किसी भी प्रकार की जानकारी या रिपोर्ट की मांग कर सकता है। आयोग के पास मानवाधिकार से संबंधित शिकायतों की जाँच हेतु एक जाँच दल की व्यवस्था है। आयोग उन्हीं मामलों की जाँच करता है, जिसे घटित एक वर्ष से ज्यादा समय व्यतीत न हुआ हो। आयोग वैसे मामलों की जाँच नहीं करेगा जो राज्य मानवाधिकार आयोग या विधिवत गठित किसी अन्य आयोग के विचारधीन होगा। आयोग ऐसी जगह और समय पर अपनी बैठकें कर सकेगा, जहाँ अध्यक्ष इसके लिए उपयुक्त समझता है।

जाँच के संबंध में आयोग-

  • गवाहों को अपने पास बुला सकता है एवं उसका परीक्षण (Examining) कर सकता है।
  • किसी भी दस्तावेज को अपने पास मंगवा सकता है।
  • शपथपत्र पर गवाही ले सकता है।
  • किसी भी न्यायालय या कार्यालय से अभिलेख या रिकॉर्ड अपने पास मंगवा सकता है।
  • अन्य मामले जो यह निर्धारित करें।
    • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग जाँचोपरांत पीड़ित व्यक्ति को क्षतिपूर्ति/अंतरिम सहायता हेतु संबंधित सरकार या प्राधिकरण को सिफारिश कर सकता है। आयोग इस संबंध में आदेश/निर्देश के लिए उच्चतम या उच्च न्यायालय जा सकता है। स्पष्ट है कि आयोग की भूमिका सलाह देने या सिफारिश करने की होती है, आयोग मानवाधिकार उल्लंघन के दोषी व्यक्ति को दंड नहीं दे सकता और न ही पीड़ित व्यक्ति को किसी प्रकार की आर्थिक क्षतिपूर्ति प्रदान कर सकता है। आयोग की सिफारिशें संबंधित सरकार या प्राधिकरण के लिए बाध्यकारी नहीं होती, लेकिन सिफारिशों के संदर्भ में की गई कार्रवाई को एक महीने के भीतर आयोग को सूचित करना होता है। सामान्य तौर पर सरकार आयोग की सिफारिशों को पूर्णत: नकार नहीं पाती है और इन पर विचार करती है। आयोग की वार्षिक रिपोर्ट, को केन्द्र सरकार के माध्यम से संसद के सक्षम प्रस्तुत किया जाता है।
    • सेना से जुड़े मानवाधिकार हनन के मामलों में आयोग या तो स्वत: संज्ञान लेकर या याचिका (Petition) के आधार पर केन्द्र सरकार से रिपोर्ट मिलने पर या तो यह आगे की कार्रवाई बंद कर देता है या सरकार के पास अपनी अनुशंसा (Recommendations) भेजता है। इन अनुशंसाओं पर की गई कार्रवाई के संदर्भ में तीन महीने या जैसा आयोग समय निर्धारित करें, के भीतर सरकार दव्ारा आयोग को सूचना देनी होती है। आयोग अपनी रिपोर्ट एवं अनुशंसाओं के साथ-साथ सरकार दव्ारा की गई कार्रवाई को सार्वजनिक या प्रकाशित करता है।

अंतरराष्ट्रीय प्रस्थिति (International Situation)

  • राष्ट्रीय अधिकार संस्थाओं की अंतरराष्ट्रीय समन्वय समिति दव्ारा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को ‘अ’ प्रस्थिति ( ‘A’ status) दिया गया है। इससे संकेत प्राप होता है कि यह पेरिस सिद्धांतों के अनुरूप है। पेरिस सिद्धांत के तहत अक्टूबर 1991 में विशेषज्ञों की बैठक में मानव अधिकारों के संरक्षण एवं उन्नयन पर सहमति प्रकट की गई थी, इसके बाद इसे संयुक्त राष्ट्र महासभा दव्ारा सहमति प्राप्त हुई थी। इस प्रकार राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, मानव अधिकारों से संबंधित अंतरराष्ट्रीय समन्वय समिति तथा इसके क्षेत्रीय उप समूह एशिया प्रशांत मंच (Asia Pacific Forum) की बैठकों में सम्मिलित हो सकता है।
  • संयुक्त राष्ट्र संघ प्रायोजित पेरिस बैठक में राष्ट्रीय मानव अधिकार संस्थाओं के प्रस्थिति (Status) से संबंधित सिद्धांतों की विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत की गई थी, सामान्य तौर पर इन्हें ही पेरिस सिद्धांत कहा जाता है इन सिद्धांतों में उल्लिखित है कि राष्ट्रीय संस्थाएँ, व्यापक जनादेश, बहुलवाद के साथ-साथ प्रतिनिधित्वकारी, व्यापक पहुँच प्रभाविता, स्वतंत्रता, पर्याप्त संसाधन तथा अनुसंधान करने की शक्ति पर आधारित होने चाहिए।

भारत में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग दव्ारा विभिन्न मानव अधिकार मुद्दों को सुलझाने का प्रयास किया जा रहा है, इनमें मुख्य तौर पर हैं-

  • बालश्रम का उन्मूलन।
  • मानसिक उपचार करने वाले अस्पतालों की कार्य प्रणाली।
  • सरकार दव्ारा संचालित महिला आवासों की कार्य प्रणाली।
  • खाद्य सुरक्षा का अधिकार।
  • बंधुआ मजदूरी।
  • अभावग्रस्त एवं अधिकारहीन महिलाओं की दशा।
  • कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ की जाने वाली लैंगिक उत्पीड़न के मामले।
  • सिर पर मैला ढोने की प्रथा।
  • दलितों पर अत्याचार के मामले।
  • बंजारा एवं अधिसूचित जन जातियों के मामले।
  • शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्तियों के अधिकार।
  • एच आई वी/एड्‌स से जुड़े मामले।
  • विभिन्न प्रकार के आपदाओं से ग्रस्त व्यक्तियों की समस्याएँ आदि को सुलझाने का प्रयास किया जा रहा है।

इसके अलावा सिलिका उत्खनन से जुड़े वैसे श्रमिकों, जो सिलिकोसिस से प्रभावित हो रहे हैं उनकी बीमारी को कम करने, इसकी रोकथाम, उपचार, पुनर्वास, क्षतिपूर्ति हेतु आयोग प्रयासरत है। बाल व महिला संबंधित मुद्दों में महिलाओं के स्वास्थ्य एवं प्रजनन अधिकार, महिला एवं बच्चों के दुर्व्यापार, महिलाओं बालिकाओं, के साथ होने वाले दुष्कर्म जैसे मुद्दों को सुलझाने में प्रयासरत है।

राज्य मानवाधिकार आयोग (State Human Rights Commission)

मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के केन्द्रीय स्तर के साथ-साथ राज्य स्तर पर भी मानव अधिकार आयोगों की स्थापना का प्रावधान करता है। अब तक देश के 22 राज्यों में आधिकारिक तौर पर मानव अधिकार आयोगों की स्थापना की गई है। राज्य मानव अधिकार आयोग केवल उन्हीं मामलों में मानव अधिकारों के उल्लंघन की जाँच करते हैं, जो संविधान की राज्य सूची या समवर्ती सूची के अतंर्गत आते हैं। यदि संबंधित मामले की जाँच पहले मानव अधिकार आयोग दव्ारा की जा रही है, तब राज्य मानव अधिकार आयोग मामले की जाँच नहीं करता है।

आयोग की संरचना (Structure of Commission)

राज्य मानव अधिकार आयोग में एक अध्यक्ष एवं दो सदस्य हाेेते हैं। अध्यक्ष उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्ति मुख्य न्यायाधीश होता है। दो सदस्यों में से एक संबंधित उच्च न्यायालय में कार्यरत या सेवानिवृत्त न्यायाधीश या राज्य के जिला न्यायालयों का कोई न्यायाधीश जिसे जिलाधीश के रूप में 7 वर्ष का अनुभव प्राप्त हो जबकि दूसरा सदस्य ऐसा व्यक्ति होता है, जिसे मानव अधिकार से संबंधित जानकारी या व्यावहारिक अनुभव प्राप्त होता है। आयोग का सचिव मुख्य कार्यकारी अधिकारी (Chief Executive Officer) के रूप में कार्य करता है और वैसी शक्तियों का प्रयोग करता जो राज्य मानव अधिकार आयोग उसे सौंपता है।

नियुक्ति (Appointment)

राज्य मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल एक समिति की अनुशंसा पर करते हैं। इस समिति में मुख्यमंत्री (अध्यक्ष) विधानसभाध्यक्ष (सदस्य) राज्य का गृहमंत्री (सदस्य) विधानसभा में विपक्ष का नेता (सदस्य) के तौर पर शामिल होते हैं। विधान परिषद वाले राज्यों में विधान परिषद अध्यक्ष एवं विधान परिषद में विपक्ष के नेता भी सदस्य के तौर पर शामिल किए जाते हैं। संबंधित राज्य उच्च न्यायालय या जिला न्यायालय में कार्यरत न्यायाधीश की नियुक्ति, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श के पश्चात्‌ ही की जा सकती है।

कार्यकाल (Term of Office)

राज्य मानव अधिकार के अध्यक्ष एवं सदस्यों का कार्यकाल राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों के समान ही है (5 वर्ष का कार्यकाल या 70 वर्ष की आयु दोनों में से जो भी पहले हो) । पदमुक्ति के पश्चात्‌ अध्यक्ष व सदस्य केन्द्र एवं राज्य दोनों ही सरकारों के अधीन कोई सरकारी पद ग्रहण नहीं कर सकते हैं। राज्य मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष की मृत्यु, त्यागपत्र या अन्य कारणों से हुए पदरिक्ति की स्थिति में राज्यपाल अधिसूचना जारी कर किसी सदस्य को अध्यक्ष के रूप में कार्य करने के लिए नये अध्यक्ष की नियुक्ति होने तक के लिए अधिकृत कर सकेगा।

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