Quasi-Judicial Institutions: Structure of Planning Commission

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योजना आयोग (Planning Commission)

  • योजना आयोग का गठन केन्द्र सरकार के एक प्रस्ताव दव्ारा 15 मार्च 1950 को किया गया था। इस तरह योजना आयोग न तो संवैधानिक संस्था है और न ही विधिक बल्कि यह एक संविधानेतर (Extra-Constitutional) संस्था है जिसकी प्रकृति सलाहकारी (Advisory) है।
  • भारत का संविधान नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान करता है। इसके साथ ही राज्य के नीति-निदेशक तत्वों का भी प्रावधान करता हैं। इसमें राज्य से यह अपेक्षा की गई है कि वह लोगों के कल्याण के लिए ऐसे सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करेगा, जिसमें सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय की प्राप्ति हो सके। अर्थात नागरिकों जिसमें महिला एवं पुरुष दोनों शामिल हैं, को आजीविका के साधनों पर बराबर का अधिकार हो, देश के भौतिक संसाधनों का नियंत्रण एवं स्वामित्व इस प्रकार हो जिससे कि सामाजिक कल्याण को बढ़ावा मिल सके, आर्थिक व्यवस्था का इस तरह संचालन हो जिससे कि धन केन्द्रीकरण न हो सके या सामान्य कल्याण में बाधा न बने आदि। इन्हीं लक्ष्यों की प्राप्ति के संदर्भ में योजना आयोग का गठन किया गया। राज्य सरकारें योजना आयोग में प्रतिनिधित्व नहीं करती हैंं। इस तरह योजना आयोग पूर्णतया केन्द्रीय संस्था है।

योजना आयोग की संरचना (Structure of Planning Commission)

  • भारत का प्रधानमंत्री योजना आयोग का पदेन (de-facto) अध्यक्ष होता है। आयोग का उपाध्यक्ष पूर्ण कालिक कार्यकारी प्रमुख होता है। योजना का प्रारूप बनाने तथा उसे केन्द्रीय मंत्रिमंडल के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए वह उत्तरदायी होता है। उसे कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त होता है लेकिन वह मंत्रिपरिषद का सदस्य नहीं होता है। बिना मताधिकार के वह कैबिनेट की बैठकों में भाग ले सकता है। कुछ केन्द्रीय मंत्री इसके अंशकालिक सदस्य होते हैं।
  • आयोग का एक सदस्य सचिव होता है जो सामान्यतया भारतीय प्रशासनिक सेवा का अधिकारी होता है। वर्तमान में सुश्री सिन्धुश्री खुल्लर आयोग की सदस्य सचिव है।
  • आयोग में दैनिक कार्य सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत पर आधारित होता है। हालाँकि सुविधा के लिए प्रत्येक सदस्य को कई विषय आबंटित किए जाते हैं। उन विषयों से संबंधित तकनीकी एवं अन्य समस्याओं से निपटना उस सदस्य का ही दायित्व होता है। महत्वपूर्ण नीतियों के संदर्भ में पूरा आयोग विचार करता है। आयोग के अध्यक्ष के रूप में प्रधानमंत्री इसमें भाग लेते हैं और सभी महत्वपूर्ण मुद्दों से संबंधित नीतियों पर निर्देश देते हैं।

आयोग में कुल 30 प्रभाग (Division) हैं-

  • कृषि
  • संचार एवं सूचना तकनीकी,
  • विकेन्द्रीकृत योजना एवं पंचायती राज,
  • पर्यावरण एवं वन,
  • स्वास्थ्य, परिवार कल्याण एवं पोषण,
  • आवास एवं शहरी मामले,
  • वित्तीय संसाधन,
  • मानव संसाधन विकास,
  • उद्योग,
  • आधारभूत संरचना,
  • अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था,
  • अंतरराष्ट्रीय संबंध प्रकोष्ठ,
  • श्रम रोजगार एवं मानव संसाधन,
  • खनिज,
  • अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ,
  • योजना समन्वय एवं प्रबंधन,
  • बिजली एवं ऊर्जा,
  • प्रोजेक्ट मूल्यांकन एवं प्रबंधन,
  • ग्रामीण विकास,
  • विज्ञान एवं तकनीक,
  • सामाजिक न्याय एवं कल्याण,
  • सामाजिक आर्थिक अनुसंधान,
  • राज्य योजना,
  • यातायात एवं पर्यटन,
  • ग्रामीण एवं लघु उद्योग,
  • स्वैच्छिक कार्य प्रकोष्ठ,
  • जल संसाधन प्रकोष्ठ,
  • महिला एवं बाल विकास,
  • विकास नीति एवं प्ररिप्रेक्ष्य योजना (Perspective Planning) ,
  • कार्यक्रम मूल्यांकन संगठन।

योजना आयोग के कार्य (Functions of Planning Commission)

1950 के प्रस्ताव में योजना आयोग के निम्नलिखित कार्य बताए गए हैं-

  • देश के भौतिक (Material) , पूंजीगत एवं मानव संसाधनों के साथ-साथ तकनीकी कर्मियों का आकलन करना और यदि ये देश की आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त नहीं है तो उनके संवर्द्धन की संभावनाओं की खोज करना।
  • देश के संसाधनों के प्रभावी एवं संतुलित उपयोग हेतु योजना निर्माण करना।
  • प्राथमिकताओं का निर्धारण करना, उन चरणों या स्तरों को परिभाषित करना जिसमें योजना का क्रियान्वयन हो सके, साथ ही प्रत्येक चरण को पूरा करने हेतु संसाधनों के आबंटन हेतु प्रस्ताव देना।
  • उन कारकों की पहचान करना, जिससे आर्थिक विकास बाधित होता हो तथा तत्कालीन सामाजिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों में ऐसी दशा का निर्माण करना जिसमें योजना का सफलतापूर्वक क्रियान्वयन हो।
  • योजना के प्रत्येक चरण के सफलतापूर्वक क्रियान्वयन हेतु यंत्र (Machinery) की प्रकृति का निर्धारण करना।
  • योजना के प्रत्येक स्तर का मूल्यांकन करना और उसी अनुरूप नीतियों एवं उपायों (Measures) में आवश्यक परिवर्तन लाना।
  • योजना आयोग के कर्तव्यों के निवर्हन या तत्कालीन आर्थिक स्थिति, नीतियों, उपायों या विकास कार्यक्रमों के बारे में अंतरिम अनुशंसा करना तथा केन्द्र या राज्य सरकारों दव्ारा संदर्भित कुछ विशिष्ट समस्याओं के बारे में सलाह देना या उनका परीक्षण करना।

वर्तमान समय में योजना आयोग की प्रासंगिकता (Relevance of Planning Commission in Present Time)

  • एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या आज के आर्थिक उदारीकरण एवं बाजार अर्थव्यवस्था के दौर में योजना का कोई महत्व रह गया है? साथ ही एक अहम सवाल यह भी है कि जिस तरह से विकसित औद्योगिक देशों ने बिना योजना के तीव्र आर्थिक विकास किया है, क्या भारत में भी ऐसा हो सकता है? इस संदर्भ में विश्लेषकों का मानना है कि निश्चित तौर पर भारत भी बिना योजना के विकास कर सकता है लेकिन बिना योजना के भारत जैसे देश को तीव्र आर्थिक विकास करने में एक लंबा समय लग सकता है जिसकी प्रतीक्षा नहीं की जा सकती। भारत में अब यह महसूस किया जाने लगा है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत बाजार अर्थव्यवस्था बेहतर परिणाम दे सकती है, यदि उसमें राजनीतिक हस्तक्षेप कम कर दिया जाए। इसके लिए निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन देने की भी आवश्यकता है। भारत में 1990 के दशक से निजी क्षेत्र की कार्य क्षमता को सुधारने के लिए प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ावा दिया गया। विदेशी पूंजी और विदेश व्यापार के लिए अर्थव्यवस्था को खोल दिया गया। लेकिन यह मान लेना एक भूल ही होगी कि बाजार पर निर्भरता से सारे उद्देश्य पूरा हो जाएँगे। यह वितरणात्मक उद्देश्यों को पूरा नहीं कर सकता क्योंकि बाजार अर्थव्यवस्था से सबको बराबर लाभ नहीं मिल सकता। बाजार अर्थव्यवस्था को असफल होने से बचाने के लिए कई तरह के सुधारात्मक उपाय करने होते हैं। ऐसी समस्याओं को सरकार के विभिन्न स्तरों पर सोची समझी सुसंगत नीतियों एवं कार्यक्रमों के माध्यम से ही सुलझाया जा सकता है। यहीं से योजना आयोग जैसी संस्था की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। यह सांकेतिक योजना (Indicative Planning) के माध्यम से अर्थव्यवस्था संबंधी व्यापक रूपरेखा तय करती है तथा साथ ही चुनौतियों का भी जिक्र कर दिया जाता है। योजना उन जरूरी आधारभूत संरचना के लिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है जिनका आयात नहीं किया जा सकता, जैसे- स्कूल, अस्पताल, सड़क, बिजली, वायुपत्तन (Airport) , पत्तन (Ports) , दूरसंचार (Telecommunication) , जल आपूर्ति, सीवेज आदि। भारत में इस समय जिस सांकेतिक योजना की बात की जाती है, जिसके तहत महत्वपूर्ण या जोखिम भरे (Critical) क्षेत्रों की ओर ध्यान खींचा जाता है और इनसे संबंधित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए कठोर नीतिगत विकल्पों की पहचान की जाती है। सामान्य तौर पर इसके तहत समस्याओं की तरफ ध्यान खींचा जाता है, समाधान हेतु रूपरेखा बनाया जाता है तथा बातचीत का अवसर उपलब्ध कराया जाता है जिससे नीतियों को लागू करने से पहले सभी संबंधित भागीदार भाग ले सकें।
  • भारतीय अर्थव्यवस्था उच्च केन्द्रीकृत योजना (Centralised Planning) से सांकेतिक योजना (Indicative Planning) की तरफ बढ़ रहा है। इस सांकेतिक योजना के तहत योजना आयोग देश की प्राथमिकताओं का निर्धारण करता है और दीर्घकालिक भविष्य के लिए सामारिक दृष्टिकोण का निर्माण करता है। यह क्षेत्रवार (Sectoral) लक्ष्यों का निर्धारण करता है तथा उनकी प्राप्ति के लिए प्रोत्साहन प्रदान करता है। राष्ट्रीय विकास संबंधी योजनाओं के निर्माण में अपनी विशेषज्ञ सेवाएँ प्रदान करता है। प्राथमिकताओं का निर्धारण करते समय संपूर्ण अर्थव्यवस्था के संदर्भ में योजनाओं एवं कार्यक्रमों का परीक्षण करता है। यह बात भी ध्यान रखने योग्य है कि प्राथमिकताओं का निर्धारण हमेशा आर्थिक आधार पर ही नहीं होता बल्कि सामाजिक आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखकर किया जाता है।
  • आयोग सामाजिक एवं आर्थिक विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में समग्र रूप से एकीकरण में भूमिका निभाता है। आज भी यह देखा जाता है कि सामाजिक क्षेत्र से जुड़े ग्रामीण स्वास्थ्य, पेयजल, ग्रामीण ऊर्जा, साक्षरता एवं पर्यावरण से संबंधित योजनाओं के सफल क्रियान्वयन हेतु एकीकृत नीतिगत निर्णय लेने की आवश्यकता होती है ताकि इनके बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जा सके। इनके संबंध में एकीकृत निर्णय या उपाय से कम लागत पर बेहतर परिणाम हासिल किया जा सकता है। आयोग का यह प्रयास होता है कि सीमित संसाधनों का कुशलतम उपयोग कर अधिकतम लाभ प्राप्त किया जाए तथा योजनाओं के क्रियान्वयन हेतु योजना लागत (Plan Outlay) न बढ़ाकर निश्चित की गई योजना लागत पर ही कार्य दक्षता बढ़ाई जाए।
  • आज यह देखा जाता है कि केन्द्र एवं राज्यों के बीच संसाधन आबंटन को लेकर तनाव बना रहता है। बजटीय आबंटन को लेकर योजना आयोग पर एक तरह का दबाव देखा जाता है। इस स्थिति में सभी के हितों की देखभाल एवं उनके बीच मध्यस्थ एवं सुविधा प्रदाता की भूमिका में योजना आयोग की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। यह सरकार के लिए थिंक टेंक (Think Tank) की भूमिका निभाता है।
  • यह हर स्तर के स्व प्रबंधित संगठनों (Self Managed Organisations) पर निर्भर करता है कि उपलब्ध संसाधनों का कुशलतम उपयोग कैसे किया जाए। इस संदर्भ में योजना आयोग व्यवस्था के तहत रहकर व्यवस्था को बदलने हेतु सरकार को परामर्श देता है। अपने अनुभवों के आधार पर योजना आयोग सूचना प्रसार का कार्य भी करता है। योजना आयोग का एक महत्वपूर्ण कार्य यह भी है कि वह समय-समय पर मूल्य स्तर (Price Level) तथा उसके अर्थव्यवस्था पर प्रभाव का अध्ययन कर तथा उसे एक निश्चित स्तर पर बनाये रखने के लिए विचार प्रस्तुत करे।
  • आर्थिक एवं सामाजिक विकास के संदर्भ में सरकारें तथा योजना आयोग एक-दूसरे की पूरक हैं। कार्यक्रमों एवं नीतियों के निर्माण में योजना आयोग, मंत्रियों के उपयोगी सहायता प्रदान करता है। अपने ज्ञान, अनुभव एवं विशेषज्ञता को एक-दूसरे के साथ बांटते हैं। योजना आयोग सरकार के लिए एक अनुसंधान संस्था के रूप में भी कार्य करता है।

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