Quasi-Judicial Institutions: National Commission for Protection of Child Rights

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राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (National Commission for Protection of Child Rights)

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग, बाल अधिकार अधिनियम के संरक्षण के लिए आयोग, अधिनियम 2005 के तहत मार्च 2007 में स्थापित किया गया था। यह आयोग एक वैधानिक निकाय है। यह आयोग देश में बाल अधिकारों का संरक्षण, संवर्द्धन और प्रतिरक्षण करता है। अधिनियम के अंतर्गत बाल अधिकारों में संयुक्त राष्ट्र समझौता (20 नवंबर, 1989) दव्ारा अंगीकृत बच्चों के अधिकारों को शामिल किया गया है। भारत सरकार दव्ारा 11 दिसंबर, 1992 को इस समझौते का अनुमोदन किया गया था। इस समझौते के तहत बाल 0 से 18 वर्ष के आयु वर्ग में एक व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है। आयोग बच्चों से जुड़े सभी कानूनों एवं कार्यक्रमों के प्रभावी क्रियान्वयन की जिम्मेदारी निभाता है। हर बच्चों को छूने के लिए आदेश में, यह समुदायों और परिवारों के लिए एक गहरी पैठ चाहता है। आयोग के लिए, बच्चों के सभी अधिकार बराबर महत्व के हैं।

आयोग का संघटन (Composition of Commission)

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग सार्वभैमिकता और बाल अधिकारों की पवित्रता के सिद्धांत पर जोर देता है और देश की नीतियों से संबंधित सभी बच्चों में तात्कालिकता के स्वर को पहचानता है। आयोग बहुसदस्यीय निकाय है। जिसमें एक अध्यक्ष एवं छह सदस्य होते हैं। छह सदस्यों में से दो महिला सदस्यों का होना अनिवार्य है। आयोग का अध्यक्ष ऐसे व्यक्ति को बनाया जाता है, जिसमें बच्चों के कल्याण को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष कार्य किया हो। छह सदस्यों का चयन ऐसे व्यक्तियों में से किया जाता है जिनमें श्रेष्ठ गुण, योग्यता, सत्यनिष्ठा, स्थिरता के अलावा निम्न क्षेत्रों में अनुभव होना आवश्यक होता है-

  • शिक्षा
  • बाल स्वास्थ्य देखभाल, बाल विकास या कल्याण
  • किशोर न्याय या उपेक्षित व विकलांग बच्चों के मामले
  • बाल श्रम का उन्मूलन या बच्चों के लिए तनावपूर्ण स्थितियों का उन्मूलन
  • बाल मनोविज्ञान या समाजशास्त्र
  • बच्चों से जुड़े कानून
    • केन्द्र सरकार दव्ारा अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति की जाती है, परन्तु अध्यक्ष की नियुक्ति केन्द्र सरकार दव्ारा गठित तीन सदस्यीय चयन समिति की सिफारिश पर की जाती है। इस समिति का अध्यक्ष महिला एवं बाल विकास विभाग का मंत्री होता है।
    • केन्द्र सरकार दव्ारा अध्यक्ष एवं सदस्यों के वेतन व अन्य सेवा शर्तों का निर्धारण किया जाता है, फिर भी नियुक्ति के पश्चात्‌ इनमें कोई अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जा सकता है।

सदस्यों का कार्यकाल और पदच्युति (Tenure and Dismissal of Members)

आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों का कार्यकाल तीन वर्ष का होता है इन्हें दो से अधिक कार्यकाल के लिए नियुक्त नहीं किया जा सकता है।

इसके अतिरिक्त अन्य बातें निम्नवत्‌ हैं-

  • अध्यक्ष 65 वर्ष तक अपने पद पर बने रह सकता है।
  • सदस्यों के संबंध में यह 60 वर्ष है।

अध्यक्ष या सदस्य केन्द्र सरकार को संबोधित कर अपने त्याग पत्र किसी भी समय अपना पद छोड़ सकता है। केन्द्र सरकार अध्यक्ष को कदाचार या अक्षमता के आधार पर पद से हटा सकती है। इसके अतिरिक्त यह निम्नलिखित परिस्थितियों में अध्यक्ष या सदस्य को उसके पद से बर्खास्त कर सकता है यदि-

  • वह दिवालिया घोषित किया गया हो।
  • उसे सक्षम अदालत दव्ारा मानसिक रूप से अस्वस्थ्य घोषित किया गया है।
  • वह कार्य करने में अक्षम हो जाता है।
  • उसे किसी ऐसे अपराध के लिए दोषी सिद्ध किया गया है एवं सजा दी गयी है। जो केन्द्र सरकार की दृष्टि में नैतिक कदाचार माना जाता है।
  • वह आयोग की लागातार तीन बैठकों में अनुपस्थित रहता है।

इसके बावजूद अध्यक्ष या सदस्य को तब तक उसके पद से नहीं हटाया जा सकता जब तक कि उसे सुनवाई का एक उचित अवसर न दिया जाये।

आयोग के कार्य (Commission Functions)

आयोग के कार्य निम्नलिखित है-

  • बाल अधिकारों के संरक्षण हेतु विभिन्न कानूनों दव्ारा उपलब्ध कराये गये सुरक्षा उपायों की जांच एवं समीक्षा करना तथा उनके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए उपायों की सिफारिश करना।
  • केन्द्र सरकार को वर्तमान वार्षिक और इस तरह के अन्य अंतराल पर आयोग के रूप में उन रक्षा उपायों के कार्यकरण पर रिपोर्ट भेजना।
  • बाल अधिकारों के उल्लंघन की जांच करने एवं इस तरह के मामले में कार्यवाही की सिफारिश करना।
  • आतंकवाद, सांप्रदायिक हिंसा, दंगों, प्राकृतिक आपदा, घरेलू हिंसा, एचआईवी/एड्‌स, तस्करी, अत्याचार और शोषण, अश्लील साहित्य और वेश्यावृत्ति जैसे कारकों का परीक्षण करना जो बच्चों के अधिकारों के उपभोग को बाधित करते हैं और उपचारात्मक उपायों की सिफारिश करना।
  • विशेष देखभाल की जरूरत वाले बच्चों से जुड़े मामलों को देखना और उपचारात्मक उपाय सुझाना। इन बच्चों में तनावग्रस्त बच्चे, सीमांत बच्चे, किशोर अपराधी, कानूनी लड़ाई में कैसे बच्चे, परिवारहीन बच्चे, कैदियों के बच्चे इत्यादि शामिल है।
  • संधियों एवं अन्य अंतरराष्ट्रीय उपकरणों का अध्ययन करने और बाल अधिकारों पर मौजूदा नीतियों, कार्यक्रमों और अन्य गतिविधियों की सांविधिक समीक्षा करने तथा सर्वोत्तम हित में उनके प्रभावी कार्यान्वयन के लिए सिफारिश करना।
  • बाल अधिकारों के क्षेत्र में शोध कार्य हाथ में लेना और उसे प्रोत्साहित करना।
  • समाज के विभिन्न वर्गों के बीच बाल अधिकार साक्षरता को फैलाना और इन अधिकारों के संरक्षण हेतु उपलब्ध सुरक्षा उपायों के बारे में जागरूकता बढ़ाना।
  • किसी किशोर संरक्षण गृह या किसी भी अन्य आवास या संस्था का निरीक्षण करना, जहाँं बच्चों को उपचार, सुधार और संरक्षण के उद्देश्य से रखा जाता है।
  • आयोग निम्नलिखित से जुड़े मामले में शिकायतों की जांच कर सकता है। अपनी पहल पर इन मामलों को संज्ञान में ले सकता है-
    • बाल अधिकारों के अभाव और उल्लंघन
    • बच्चों के संरक्षण और विकास के लिए उपलब्ध कराने के कानूनों की गैर कार्यान्वयन।
    • बच्चों की कठिनाइयां समाप्त करने और उनके लिए कल्याण और राहत सुनिश्चित करने हेतु लिये गये नीतिगत निर्णयों या निर्देशों का गैर अनुपालन।
  • ऐसे अन्य कार्यो को निष्पादित करना, जो बाल अधिकारों के संवर्द्धन हेतु आवश्यक समझे जाये।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि आयोग ऐसे किसी मामले की जाँंच नहीं कर सकता है, जो बाल अधिकारों के संरक्षण हेतु राज्य आयोग या किसी अन्य वैधानिक आयोग के समक्ष लंबित हो।

आयोग की शक्तियाँ (Powers of Commission)

आयोग किसी भी मामले की जांच करते हुए निम्नलिखित मामलों के संबंध में, सिविल प्रक्रियाएं, 1908 के तहत और विशेष रूप से एक सिविल अदालत की सभी शक्तियाँ होती है-

  • किसी भी व्यक्ति को उपस्थिति होने के लिए सम्मन जारी करना और उसका शपथ जांच करना।
  • किसी भी दस्तावेज की खोज और उत्पादन की मांग करना।
  • शपथ पत्रों पर साक्ष्य प्राप्त करना।
  • किसी अदालत या कार्यालय से सार्वजनिक अभिलेख की मांग करना।
  • गवाहों या दस्तावेजों के परीक्षण हेतु सम्मन जारी करना।

आयोग का कार्यचालन (Functioning of the Commission)

आयोग जांच पूरी होने के बाद निम्नलिखित में से कोई कदम उठा सकता है-

  • यह संबंधित सरकार या प्राधिकारी से आरोप प्रक्रिया या संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध किसी अन्य उपयुक्त कार्यवाही शुरू करने की अनुशंसा कर सकता है।
  • यह आवश्यक निर्देशों, आदेशों या परमादेशों के लिए उच्चतम न्यायालय या संबद्ध उच्च न्यायालय की शरण ले सकता है।
  • यह संबंधित सरकार या प्राधिकारी से पीड़ित को आवश्यक अंतरिम राहत देने की सिफारिश कर सकता है।

आयोग की रिपोर्ट (Commission Report)

आयोग केन्द्र सरकार या संबंधित राज्य सरकार को अपनी वार्षिक या विशेष रिपोर्ट प्रेषित करता है। इन रिपोर्टो को एक वर्ष के भीतर आयोग दव्ारा की गयी सिफारिशों पर होने वाली कार्यवाही के एक स्मरण-पत्र के साथ संबंधित विधानमंंडलों के समक्ष रखा जाता है। इस स्मरण-पत्र में ऐसी किसी सिफारिश को अस्वीकार करने के कारणों का उल्लेख भी किया जाता है।

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