Quasi-Judicial Institutions: State Human Rights Commission

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राज्य मानवाधिकार आयोग (State Human Rights Commission)

पद मुक्ति या त्यागपत्र (Removal or Resignation)

राज्य मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल करता है लेकिन उन्हें पद से केवल राष्ट्रपति ही हटा सकता है। पद से हटाने का आधार वही है, जो राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों के लिए है। राज्य मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष या सदस्यों को उनके पद से साबित कदाचार या अक्षमता के आधार पर राष्ट्रपति दव्ारा हटाया जा सकता है लेकिन राष्ट्रपति ऐसा कदम सर्वोच्च न्यायालय से मांगे गए राय के संदर्भ में लेता है। राज्य मानव अधिकार आयोग अध्यक्ष के सदस्य राज्यपाल को हस्तलिखित सूचना देकर अपना पद त्याग सकते हैं।

इसके अलावा राष्ट्रपति निम्न परिस्थितियों में अध्यक्ष या सदस्य को उसके पद से हटा सकते हैं:

  • यदि वह दिवालिया हो जाए।
  • यदि वह कार्यकाल के दौरान अपने कार्य क्षेत्र से बाहर किसी व्यवसाय में संलिप्त होता है।
  • यदि वह शारीरिक व मानसिक कारणों से कार्य करने में असमर्थ हो।
  • यदि वह सक्षम न्यायालय दव्ारा मानसिक रूप से अस्वस्थ घोषित किया हो।
  • यदि वह न्यायालय दव्ारा किसी अपराध का दोषी या सजायाफ्ता हो और राष्ट्रपति की दृष्टि में यह नैतिक तौर पर गलत है।

वेतन एवं भत्ते (Salary and Allowances)

राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों के वेतन भत्ते एवं अन्य शर्तों का निर्धारण राज्य सरकार करती है लेकिन उनके कार्यकाल के दौरान उनमें कोई अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जा सकता।

कार्यक्षेत्र (Jurisdiction)

राज्य मानवाधिकार आयोग के कार्य एवं शक्तियाँ भी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग जैसी ही है लेकिन इसका कार्यक्षेत्र सीमित होकर राज्य विशेष तक ही रह जाता है। यह बात राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के साथ-साथ राज्य मानवाधिकार आयोग पर भी लागू होती है कि मानवाधिकार हनन से संबंधित घटना घटने के एक साल के बाद इस संदर्भ में कोई जाँच-पड़ताल नहीं की जाएगी। मानवाधिकार हनन संबंधी मामलों की जाँच के लिए आयोग विशेष जाँच टीम (Special Investigation Team) का गठन कर सकती है। राज्य मानवाधिकार आयोग के वार्षिक प्रतिवेदन को राज्य विधान सभा में रखा जाता है तथा यह बताया जाता है कि आयोग दव्ारा की गई अनुशंसाओं के संदर्भ में क्या कार्रवाई की गई। किसी सलाह को न मानने का तार्किक उत्तर राज्य सरकार को देना होता है।

भारत में 22 राज्यों में मानवाधिकार आयोग की स्थापना की जा चुकी है, जिसके नाम निम्नलिखित हैं-

  • असम,
  • आंध्र प्रदेश,
  • बिहार,
  • छत्तीसगढ़,
  • गुजरात,
  • हिमाचल प्रदेश,
  • जम्मू-कश्मीर,
  • केरल,
  • कर्नाटक,
  • मध्य प्रदेश,
  • महाराष्ट्र,
  • मणिपुर,
  • ओडिशा,
  • पंजाब,
  • राजस्थान,
  • तमिलनाडु,
  • उत्तर प्रदेश,
  • पश्चिम बंगाल,
  • झारखंड,
  • सिक्किम,
  • गोवा,
  • उत्तराखंड

मानवाधिकार न्यायालय (Human Rights Courts)

मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 (The Protection of Human Right Act, 1993) देश के प्रत्येक जिले में मानवाधिकारों के उल्लंघन से संबंधित मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए एक मानवाधिकार न्यायालय की स्थापना का प्रावधान करता है। राज्य सरकार दव्ारा इस प्रकार के किसी न्यायालय की स्थापना राज्य उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सलाह पर ही की जा सकती है। ऐसे प्रत्येक न्यायालय में राज्य सरकार एक विशेष लोक अभियोजक नियुक्त करती है।

मानवाधिकारों से संबंधित व्यावहारिक पहलू (Practical Aspects Regarding Human Rights)

  • भारत में सशस्त्र बलों दव्ारा किए गए मानवाधिकार उल्लंघन के मामले हमेशा ही विवाद के विषय बने रहे हैं। इन मामलों में आयोग की भूमिका व शक्तियाँ भी सीमित होती हैं। जेलों में बंद कैदियों के बारे में अक्सर सुनने में आता रहा है कि उनके मामलों की सुनवाई किए बिना लंबे समय तक उन्हें जेलों में बद रखा गया। भारत में मानवाधिकारों की मुख्य धारा से आज भी किन्नरों, समलैंगिकों या कुछ जनजातीय समुदायों को नहीं जोड़ा जा सका है। भ्रूण हत्या, बालिका हत्या, बाल श्रम, जातीय भेदभाव को कैसे मानवाधिकार हनन से जोड़ा जाए, यह प्रश्न भारत के समक्ष खड़ा है। राज्य स्तर पर मानवाधिकार से संबंधित अनेक विवाद देखने को मिलते रहे हैं। भारत में माओवादी एक शक्तिशाली संगठन के तौर पर उभरे है। राज्य स्तर पर मानवाधिकार से संबंधित ज्यादातर विवाद माओवादी संगठनों से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर जुड़ाव से संबंधित हैं। विनायक सेन, सोनी सोढ़ी (छत्तीसगढ़) मामले पुलिस उत्पीड़न की कहानी कहते हैं, वहीं उत्तर-पूर्वी भारत तथा जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकार हनन के मामले सेना को अत्यधिक विशेषाधिकार प्रदान करने से संबंधित है। इसके अलावा ऐसे कई मामले राज्य स्तर पर देखने को मिलते हैं, जिनमें मानवाधिकार उल्लंघन के मामले होते हैं लेकिन वे ज्यादा चर्चित नहीं हो पाते हैं।
  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अनुसार मानवाधिकार उल्लंघन के सबसे ज्यादा मामले उत्तर प्रदेश, हरियाणा एवं दिल्ली में दर्ज होते हैं। राज्य सरकारें मानवाधिकारों को लेकर कितना चिंचित हैं, वह इस बात से पता चलता है कि इन तीन राज्यों में दो हरियाणा एवं दिल्ली में राज्य मानवाधिकार आयोग का गठन अभी तक नहीं किया जा सकता है जबकि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग दव्ारा राज्यों से इसके गठन हेतु लगातार आग्रह किया जाता रहा है। जिन राज्यों में राज्य मानवाधिकार आयोग का गठन किया गया है उनमें 10 राज्यों राजस्थान, जम्मू-कश्मीर, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, मणिपुर, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक के राज्य मानवाधिकार आयोग बिना स्थायी अध्यक्ष के कार्य कर रहे हैं। अन्य राज्यों में भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है और कहीं-कहीं कुछ ही सदस्यों से काम चलाया जा रहा है। इन सब बातों से यह स्पष्ट हो जाता है कि मानवाधिकार संरक्षण के मामले में राजनीतिक इच्छाशक्ति की जबरदस्त कमी है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के वार्षिक रिपोर्टों में-

  • 35 प्रतिशत शिकायत पुलिस के विरुद्ध होती है।
  • 2010 - 11 की रिपोर्ट के अनुसार 9 प्रतिशत शिकायतें अधिकारियों की शिथिलता या पद के दुरुपयोग से जुड़ी हुई थीं।
  • कैदियों को न्याय दिलवाना एक बड़ी समस्या है। लगभग सभी जेलों में कैदियों की अत्यधिक संख्या है जिनमें से 67 प्रतिशत कैदियों के मामलें की सुनवाई नहीं हो पाई है।

राष्ट्रपति दव्ारा मानवाधिकार संरक्षण संबंधी अध्यादेश 28 सिंतबर 1993 को जारी किया गया। तत्पश्चात्‌ मानवाधिकार विधेयक 1993 संसद के दोनों सदनों दव्ारा स्वीकृत कर लेने के पश्चात्‌ 8 जनवरी 1994 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिल गई। यह अधिनियम 28 सितंबर 1993 से पूर्ण प्रभावी हुआ।

भारत के संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों का मत (International Human Rights Organization՚S View Regarding India)

  • अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने अपने 2012 के रिपोर्ट में भारत पर यह आरोप लगाया है कि इसने देश के अंदर या बाहर मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों को रोकने के लिए प्रत्यक्ष प्रयास नहीं किये हैं। भारत के बारे में कहा गया है कि अवसरवादी गठबंधन से मिलीभगत कर भारत मानवाधिकार हनन के मामलों को नजरअंदाज कर रहा है। भारत के बारे में कहा गया है कि वह देश के अंदर एवं बाहर मानवाधिकारों के संरक्षण एवं प्रोनन्यन की कीमत पर आर्थिक विकास कर रहा है। भारत के बढ़ते अंतरराष्ट्रीय महत्व के बावजूद वह मानवाधिकार से जुड़े मामलों पर कार्यवाही करने को अनिच्छुक है। भारत मध्य पूर्व, उत्तरी अफ्रीका, म्यांमार तथा श्रीलंका में मानवाधिकार हनन के मामलों में चुप रहा है। रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को सरकारी एजेन्सियों के साथ-साथ गैर-सरकारी एजेन्सियों का भी कोपभाजन बनना पड़ता है और उन पर देशद्रोह के साथ-साथ राजनीति से प्रेरित अन्य गंभीर आरोप लगाए जाते हैं। भारत में मानवाधिकार संरक्षण से जुड़ा संस्थागत तंत्र (Institutional Mechanism) अभी भी कमजोर है तथा मानवाधिकार हनन के मामलों में न्यायालयीय प्रक्रिया धीमी है। अधिकारहीन स्थानीय समुदायों जैसे आदिवासियों, दलितों एवं किसानों के विरोध को दबाने के लिए भारतीय सुरक्षा बल अत्यधिक बल प्रयोग करते हैं।
  • आदिवासियों एवं अन्य अधिकारहीन समुदायों के अधिकारों की रक्षा करने वाले एवं उनके अधिकारों की रक्षा करने से संबंधित सूचना प्राप्त करने वाले सरकारी एवं गैर सरकारी एजेन्सियों दव्ारा लक्षित किया जाता है या उन्हें हानि पहुंँचाया जाता है। वैश्विक स्तर पर भी विरोध प्रदर्शनों से निपटने के मामले में राजनीतिक नेतृत्व असफल रहा है और ज्यादातर मामलों में उसने बर्बरता एवं बेरूखी से काम लिया है। अधिकारहीन समुदायों की सुरक्षा में किए जाने वाले अन्याय का प्रतिकार करने की बात कही गई है एवं शक्तिशाली लोगों पर लगाम लगाने की बात कही गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अब समय आ गया है कि ‘निगमों से पहले लोगों को’ रखा जाए तथा ‘लाभ के पहले अधिकारों को’ रखा जाए।
  • इसके अतिरिक्त सिंतबर 2012 में एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भारत से यंत्रणा के खिलाफ संविदा (Convention against Torture) को शीघ्रातिशीघ्र अभिपुष्ट करने का आग्रह किया है। संगठन ने देश के कई भागों में सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम के लागू रहने पर चिंता व्यक्त की है। यह अधिनियम कुछ विशेष परिस्थितियों में गोली मारने का अधिकार भी (Shoot to Kill) प्रदान करता है। इस अधिनियम के लागू रहने वाले क्षेत्रों में सशस्त्र बलों दव्ारा दुष्कर्म एवं हत्या जैसे मानवाधिकार हनन के मामलों के प्रति चिंता जाहिर की गई है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इस अधिनियम को रद्द करने की अपील की है।
  • मानवाधिकार से जुड़ी एक दूसरी संस्था ह्यूमन राइटस वाच (Human Rights Watch) ने दृढ़़तापूर्वक कहा है कि भारत को अभी भी मानवाधिकार संरक्षण से जुड़े कानून बनाने हैं तथा वर्तमान नीतियों का प्रभावी क्रियान्वयन करना है ताकि अधिकारहीन समुदायों (Marginalised Communities) जैसे दलितों, जनजातीय समुदाय, धार्मिक अल्पसंख्यकों, महिलाओं एवं बच्चों के मानवाधिकारों का संरक्षण हो सके। इसका यह भी मानना है कि राज्य को मानवाधिकार हनन के मामलों, विशेषकर महिलाओं के विरुद्ध होने वाले सभी प्रकार के लैंगिक हमले, सांप्रदायिक हिंसा वाले इलाकों से बलपूर्वक गायब करने (Enforced disappearances in Confict Zones) , न्यायेत्तर हत्या (Extra Judicial Killings) उत्पीड़न का लगातार जारी रहना, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर बढ़ते हमले को रोकने के लिए तत्काल उपाय करने चाहिए।

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