आचार संहिता (Code of Ethics – Part 10)

Click here to read Current Affairs & GS.

ये केवल ‘न्यायिक जीवन के मूल्यों के पुनर्कथन’ हैं और अपने आप में परिपूर्ण नहीं है परन्तु दृष्टांत स्वरूप हैं, जो किसी न्यायाधीश से अपेक्षित हैं।

निम्नलिखित दो संकल्पों को भी भारत के उच्चतम न्यायालय की उपर्युक्त संपूर्ण न्यायालय बैठक में पारित किया गया था।

′ यह संकल्प लिया गया कि भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश दव्ारा उन न्यायाधीशों के विरूद्ध समुचित उपचारी कार्रवाई करने के लिए एक इन-हाउस प्रणाली को तैयार किया जाएगा, जो अपने कृताकृत दव्ारा न्यायिक जीवन के सर्वसम्मति से स्वीकृत मूल्यों का पालन नहीं करते, जिनमें ′ न्यायिक जीवन के मूल्यों के पुनर्कथन ′ में उल्लिखित मूल्य भी शामिल है।

′ यह भी संकल्प लिया गया कि प्रत्येक न्यायाधीश अपना पद संभालने के उचित समय के भीतर और पीठासीन न्यायाधीशों के मामले में इस संकल्प के पारित होने के युक्तियुक्त समय के भीतर और उसके पश्चात जब कभी बड़ी मात्रा में अधिग्रहण किया जाता है तो उसे युक्तियुक्त समय के भीतर, अपनी जमीन जायदाद या निवेश के रूप में सभी संपत्तियों (उसके अपने नाम में या उसकी पत्नी/पति के नाम में अथवा उस पर आश्रित किसी व्यक्ति के नाम में) की घोषणा करेगा।

इस प्रकार की गई घोषणा न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को दी जाएगी। मुख्य न्यायाधीश रिकॉर्ड (प्रमाण) के उद्देश्य से इसी प्रकार की घोषणा करेगा। यथास्थिति न्यायाधीशों या मुख्य न्यायाधीश दव्ारा की गई घोषणा को गोपनीय रखा जाएगा। ′

दव्तीय प्रशासनिक सुधार आयोग का मत था कि न्यायिक जीवन के पुनर्कथन मूल्य बृहत रूप है और इसे पूर्ण नैतिक संहिता नहीं कहा जा सकता। आचार संहिता के निर्धारण मात्र से इसका अपने आप में अंत नहीं हो जाता। आचार संहिता के साथ, संहिता के प्रवर्तन के लिए एक प्रणाली को आरंभ करने की आवश्यकता है। उच्चतम न्यायालय के किसी वरिष्ठ न्यायाधीश को ‘न्यायिक मूल्य आयुक्त’ के रूप में पदाभिहित करना अपेक्षित होगा।

न्यायिक मूल्य आयुक्त को आचार संहिता के अतिक्रमण के मामलों की जांच करके मामले की रिपोर्ट (विवरण) को भारत के मुख्य न्यायाधीश के पास कार्रवाई के लिए भेजने के लिए सशक्त किया जाना चाहिए। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश और अन्य न्यायिक और न्यायिककल्प निकायों के सदस्य, न्यायिक मूल्य आयुक्त के अधिकार क्षेत्र में आने चाहिए। राज्य के स्तर पर भी इसी प्रकार के संस्थान का गठन किया जाना चाहिए। न्यायिक जवाबदेही का मुद्दा भी इसके साथ जुड़ा हुआ है। न्यायिक जवाबदेही के प्रवर्तन के लिए प्रभावी व्यवस्था की आवश्यकता पर अति-दबाव नहीं डाला जा सकता।

शासन में ईमानदारी

न्यायिक स्वतंत्रता और जवाबदेही दोनों को एक साथ चलना चाहिए। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 235 में उच्च न्यायालय के अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण के लिए उपबंध है जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि न्यायिक जवाबदेही के प्रवर्तन के लिए प्रभावशाली व्यवस्था का प्रबंध करना हमारे संवैधानिक दर्शन-शास्त्र का एक हिस्सा है। लेकिन यह व्यवस्था उस स्तर तक न्यायपालिका की स्वतंत्रता के साथ किसी भी प्रकार से समझौता नहीं करती। वास्तव में, संविधान के अनुच्छेद 50 में स्थापित न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग रखने के निदेशक सिद्धांत का यह सम्मान करती है और उसे सुदृढ़ करती है। इसमें संदेह नहीं है कि किसी अधीनस्थ न्यायाधीश की स्वतंत्रता उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी कि किसी उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय की। यदि इस बात को स्वीकृत कर लिया जाए तो कोई कारण नहीं रह जाएगा कि उच्चतर न्यायपालिका के लिए जवाबदेह की व्यवस्था पर विचार न किया जा सके।

Developed by: