महान सुधारक (Great Reformers – Part 11)

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फिदेल ऐलेजैंड्रो कास्त्रों रूज या फिदेल कास्त्रो:-

क्यूबा के राजनीतिज्ञ और क्यूबा की क्रांति के प्राथमिक नेताओं में से एक फिदेल कास्त्रों का जन्म 13 अगस्त, 1926 को एक अमीर परिवार में हुआ था। हवाना विश्वविद्यालय में अध्ययन करते हुए उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की और जल्द ही एक मान्यता प्राप्त व्यक्ति बन गए। साम्यवादी झुकाव वाले कास्त्रो ने एक क्रांति के जरिये क्यूबा में तत्कालीन अमेरिकी समर्थित फुलोकियो वतिस्ता की तानाशाह सरकार को उखाड़ फेंका और सत्ता में आ गये।

लेकिन यह काम इतना आसान नहीं था। क्यूबा में तख्तापलट और क्रांति लाने के उद्देश्य से कास्त्रों ने कानून की प्रैक्टिस (अभ्यास) छोड़ दी और अपने भाई राउल और मारियों चांस डे आर्म्स समेत समर्थकों को लेकर एक भूमिगत संगठन का गठन किया। शुरुआती झड़पों के बाद और अंतिम रूप से 8 जनवरी, 1959 को कास्त्रों की थलसेना हवाना में विजयी भाव के साथ दाखिल हुई। इसी के साथ बतिस्ता सरकार का पतन हो गया। नई सरकार ने अवैध रूप से अर्जित संपित्त जब्त करने सहित अन्य कल्याणकारी कार्य व्यापक पैमाने पर शुरू कर दिये। 17 मई, 1959 को कास्त्रो ने देश के पहले कृषि सुधार कानून पर हस्ताक्षर किये, जिससे मालिकाना हक 993 एकड़ तक सीमित किया गया और विदेशी भूमि को स्वामित्व निषेध किया गया। मई, 1961 को कास्त्रों ने क्यूबा को समाजवादी राज्य घोषित किया और सरकारी तौर पर बहुदलीय चुनाव समाप्त कर दिया।

1962 में क्यूबा और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ गया, जिससे अमेरिका और सोवियत संघ परमाणु संघर्ष के करीब आ गए। इसे मिसाइल (प्रक्षेपास्त्र) संकट का नाम दिया गया। इसके बाद क्यूबा की सोवियत संघ पर निर्भरता का स्तर बढ़ गया। कास्त्रों ने सरकार, मीडिया (संचार माध्यम) और शिक्षा प्रणाली सभी स्तर पर कम्युनिस्ट पार्टी (साम्यवादी दल) के नियंत्रण को और मजबूत करना शुरू कर दिया। सोवियत संघ के पतन के साथ ही सोवियत गणतंत्र और क्यूबा के संबंधों का महान अध्याय भी समाप्त हो गया। प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच भी क्यूबा ने फिदेल कास्त्रो के नेतृत्व पर हमेशा अगाध आस्था जाहिर की है। उनकी आलोचना में कहा जाता है कि कास्त्रों तानाशाह हैं, लेकिन उनकी अपार लोकप्रियता इस आरोप को खारिज करती हैं।

अर्नेस्टो चे ग्वेयरा:-

क्यूबा में क्रांति करने वाले फिदेल कास्त्रों के अन्य सहयोगी अर्नेस्टो चे ग्वेयरा एक करिश्माई व्यक्तित्व एक किवंदन्ती एक जुनूनी क्रांतिकारी थे। अपने अदम्य साहस, निरन्तर संघर्षशीलता, अटूट इरादों व पूंजीवाद विरोधी मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा के कारण ही चे ग्वेयरा आज पूरी दुनिया में युवाओं के महानायक हैं। यह चे का जुनून ही था जिसने 1959 में क्यूबा में क्रांत के बाद भी उन्हें चैन से बैठने नहीं दिया और क्यूबा की राजसत्ता को त्यागकर 1965 में वे पूरी दुनिया की यात्रा पर निकल पड़े व अफ्रीका और बोलिदिया में क्रांति की कोशिश की।

चे गवेयरा का जन्म 14 जून, 1928 को अर्जेन्टीना के रोसारियो शहर में हुआ था। स्पेनिश-आयरिश वंश में जन्मे चे ग्वेयरा का पालन-पोषण सामंती परिवेश में हुआ। चिली के सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी कम्युनिस्ट (साम्यवादी) कवि पाब्लो नेरूदा से बेहद प्रभावित चे ने 19 वर्ष की आयु में न्यूनतम आयर्स विश्वविद्यालय के मेडिकल (चिकित्सा) कॉलेज (महाविद्यालय) में दाखिला लिया परन्तु मेडिकल शिक्षा के अंतिम वर्ष में वे कृष्ठ रोगियों के इलाज के लिए काम करने वाले एक दोस्त की मोटर साइकिल लेकर लैटिन अमेरिका की यात्रा पर निकल पड़े। यह यात्रा उनके जीवन के बदलाव की यात्रा सिद्ध हुई। यात्रा के दौरान जिस गरीबी व भुखमरी से उनका साक्षात्कार हुआ उसने उन्हें बदल कर रख दिया।

मेडिकल (चिकित्सा) शिक्षा के बाद ग्वाटेपाला में काम करते हुए उन्होंने अरबेंज के समाजवादी शासन के खिलाफ सीआईए की साजिशों को देखा जिसने उनके दिल में अमेरिकी साम्राज्यवाद के लिए नफरत भर डाली। ग्वाटेमाला में उनकी मुलाकात वामपंथी अर्थशास्त्री हिल्डा गादिया अकोस्टा से हुई अमेरिकन पॉपुलर (लोकप्रिय) रिवोल्यूशनरी (क्रांतिकारी) एलायंस की सदस्य थीं। हिल्डा ने उनकी मुलाकात जनवादी ढंग से निर्वाचित अरबेन्ज सरकार के कुछ बड़े नेताओं से कराई। वहां जकोबो अरबेन्ज का शासन सीआईए के दव्ारा उखाड़ फेंकने के बाद इन्हें अर्जेन्टीना के दूतावास में शरण लेनी पड़ी और वहां से उन्होंने मेक्सिको की तरफ रुख किया। मेक्सिको में ही उनकी मुलाकात कास्त्रो बन्धुओं से हुई व 1956 में क्यूबा के तानाशाह यहिस्ता के खिलाफ अभियान में चे उनके सहयोगी हो गए।

25 नवंबर, 1956 को चे ग्वेयरा एक चिकित्सक की हैसियत से कास्त्रो भाइयों के साथ पूर्वी क्यूबा में उतरे जहां उतरने के साथ ही बतिस्ता की फौजों ने इस गुरिल्ला सेना पर हमला बोल दिया। इस हमले में उनके 82 साथी लड़ाई में शहीद हुए या उन्हें गिरफ्तार करके मार डाला गया। यही वह समय था जब चे ग्वेयरा ने मेडिकल (चिकित्सा) बॉक्स (डिब्बा) छोड़कर हथियार उठाए, बाद में उन्होंने गुरिल्ला कमांडर (सेनाध्यक्ष) के तौर सीयेरा माऐस्त्रा की पहाड़ियों में रहकर गुरिल्ला सेना का नेतृत्व किया। इसी गुरिल्ला फौज ने 31 दिसंबर, 1958 को क्यूबा के बतिस्ता शासन को तोड़ दिया। जनवरी, 1959 में हवाना में दाखिल होने वाले व हवाना पर नियंत्रण बनाने वाले चे ग्वेयरा पहले गुरिल्ला कमांडर थे। इस क्रांति के थोड़े समय के बाद ही चे अलेदिया मार्क के साथ शादी करके हनीमून पर चले गए।

चे क्यूबा मेे फिदेल के सबसे विश्वसनीय व फिदेल के बाद सबसे ताकतवर नेता थे। सेना के कमांडर, राष्ट्रीय बैंक के अध्यक्ष व उद्योग मंत्रालय जैसी अहम्‌ जिम्मेदारियां उनके पास थीं, फिर भी दुनिया बदलने की उनकी योजनाएं उन्हें चैन से सोने नहीं देती थीं। क्यूबा के प्रति अमेरिकी नीतियों की आलोचना करते हुए उन्होंने सोवियत संघ से मदद लेने के लिए अनेक कम्युनिस्ट (साम्यवादी) देशों का दौरा किया। उन्होंने देश में तेज औद्योगीकरण का कार्यक्रम लागू किया। 1964 में संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा को संबोधित करने के बाद वे अपनी क्रांति के मिशन (लक्ष्य) पर निकल पड़े। 1965 में उन्होंने अफ्रीका के देश कांगो में अपनी योजनाओं को अंजाम देने की ठानी।

कांगो से लौटकर फिर उन्होंने क्यूबा में कुछ सैनिक अधिकारियों को लेकर एक टुकड़ी बनायी व अपना अगला मिशन (लक्ष्य) बोलिविया निर्धारित किया। बोलिविया अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण एक महत्वपूर्ण स्थान था। चे ग्वेयरा का इरादा अमेरिकी साम्राज्यवाद की रणनीति को लैटिन अमेरिका में रोकने के लिए बोलिविया को वहां के कम्युनिस्टों के साथ मिलकर गुरिल्ला कार्रवाइयों के लिए एक प्रशिक्षण केन्द्र के रूप में विकसित करने की थी। संभवत: 1966 के अंत या 1967 के आंरभिक दिनों में उन्होंने बोलिविया में अपने मिशन (लक्ष्य) की शुरुआत की, लेकिन बोलिवियाई सेना ने चे ग्वेयरा को उनकी गुरिल्ला टुकड़ी के साथ 7 अक्टूबर को घेर लिया जहां से उन्हें बांधकर लाया गया और 9 अक्टूबर, 1967 को उनकी हत्या कर दी गई।

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