महान सुधारक (Great Reformers – Part 2)

Get unlimited access to the best preparation resource for IAS : Get detailed illustrated notes covering entire syllabus: point-by-point for high retention.

Download PDF of This Page (Size: 185K)

बाल गंगाधर तिलक:-

बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई, 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरि इलाके में हुआ था। आधुनिक ढंग से शिक्षा दीक्षा प्राप्त करने वाले तिलक ने स्नातक के बाद वकालत की पढ़ाई पूरी की। पश्चिमी शिक्षा पद्धति से असहमत तिलक के युवाओं को राष्ट्रीय शिक्षा प्रदान करने के लिए अपने साथियों विष्णु शास्त्री चिपलुनकर और आगरकर के साथ मिलकर ’न्यू इंग्लिश स्कूल’ (नया अंग्रेजी विद्यालय) की स्थापना की, जो आज ’दक्कन एजुकेशन (शिक्षा) सोसायटी’ (समाज) में तब्दील हो चुका है। लोगों में जागरूकता लाने के लिए तिलक ने दो साप्ताहिक पत्रों की शुरूआत की। इनमें से एक ’केसरी’ मराठी में, जबकि ’मराठा’ अंग्रेजी में प्रकाशित होता था। इन दोनों पन्नों के संपादकीय पूरी तरह से तिलक के विचारों पर आधारित होते थे। अपने लेखों में तिलक ने तत्कालीन भारत की सच्ची तस्वीर पेश करते हुए ब्रिटिश शासन की घोर निंदा की। अगले दो वर्षों में ही ’केसरी’ देश का सबसे ज्यादा बिकने वाला भाषाई समाचार पत्र बन गया।

सन्‌ 1897 में मुंबई से पूना तक प्लेग का भंयकर आक्रमण हुआ। प्लेग से निपटने से सरकारी तौर-तरीको से दुखी और नारज तिलक ने अपने स्तर पर पीड़ितों की चिकित्सा की व्यवस्था की। सरकार ने तिलक पर लोगों को हत्या के लिए भड़काने का आरोप लगाया और उन्हें 18 महीने की कैद की सजा सुनाई। नाराज अंग्रेजो ने तिलक की भारतीय अशांति का दूत घोषित कर दिया। इस बीच तिलक ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्यता ले ली, लेकिन स्वराज्य की मांग को लेकर कांग्रेस के उदारवादियों का रुख उन्हें पसंद नहीं आया और सन्‌ 1907 के कांग्रेस के सूरत अधिवेशन के दौरान कांग्रेस गरम दल और नरम दल में बँट गई। सन्‌ 1908 में सरकार ने उन पर राजद्रोह का आरोप लगाकर मुकदमा चलाया। तिलक का मुकदमा मुहम्मद अली जिन्नहा ने लड़ा, परन्तु तिलक को 6 वर्ष की कैद की सजा सुना दी गई। तिलक को सजा काटने के लिए मांडले (वर्मा) भेज दिया गया। सन्‌ 1916 में रिहाई के बाद तिलक ने पुन: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में प्रवेश किया। सन्‌ 1916 से 1918 के दौरान उन्होंने एनी बेंसट के साथ मिलकर ’अखिल भारतीय होम रूल लोग’ की स्थापना भी की।

तिलक ने बहुत पहले ही राष्ट्रीय एकता के महत्व को समझ लिया था। उन्होंने गणेश उत्सव, शिवाजी उत्सव आदि को व्यापक रूप से मनाना प्रारंभ किया। उनका मानना था कि इस तरह के सार्वजनिक मेल-मिलाप के कार्यक्रम लोगों में सामूहिकता की भावना का विकास करते है। वे अपने इस उद्देश्य में काफी हद तक सफल भी हुए। तिलक ने शराबंदी के विचार का पुरजोर समर्थन किया। वे पहले कांग्रेसी नेता थे, जिन्होनें हिन्दी को राष्ट्रभाषा स्वीकार करने की माग की थी।

तिलक ने भारतीय दर्शन और संस्कृति पर अनेक रचनाएं की। मांडले जेल में रचित अपनी पुस्तक ’गीता रहस्य’ में उन्होंने श्रीमदभगवद्गीता के कर्मयोग की वृहद व्याख्या की। इसके अतिरिक्त उन्होंने आर्कटिक होम (घर) इन (में) द (यह) वेदास, द हिन्दू फिलॉसोफी (दर्शनशास्त्र) ऑफ (के) लाइफ (जीवन), इथिक्स (आचार विचार) एंड (और) रिलिजन (धर्म), वैदिक क्रोनोलॉजी (कालक्रम) एंड (और) वेदांग ज्योतिष, आदि पुस्तकों की रचना की। अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत उग्र विचारधारा के साथ करने वाले बाल गंगाधर तिलक अपने अंतिम समय में बातचीत के पक्षधर हो गए थे। अगस्त, 1920 को इस जननायक ने मुंबई में अपनी अंतिम सांस ली। तिलक की मृत्यु पर महात्मा गांधी ने कहा ’हमने आधुनिक भारत का निर्माता खो दिया है।’

सरदार वल्लभ भाई पटेल:-

सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर, 1875 को नडियाद (गुजरात) में हुआ था। 16 वर्ष की आयु में उनका विवाह हो गया तथा 22 साल की उम्र में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की। वे जिला अधिवक्ता की परीक्षा में उत्तीर्ण हुए जिससे उन्हें वकालत करने की अनुमति मिली। सन्‌ 1900 में उन्होंने गोधरा में स्वतंत्र जिला अधिवक्ता कार्यालय की स्थापना की और दो साल बाद खेड़ा जिले के बोरसद नामक स्थान पर चले गए।

वकील के रूप में पटेल ने कमजोर मुकदमे को सटीकता से प्रस्तुत करके और पुलिस के गवाहों तथा अंग्रेज न्यायाधीशों को चुनौती देकर विशेष स्थान अर्जित किया। 1908 में पटेल की पत्नी की मृत्यु हो गई। उस समय उनके एक पुत्र और एक पुत्री थी। इसके बाद उन्होंने विधुर जीवन व्यतीत किया। वकालत के पेशें में तरक्की करने के लिए कृतसंकल्प पटेल ने मिडल टैबल (मध्य तालिका) का अध्यक्ष बनने के लिए अगस्त, 1910 में लंदन की यात्रा की। वहां उन्होंने मनोयोग से अध्ययन किया और अंतिम परीक्षा में उच्च प्रतिष्ठा के साथ उत्तीर्ण हुए। फरवरी, 1913 में भारत लौटकर वह अहमदाबाद में बस गए और तेजी से उन्नति करते हुए अहमदाबाद अधिवक्ता पार में अपराध कानून के अग्रणी बेरिस्टर (बड़ा वकील) बन गए। गंभीर और शालीन पटेल अपने उच्चस्तरीय तौर-तरीकों और चुस्त अंग्रेजी पहनावे के लिए जाने जाते थे। वह अहमदाबाद के फैशनपरस्त गुजरात क्लब में ब्रिज के चैंपियन (विजेता) होने के कारण भी विख्यात थे। 1917 तक वह भारत की राजनीतिक गतिविधियों के प्रति उदासीन रहे।

1917 में मोहनदास करमचन्द्र गांधी से प्रभावित होने के बाद पटेल ने पाया कि उनके जीवन की दिशा बदल गई है। पटेल गांधी के सत्याग्रह के साथ तब तक जुड़े रहे, जब तक वह अंग्रेजाेे के खिलाफ भारतीयों के संघर्ष में कारगर रहा। उन्होंने कभी भी खुद को गांधी के नैतिक विश्वासों व आदर्शो के साथ नहीं जोड़ा और उनका मानना था कि उन्हें सार्वभौमिक रूप से लागू करने का गांधी का आग्रह भारत के तत्कालीन राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक परिप्रेक्ष्य में अप्रासंगिक है। फिर भी गांधी के अनुसरण और समर्थन का संकल्प करने के बाद पटेल ने अपनी शैली और वेशभूषा में परिवर्तन कर लिया। उन्होंने गुजरात क्लब (मंडल) छोड़ दिया, भारतीय किसानों के समान सफेद वस्त्र पहनने लगे और भारतीय खान-पान को अपना लिया।

1917 से 1924 तक पटेल ने अहमदनगर के पहले भारतीय निगम आयुक्त के रूप में सेवा प्रदान की और 1924 से 1928 तक वह इसके निर्वाचित नगरपालिका अध्यक्ष रहे। 1918 में पटेल ने अपनी पहली छाप छोड़ी। जब भारी वर्षा से फसल तबाह होने के बावजूद बम्बई सरकार दव्ारा पूरा सालाना लगान वसूलने के फैसले के विरुद्ध उन्होंने गुजरात के कैरा जिलें में किसानों और काश्तकारों के जनांदोलन की रूपरेखा बनाई। 1928 में पटेल ने बढ़े हुए करो के खिलाफ बारदोली के भूमिपतियों के संघर्ष का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया। बारदोली आंदोलन के कुशल नेतृत्व के कारण उन्हें ’सरदार’ की उपाधि मिली और उसके बाद देश भर में राष्ट्रवादी नेता के रूप में उनकी पहचान बन गई। उन्हें व्यावहारिक निर्णायक और यहां तक कि कठोर भी माना जाता था तभी अंग्रेज उन्हें एक खतरनाक शत्रु मानते थे।

1928 से 1931 के बीच इंडियन (भारतीय) नेशनल (राष्ट्रीय) कांग्रेस के उद्देश्यों पर हो रही महत्वपूर्ण बहस में पटेल का विचार (गांधी और मोतीलाल नेहरू के समान, लेकिन जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचन्द्र बोस के विपरीत) था कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का लक्ष्य स्वाधीनता नहीं, बल्कि ब्रिटिश राज के भीतर अधिराज्य का दर्जा प्राप्त करने का होना चाहिए। पटेल नैतिक नहीं, व्यावहारिक आधार पर सशस्त्र आंदोलन को नकारते थे और उनका मानना था कि यह विफल रहेगा और इसका जबरदस्त दमन होगा।

बलपूर्वक आर्थिक और सामाजिक बदलाव लाने की आवश्यकता के बारे में पटेल जवाहरलाल नेहरू से असहमत थे। पारम्परिक हिन्दू मूल्यों से उपजे, रूढ़िवादी पटेल भारत की सामाजिक और आर्थिक संरचना में समाजवादी विचारों को अपनाने पर विश्वास नहीं करते थे। वह मुक्त उद्यम में यकीन रखते थे। 1930 में नमक सत्याग्रह के दोरान पटेल को तीन महीने की जेल की सजा हुई। मार्च, 1931 में पटेल ने इंडियन (भारतीय) नेशनल (राष्ट्रीय) कांग्रेस के करौची अधिवेशन की अध्यक्षता की। 1937 के चुनावों में उन्होंने कांग्रेस पार्टी के संगठन को व्यवस्थित किया। अक्टूबर, 1940 में कांग्रेस के अन्य नेताओं के साथ पटेल भी गिरफ्तार हुए और अगस्त, 1941 में रिहा हुए। दव्तीय विश्व युद्ध के दौरान जब जापानी हमले की आशंका हुई, तो पटेल ने गांधी की अहिंसा की नीति को अव्यावहारिक बताकर खारिज कर दिया। सत्ता के हस्तांतरण के मुद्दे पर भी पटेल का गांधी को इस बात पर मतभेद था कि उपहादव्ीप का हिन्दु भारत तथा मुस्लिम पाकिस्तान के रूप में उप-प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, सूचना मंत्री और राज्य मंत्री रहे।

उनकी ख्याति भारत के रजवाड़ों को शांतिपूर्ण तरीके से भारतीय संघ में शामिल करने तथा भारत के राजनीतिक एकीकरण के कारण है। गृहमंत्री बनने के बाद भारतीय रियासतों के विलय की जिम्मेदारी उनको ही सौंपी गई। उन्होंने अपने दायित्वों का निर्वहन करते हुए छह सौ बड़ी रियासतों का भारत में विलय कराया। देशी रियासतों का विलय स्वतंत्र भारत की पहली उपलब्धि थी। 5 जुलाई, 1947 को सरदार पटेल ने रियासतों के प्रति नीति को स्पष्ट करते हुए कहा कि ’रियासतों को तीन विषयों सुरक्षा, विदेश तथा संचार व्यवस्था के आधार पर भारतीय संघ में शामिल किया जाएगा।’ पटेल ने भारतीय संघ में उन रियासतों का विलय किया था जो स्वयं में संप्रभुता प्राप्त थी। उनका अलग झंडा और अलग शासक था। सरदार पटेल ने आजादी के ठीक पूर्व (संक्रमण काल में) ही वी. पी. मेनन के साथ मिलकर कई देसी राज्यों को भारत में मिलाने के लिये कार्य आरंभ कर दिया था। पटेल और मेनन ने देसी राजाओं को बहुत समझाया कि उन्हें स्वतंत्रता देना संभव नहीं होगा। इसके परिणामस्वरूप तीन को छोड़कर शेष सभी रजवाड़ों ने स्वेच्छा से भारत में विलय का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। 15 अगस्त, 1947 तक हैदराबाद, कश्मीर और जूनागढ़ को छोड़कर शेष भारतीय रियासते ’भारत संघ’ में सम्मिलित हो गयीं। जूनागढ़ के नवाब के विरुद्ध जब बहुत विरोध हुआ तो वह भागकर पाकिस्तान चला गया और जूनागढ़ भी भारत में मिल गया। जब हैदराबाद के निजाम ने भारत में विलय का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया तो सरदार पटेल ने वहां सेना भेजकर निजाम को आत्मसमर्पण करने के लिए विवश किया।

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की वैचारिक एवं क्रियात्मक रूप में एक नई दिशा देने के कारण पटेल ने राजनीतिक इतिहास में एक गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त किया। वास्तव में वे आधुनिक भारत के शिल्पी थे। उनके कठोर व्यक्तित्व ने बिस्मार्क जैसी संगठनकुशलता, कौटिल्य जैसी राजनीति सूझबूझ तथा राष्ट्रीय एकता के प्रति अब्राहम लिंकन जैसी अटूट निष्ठा थी। जिस अदम्य साहस और असीम शक्ति से उन्होंने नवजात गणराज्य की प्रारंभिक कठिनाइयों का समाधान किया, उसके कारण विश्व के राजनीतिक मानचित्र में उन्होंने अमिट स्थान बना लिया। भारत के राजनीतिक इतिहास में सरदार पटेल के योगदान को कभी नहीं भूला सके।

सरदार पटेल के ऐतिहासिक कार्यो में सोमनाथ मंदिर का पुननिर्माण, गांधी स्मारक निधि की स्थापना, कमला नेहरू अस्पताल की रूपरेखा आदि कार्य संदर्भ स्मरण किए जाते रहेंगे। लक्षदव्ीप समूह को भारत के साथ मिलाने में भी पटेल की महत्वपूर्ण भूमिका थी। नीतिगत दृढ़ता के लिए उन्हें ’सरदार’ और लौह पुरुष’ जैसी उपाधि प्रदान की गई। बिस्मार्क ने जिस तरह जर्मनी के एकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उसी तरह बल्लभ भाई पटेल ने भी आजाद भारत को एक विशाल राष्ट्र बनाने में उल्लेखनीय योगदान दिया, बिस्मार्क को जहां जर्मनी का ’आयरन (लोहा/सख्त) चांसलर (कुलाधिपति)’ कहा जाता है, वहीं पटेल भारत के लौह पुरुष कहलाते है। सन्‌ 1991 में मरणोपरान्त भारत रत्न से सम्मानित पटेल की याद में अहमदाबाद के हवाई अड्‌डे का नामकरण सरदार वल्लभभाई पटेल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्‌डा किया गया है। गुजरात के वल्लभ विद्यानगर में सरदार पटेल विश्वविद्यालय है। सरदार पटेल जी का निधन 15 दिसंबर 1950 को मुंबई (महाराष्ट्र) में हुआ।

Developed by: