इंडियन (भारतीय) वेर्स्टन (पश्चिमी) फिलोसोपी (दर्शन) (Indian Western Philosophy) Part 5 for IAS

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ऐपीक्यूरियन वाद -ग्रीक दर्शन के अंतिम दौर में सुखवाद का एक नया रूप उभरा जिसे उसके प्रवर्तक ऐपिक्यूटस के नाम के आधार पर ऐपीक्यूरियन वाद कहा जाता है। वर्तमान में ऐपीक्यूरियन होने का अर्थ ऐसे व्यक्ति से लिया जाता है जो शराब, नारी और संगीत में डूबा रहता है, किन्तु वास्तविकता यह है कि ऐपिक्यूटस वाद अरिस्टीटस के निकष्ठ सुखवाद का विरोध करता है और उत्कृष्ट सुखवाद पर बल देता है।

महत्वपूर्ण विचार-

  • मनोवैज्ञानिक सुखवाद और नैतिक सुखवाद का समर्थन, सुख ही एकमात्र स्वत: साध्य शुभ है। शेष सभी सुख सामान्य हैं।

  • सुखवादों होने पर भी ऐपिक्यूटस वाद अरिस्टीटस के नित्कृष्ठ सुखवाद का विरोध करता है उसका दावा है कि ऐच्छिक सुख आवश्यक तो है लेकिन लगातार उनके पीछे दोड़ने से मानसिक अशांति पैदा होती है।

  • व्यक्ति को जिस वास्तविक सुख की खोज करनी चाहिए वह Atarxia (प्रशांतता) वह स्थायी और शांतिपूर्ण अर्जित स्थिति का सुख है, मानसिक सुख, शारीरिक सुख से बेशक कम तीव्र हो किन्तु इनमें स्थायित्व और उच्चता अधिक होती है, साहित्य कला, चितंन और ज्ञान की खोज की प्रकियाओं में यह सुख शामिल होता है। व्यक्ति को चाहिए की वह इस सुख की प्राप्ति के लिए शारीरिक व ऐच्छिक सुखों का त्याग कर दे।

  • मनुष्य की इच्छाये 2 प्रकार की है, एक वे जो स्वाभाविक अनिवार्य है जैसे-भूख, प्यास आदि।और दूसरी वे इच्छायें है जो आवश्यक है जैसे अत्यधिक महत्वाकांक्षा या घर बनाना आदि।अनिवार्य इच्छाओं को पूरा करते हुए व्यक्ति को पूरी कोशिश करनी चाहिए वे कृत्रिम ईच्छाओं से मुक्त हो सके।गौरतलब है कि यही चारो उदाहरण प्लेटो ने भी दिये हो लेकिन प्लेटो का मुख्य बल न्याय पर था वही अरस्तु का विवेक पर जो व्यक्ति विवेक में अधीन संयम साध्य और न्याय को रखते हुये जीवन जीता है वह कल्याण की स्थिति उपलब्ध करता है।

प्रमुख विशेषता-

  • सुखाद का पूर्ण निषेध (अरिस्टीयल तथा ऐपिक्यूटस दोनों में सुखवाद का)।

  • मानव का कल्याण तभी संभव है जब वह अपनी सभी वासनाओं और ईच्छाओं का दमन करके, बुद्धि के आदर्शों के अनुसार सदगुण युक्त जीवन व्यतीत करे, प्लेटो और अरस्तु भी नैतिक पथ के है।

अरस्तु:- प्लेटो का शिष्य था

निको मेक्स अरस्तु का बेटा- इथिक्स की पहली पुस्तक इसी ने लिखी

निकोमेकियन इथिक्स (आचार विचार) पहली पुस्तक है इथिक्स की पूरी पुस्तक निकोमेक्स ने की।

400 पुस्तक लिखी है

अरस्तु ने स्वैच्छिक कार्य यूडेमोरियम इथिक्स ;अचार विचार और शुभ की व्याख्या के बारे में समझाया हे।

शुभ का मतलब-

  • मानसिक सुख- शारीरिक सुख इसका पोस्ट -संतुलन, सदगुणों का विकास

  • शांतिपूर्ण/सामंजस्य

सदवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू गुण का सिद्धांत-अरस्तु ने भी सुकरात और प्लेटो की तरह सदगुणों की चर्चा की है लेकिन उसका विवेचन कुछ अलग और व्यवस्थित है। उनके प्रमुख विचार निम्न हैं-

  • उसने सदवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू गुणों की परिभाषा देते हुये कहा कि ”सदगुण” मनुष्य की ऐसी स्थायी मानसिक अवस्था है जो निरन्तर अभ्यास के फलस्वरूप विकसित होती है और बुद्धि दव्ारा निर्धारित उसमें स्वैच्छिक कर्मों में व्यक्त होती है।

  • परिभाषा से स्पष्ट है कि सदवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू गुण जन्मजात नहीं होते है, वे कठोर अभ्यास से विकसित होते है वस्तुत: प्रत्येक सदवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू गुण मनुष्य की किसी न किसी ईच्छा या वासना को नियंत्रित करता है जैसे संयम भोग की वासना को और साध्य भय की भावना को, सदगुण में विकसित होने का अर्थ यही है कि अब वह व्यक्ति किसी वासना या ईच्छा के अधीन कोई कार्य नहीं करेगा। उसमें विभिन्न फर्क स्वाभाविक रूप से उसकी वृद्धि के निर्देशन के अनुसार होंगे।

  • अरस्तु ने सदवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू गुणों के संबंध में माध्य (मध्यमार्ग) का सिद्धांत दिया है जिसके अनुसार प्रत्येक नैतिक सदवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू गुण अतिवादी दृष्टिकोणों के नीच की अवस्था है जैसे-संयम, अनियंत्रित होगा और पूर्ण वैसम्यवाद के बीच की स्थिति है।इसी प्रकार साहस आक्रमकता और कायरता के बीच की स्थिति है सार यह है कि सदवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू गुण व्यक्ति को अतिवाद से मुक्त करते है और संतुलन के रास्ते पर चलना सिखाते है।

  • अरस्तु ने स्पष्ट किया है कि सदवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू गुणों का ज्ञान नहीं होना किसी कर्म को अनैच्छिक नहीं बनाता है जैसे- कोई कामचोर यह कहें कि उसे बात का ज्ञान नहीं था कि कर्मता एक सदवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू गुण है तो अपनी अनैतिकता की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता।

  • अरस्तु ने सदवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू गुणों को 2 वर्गो में बांटा है बौद्धिक सदवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू गुण तथा नैतिक सदवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू गुण यह वर्गीकरण आत्मा के 2 पक्षों बौद्धिक तथा भावनात्मक पर अधारित है आत्मा का भावनात्मक पक्ष ईच्छाओं तथा वासनाओं से संबंधित है जो पशुओं में भी यथा पक्ष होता हैै बौद्धिक पक्ष वह विशिष्ट पक्ष है जो मनुष्य को शेष प्राणियों से अलग तथा बेहतर बनाता है।बौद्धिक सदवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू गुणों में सबसे महत्वपूर्ण विवेक है जो सुकरात के ज्ञान के नजदीक है, नैतिक सदवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू गुणों में सबसे महत्वपूर्ण है- संयम, साहस और न्याय।

आत्मा-

  • बौद्धिक पक्ष-भावनात्मक पक्ष

  • बौद्धिक सदगुण नैतिक सदगुण-साहस, संयम, न्याय

विवेक शीलता

  • आत्मा का बौद्धिक पक्ष केवल मनुष्य में और भावनात्मक पक्ष तो पशुओं में भी होता है सो विवेक को सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण दिया(मनुष्य को सबसे अलग करता है सो यह मेरे में)

  • अरस्तु ने पहली बार नीतिशास्त्र को व्यवस्थित रूप प्रदान किया उसकी पुस्तक निमोमोनियन नीतिशास्त्र की पहली स्वतंत्र पुस्तक मानी जाती है

  • अरस्तु कुछ बिन्दुओं पर सुकरात के नजदीक है कुछ पर प्लेटो से प्रभावित है जबकि कुछ विचारों में वह दोनों से भिन्न रास्ता चुना हैं

  • उसके परिवार का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है अत: एक नीतिशून्य कर्म माना जा सकता है

कुछ अन्य पक्ष:-

  • अरस्तु ने महिलाओं को संपूर्ण पुरुष कहा है, नारीवादी नीति मीमांसा इसका कहा विरोध करती है।

  • अरस्तु ने दासों को मनुष्य नहीं माना है, समतावादी दृष्टि से यहि इस विचार का विरोध किया जाता हैं।

  • अरस्तु ने व्यक्ति को नैतिक बनाने के लिए राज्य का अत्यधिक समर्थन किया है उसका दावा है कि ”व्यक्ति को व्यक्ति ही सभ्य बनाता है” उसके समय में यह विचार संभवत: प्रासंगिक रहा होगा लेकिन वर्तमान में राज्य की शक्तियां बहना व्यक्ति की स्वतंत्रता व अनैतिक माना जाता है

मूल्यांकन-

  • पहली बार व्यस्थित विवेचन।

  • अतिवादी विचारों को खारिज करके संतुलित नीति मीमांसा की स्थापना।

  • पूर्णतवाद का विचार प्रारंभिक तौर पर विकसित किया जो 19वीं सदी केन्द्रीय विचार बन गया।

  • महिला को लेनन के दर्शन में पूर्णतावाद कहलाया।

अरस्तु का दृष्टिकोण एक वैज्ञानिक का दृष्टिकोण है सो उसके चिंतन में एक व्यवस्था नजर आती है उसी ने पहली बार स्पष्ट किया है कि नैतिकता का संबंध मनुष्य के सभी कर्मो से नहीं होता, सिर्फ स्वैच्छिक कर्म, सकंल्प संचालन पहला विल (मर्जी) कर्मो से होता है उसके अनुसार 2 प्रकार के कार्य स्वैच्छिक कर्म नहीं माने जा सकते-

  • बाहरी दबाव से किये गये कर्म।

  • परिस्थितियों से अनजान होने के कारण किये गये कार्य।जैसे- किसी व्यक्ति में किसी अनाथ की सहायता करने के लिए उसे कुछ खरीद कर खाने को दिया, खाते ही उस की मौत हो गई क्योंकि उसमें जहर था अगर कर्ता को इस संभावना का बिल्कुल भी ज्ञान नहीं था तो उसका यह कृत्य अनैच्छिक माना जायेगा।

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