इंडियन (भारतीय) वेर्स्टन (पश्चिमी) फिलोसोपी (दर्शन) (Indian Western Philosophy) Part 8 for IAS

Get unlimited access to the best preparation resource for IAS : Get detailed illustrated notes covering entire syllabus: point-by-point for high retention.

Download PDF of This Page (Size: 156K)

सिविक नीति मीमांसा

सिविक विचारधारा का प्रवर्तन सुकरात के बाद ऐंटीस्थिनीज तथा डायोजिनीज ने किया। सेरेनाइको के समान इसका भी दावा था कि ये सुकरात के अनुयायी है, सुकरात ने आनंद के संदर्भ में बुद्धि दव्ारा वासनाओं के नियंत्रण की बात कही थी, उसी को आधार बनाकर सिविक संप्रदाय का विकास हुआ।

विचार-

  • विशुद्ध बुद्धिवाद तथा कठोर वैराग्यवाद में विश्वास।

  • मनुष्य को शारीरिक तथा मानसिक सुखों की ईच्छा का पूर्ण त्याग करना चाहिए क्योंकि सुख की कामना उसे अपना गुलाम बना देती हे ऐंटीस्थिनीज का कथन है कि ”सुख की कामना से वसीभूत होने से अच्छा है पागल हो जाना”

  • मानव जीवन का उद्देश्य सुख प्राप्त करना नहीं है बल्कि विवेक, ज्ञान तथा सदगुणों से युक्त जीवन जीना हैं।

  • सदगुणों के विकास में दुखों की विशेष महत्ता है, कष्टपूर्ण जीवन जीने से आत्मसंयम तथा विवकेशीलता जैसे गुण विकसित होते है जो सुखपूर्ण जीवन में नहीं हो सकतें।

  • सिविक संप्रदाय में पहली बार विश्व नागरिकता का समर्थन किया गया उन्होंने कहा कि व्यक्ति सिर्फ अपने नगर, राज्य या राष्ट्र का नागरिक नहीं होता, वह संपूर्ण विश्व का नागरिक है, अगर उसके राज्य का कोई कानून उसमें विवेक के विरुद्ध है तो उसे उसका विरोध करना चाहिए।

मूल्यांकन-

एकतरफा दृष्टिकोण।

इतना कठोर सिद्धांत समाज में व्यावहारिक स्तर पर नहीं चल सकता।

  • विश्व नागरिकता का विचार मौलिक और प्रगतिशील हैं।

  • सुकरात ने सुख और आनंद में स्पष्ट भेद नहीं किया है लेकिन कथनों से प्रतीत होता है कि वे शारीरिक सुख की तुलना में मार्क्स और बौद्धिक आंनद को ज्यादा महत्व देते है सदवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू गुणों का विकास का प्रयोजन इस आनंद की प्राप्ति ही है।

मूल्यांकन:-

  • अरस्तु का आक्षेप है कि नैतिक व्यवहार के लिए पर्याप्त नही है उसके अनुसार आचरण होना भी जरूरी है।

  • सदवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू गुणों की एकता के सिद्धांत में भी समस्या है, जैसे अगर कोई व्यक्ति साहसी लेकिन अन्यायी है। तो इन दोनों पक्षों को ज्ञान सदवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू गुण का व्यक्त रूप कैसे माना जा सकता है। वस्तुत यह दोनों आलोचना कमजोर है सुकरात ने ज्ञान का जो अर्थ लिया उस स्तर पर न तो आचरण की समस्या बनती है और न ही अंतर की। उनका योगदान यह है कि उन्होंने नैतिकता में वस्तुनिष्ठता की स्थापना की और सदवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू गुण नीतिशास्त्र के स्वयं में एक नयी शाखा को भी विकिसत किया।

सेरेनाइक विचारधारा-सेरेनाइक संप्रदाय, जिसके प्रर्वतक अरिस्टीपल थे उनका दावा है कि उसकी नीति मीमांसा सुकरात के विचारों पर आधारित है इन्होंने सुकरात के सदवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू गुण जैसे विचारों पर नही बल्कि सुख और आनंद संबंधी विचारों पर भी ध्यान केन्द्रित किया और नित्कृष्ठ स्वार्थ मूलक सुखवाद की स्थापना की।

प्रमुख विचार:-

  • मनु- वैज्ञानिक सुखवाद

  • नैतिक सुखवाद-सुख ही एकमात्र शुभ है।

  • सुखों में गुणात्मक भेद नही सिर्फ मात्रा भेद।

  • शारीरिक सुख मानसिक सुख से बेहतर क्योंकि अधिक संतुष्टी संयम (अधिक तीव्र) होती है।

  • तात्कालिक सुख दूरवर्ती सुख।

  • निश्चित सुख अनिश्चित सुख।

  • सिर्फ उसी सुख का त्याग करना चाहिए जिसका परिणाम दुखदायी हो।

  • विवेक, ज्ञान तथा सदगुणों का महत्व केवल वही तक है जहाँ तक साधन हैं।

Developed by: