विश्वविद्यालय

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प्रस्तावना:- हजारों साल पहले तक्षशिला और नालंदा विश्वविद्यालयों के माध्यम से दुनिया में ज्ञान का डंका बजाने वाले भारत में भले ही उच्च शिक्षण संस्थानों की संख्या सर्वाधिक हो लेकिन इसकी गुणवत्ता के मामले में हम काफी पीछे हो गए हैं। हमारे हार्वर्ड कहे जाने वाले केंद्रीय विश्वविद्यालयों के हाल का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसमें 37 फीसदी शैक्षणिक पद रिक्त पड़े हैं। शिक्षा के मामले में जगदगुरु कहलाने वाले भारत में ऐसी स्थिति क्यों हुई? क्यों हम अपने विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता में सुधार नहीं कर पा रहे है? इसके लिए कुछ हद तक राजनीति भी जिम्मेदार है।

विश्वविद्यालय:-हमारे देश के विश्वविद्यालयों में पढ़ाई का वह वातावरण और स्तर नहीं है जो दुनिया के अन्य प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में देखने को मिलता है। वातावरण के लिए जरूरी है कि विश्वविद्यालयों को राजनीति का अखाड़ा बनने से रोका जाए। विश्वविद्यालय पढ़ाई के लिए है तो उन्हें इस काम को केंद्रीयकृत होकर करने देना चाहिए। सरकार का काम है विश्वविद्यालयों को आवश्यक सुविधाएं मुहैया कराए लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं रहा है। इस सरकार ज्यादा ध्यान ही नहीं दे पा रही हैं।

प्रभाव:- हमारे देश के विश्वविद्यालयों में राजनीतिक प्रभाव देखना हो तो इनकी नियुक्ति प्रक्रिया को ही देख लीजिए। जो व्यक्ति शिक्षा जगत से नहीं है उसे ही कुलपति बना दिया जाता है। फिर पढ़ाने के लिए शिक्षकों की नियुक्तियों की शुरुआत होती है। जो राजनीतिक नियुक्तियों के आधार पर विश्वविद्यालयों में हैं। वे इसी क्रम को आगे बढ़ाते हैं। पढ़ाई जिसके लिए विश्वविद्यालय बने हैं, उनसे हमारा ध्यान हटता जा रहा है। जिस व्यक्ति का कोई राजनीतिक संबंध नहीं है जो केवल पढ़ाई के लिए समर्पिम है, वह पढ़ाई में ही रहता है। लेकिन राजनीति के दबाव के कारण ऐसा हो नहीं पाता है।

धन का अभाव:- हमारे देश में सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का छह फीसदी शिक्षा पर खर्च किया जाता है। इसमें भी लगभग एक फीसदी उच्च शिक्षा पर खर्च किया जाता है। उच्च शिक्षा के लिए संसाधनों की आवश्यकता होती है। पुस्तकालय चाहिए, प्रयोगशालाएं चाहिए लेकिन इन पर धन के अभाव में पर्याप्त खर्च नहीं किया जाता। ऐसे में चाहकर भी अनुसंधान काम कैसे हो सकेगा? यदि उच्च स्तरीय अनुसंधान का काम करना हो तो उसके लिए विद्यार्थियों को संसाधन भी तो चाहिए लेकिन यह हमारे यहां उपलब्ध नहीं है क्योंकि धन का अभाव है। जरा सोचिए कि अनुसंधान और शिक्षा का चोली दामन, दीया बत्ती जैसा साथ है। इसके सहारे शिक्षकों को अन्य बातें भी जानने को मिलती हैं। वह खुद को तो नई जानकारियों से रूबरू कराता ही है और साथ ही विद्यार्थियों को भी इन जानकारियों से रूबरू करवाता है। जब गुणवत्तापरक अनुसंधान नहीं हो पाते तो विश्वविद्यालय में पढ़ाई की गुणवत्ता में गिरावट तो आती ही है।

जुड़ाव:-शिक्षा का समाज और उद्योगों से जुड़ाव होना बेहद आवश्यक है। उदाहरण के तौर पर हम ऐसा नहीं कर पाते हैं कि जब स्वच्छ भारत अभियान चले तो विश्वविद्यालय से उसे जोड़ा जाए। हमारे उद्योगों की जरूरतें क्या हैं, इस पर पढ़ाई को केंद्रित करते हुए विद्यार्थियों को तैयार करना होगा। आखिरकार विश्वविद्यालयों से ही तो हम मानव संसाधन विकास कर सकते हैं तो उसके लिए हमें उस ज्ञान को उपलब्ध कराना होगा जो भविष्य की आवश्यकता है। वर्तमान में विश्वविद्यालयों से निकलने पर विद्यार्थियों को उद्योग अपने अनुसार प्रशिक्षित करता है। हमें चाहिए कि पहले से ही प्रशिक्षित लोगों को तैयार करें। जहां तक कला संकाय की बात है तो कॉलेज और विश्वविद्यालयों में सभी प्रकार की शिक्षाएं दी जा रही हैं किसी एक विषय को लेकर विशेषज्ञ तैयार नहीं किये जा रहे हैं। विश्वविद्यालयों के स्तर में सुधार आ सकता है बशर्ते इन्हें भी खेलों की तरह खासतौर पर क्रिकेट की तरह विकसित किया जाए।

निजी विश्वविद्यालय:- सरकारें उच्च शिक्षा का बजट घटा रही हैं और निजी विश्वविद्यालयों को बढ़ावा दिया जा रहा है। 1995 में निजी विवि में पंजीकृत छात्रों की संख्या 7 प्रतिशत थी, जो कि 2007-08 में 25 प्रतिशत हो गई थी। इसलिए यह तो स्पष्ट है कि हम शिक्षा के निजीकरण की ओर बढ़ रहे हैं। शिक्षा की कुल गुणवत्ता सुधारने की दिशा में इससे सफलता मिलेगी इसमें संदेह हैं होना तो यह चाहिए था कि कुल शिक्षा प्रणाली को मजबूत किया जाता-शिक्षकों की कमी पूरी की जाती, बुनियादी ढांचे में निवेश किया जाता। जबकि देश के केंद्रीय विवि का ही इन पैमानों पर बुरा हाल है। राज्य विश्वविद्यालयो जैसे राजस्थान विवि, जयपुर, इलाहाबाद विवि तथा सागर विवि, मप्र जो एक जमाने में ’सितारा’ विश्वविद्यालय हुआ करते थे उनकी हालत तो और बदतर हैं। न शिक्षक हैं और न ही संसाधन।..... सरकार का जोर 10-12 विश्वविद्यालयों और कुछ एक संस्थान कॉलेजो को श्रेष्ठतर बनाने पर है। उनको और अधिक पैसा दिया जा रहा है। पर इससे तो शिक्षा प्रणाली की गुणवत्ता नहीं सुधर सकती। देश के बहुसंख्यक विश्वविद्यालयों को रामभरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

गणना:-शिक्षा से जुड़ी दो अहम नीतियों को 1968 और 1986 में लागू किया जा चुका है। इसके बावजूद विश्व के श्रेष्ठ 200 विश्वविद्यालयों में भारतीय विश्वविद्यालयों की गणना नहीं होती। यहां तक कि भारत में श्रेष्ठ मानी जानी संस्थाएं भी वैश्विक क्रम में काफी नीचे है। भारत में 27,487 उच्च शिक्षण संस्थाएं हैं जो दुनिया में सबसे अधिक है। यह संख्या चीन से 7 गुना और अमरीका से चार गुना अधिक है। लेकिन, इसके विपरीत उच्च शिक्षा का कुल नामांन अनुपात लगभग 13.5 प्रतिशत है जो विश्व के औसत 24 प्रतिशत से काफी कम है।

भार:- केंद्रीय उच्च शिक्षण संस्थाओं में रिक्त पदों की भर्ती एक अहम मुद्दा है, जो शिक्षा और शोध की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहा है। अनुदानों की मांग पर मानव संसाधन विकास मंत्रालय की संसदीय स्थाई समिति की 264 वीं रिपोर्ट (2015-16) के मुताबिक केंद्रीय विश्वविद्यालयों में करीब 37 प्रतिशत शैक्षिक और 31 प्रतिशत गैर-शैक्षिक पद खाली पड़े है। यूजीसी ने शैक्षिक और गैर-शैक्षिक पदों का कोटा 1:1.1 के अनुपात में रखा है। इसका परिणाम यह है कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों के शिक्षको पर पढ़ाने के अलावा भी कार्य-भार है। प्रशासनिक (गैर-अकादमिक) काम देखना भी उनके काम में शामिल है, जिसके कारण कई बार उनकी रचनात्मकता, पहल, ज्ञान की सृजनात्मकता पर विपरीत असर पड़ता है और इसके चलते विभाग की गुणवत्ता और जिस व्यवस्था का वे प्रतिनिधत्व करते हैं, प्रभावित होती है। आईआईटी और आईआईएम गुणवत्ता के बेहतर मानदंडो के कारण केंद्रीय विश्वविद्यालयों की तुलना में काफी बेहतर हैं। नियुक्ति की प्रक्रिया में सामाजिक समावेशन से जुड़े मामलों की पूरी तरह से पालना नहीं हो रही। नीति के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद कई आरक्षित पद खाली पड़े हैं। विश्वविद्यालयों में राजनीतिक हस्तक्षेप की काफी सूचनाएं आ रही है। ऐसा आईआईटी और आईआईएम में नहीं होता। वे अपनी स्वायत्ता की पूरी रक्षा करते हैं और राजनीतिक प्रभावों को एक हाथ की दूरी पर रखते हैं।

प्रशासनिक सुधार:- कई भारतीय विश्वविद्यालयों ने अपना दायित्व नहीं निभाने और प्रशासन में पारदर्शिता की कमी के कारण अपेक्षित परिणाम नहीं दिए हैं। कई बार शैक्षिक और गैर-शैक्षिक स्टाफ की नियुक्ति की प्रक्रिया में समझौते कर लिये जाते हैं और जन धन का गलत प्रयोग होता है भ्रष्टाचार प्रशासनिक शोषण, उपेक्षा, वित्तीय अनियमिताओं जैसे मामले सामने आए हैं। देश में केंद्रीय शिक्षा संस्थानों में हो रहे भ्रष्टाचार और अनियमिताओं से संबंधित विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से मानव संसाधन विकास मंत्रालय को मिली शिकायतों से साफ है कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों में आईआईटी, आईआईएम व एनआईटी आदि संस्थाओं की तुलना में उच्च स्तर की विश्वविद्यालयों अनियमिताओं और भ्रष्टाचार है। ये शिकायते हमारे देश के विश्वविद्यालयों की विफल संचालन व्यवस्था को दर्शाते हैं। जब इन विश्वविद्यालयों के प्रशासनिक और अकादमिक माहौल में उनकी समस्याओं के समाधान के लिए पर्याप्त रास्ते नहीं है और न ही भ्रष्टाचार एवं अनियमिताओं पर नजर रखने के लिए प्रक्रिया है। तो इस क्षेत्र में कैसे सुधार होगा? यह सोचने वाली बात हैं।

निजी फंड:- हमारी शिक्षा प्रणाली में कुछ सालों से जो नीति चल रही है, उससे स्पष्ट लगता है कि सरकार उच्च शिक्षा पर खर्च कम करना चाह रही है। सरकारें विश्वविद्यालयों से कह रही हैं कि वे अपने लिए निजी स्त्रोतों से अधिक से अधिक फंड जुटाएं। विश्वविद्यालयों को सेल्फ फाइनेंस स्कीम शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। यह प्रक्रिया यूपीए के दौर में ही शुरू हो गई थी और एनडीए सरकार ने इस प्रक्रिया को और गति दे दी है। अगर हम इसी रास्ते चलते रहेंगे तो इसका परिणाम तय है कि उच्च शिक्षा लाभ के लिए बेचने वाली वस्तु बन जाएगी और उसे वही लोग खरीद पाएंगे जिनके पास पैसा है।

गुणवत्ता सुधार:- प्राय: सुनने में मिल जाता है कि देश में कुछ विश्वविद्यालयों में श्रेष्ठता के मानक इतने बेहतर किए जाएगे कि वे दुनिया के शीर्ष हो जाएं। इस कथन में दरअसल जो कहा है उससे अधिक छिपाया जा रहा है। कि देश में उच्च शिक्षा अध्ययन के जो हजारों कॉलेज हैं, उन सबकी गुणवत्ता सुधारने की बजाय केवल कुछ चुनिंदा संस्थानों को ही बेहतर शिक्षा के केंद्र में विकसित किया जाएगा। सवाल यह है कि शेष शिक्षा संस्थानों में गुणवत्ता का स्तर क्यों गिरने दिया जाए? ऐसी नीति से तो देश में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार नहीं लाया जा सकता। प्राथमिकता कुछ संस्थानों में गुणात्मक देने के बजाय सभी संस्थानों की गुणात्मकता का औसत स्तर उठाना होना चाहिए। शिक्षा संस्थानों में शिक्षा का स्तर तब सुधरेगा जब शिक्षक बेहतर हों। इसके लिए शिक्षकों की गुणवत्ता सुधारने के कार्यक्रम चलाना चाहिए। हमारे कुछ छात्र विदेश जाएं और वहां शिक्षा प्राप्त करें, इससे देश को शायद ही कुछ हासिल हो। पर अगर हम अपने शिक्षकों को दुनिया के नामी विश्वविद्यालयों में प्रशिक्षण के लिए भेंज सकें, तो उससे जरूर हमारी आने वाली पीढ़ियों को उसका लाभ मिलेगा। बेहतर शिक्षक ही शिक्षा की उच्च गुणवत्ता की गांरटी हो सकते हैं। यह सही है कि विद्यार्थी अपना दीपक खुद बने तभी शिक्षा की कोई सार्थकता है। पर कोई विद्यार्थी दीपक बने उसके लिए भी तो तेल चाहिए, बाती चाहिए और एक चिंगारी चाहिए। ऐसा अच्छा शिक्षक ही यह काम कर सकता है। इसके लिए जरूरी है कि एक शिक्षक को बेहतर प्रशिक्षण दिया जाए।

सबसे पहले तो प्रशासन, नियमन और जिम्मेदारी निभाने के संबंध में केंद्रीय विश्वविद्यालयों आईआईटी और आईआईएम स्तर का अकादमिक कामकाज सुधार होना चाहिए युजीसी ने सभी विश्वविद्यालयों के लिए समान नीति बनाई है, जिससे केंद्रीय विश्वविद्यालयों का अकादमिक प्रदर्शन प्रभावित हुआ है। केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षकों का ध्यान महज शिक्षण की ओर नहीं होना चाहिए, उन्हें शोध कार्यो की ओर भी ध्यान देना चाहिए। क्रेंदीय विश्वविद्यालयों में अकादमिक स्टाफ को शोध एवं अध्यापन फेकल्टी के रूप में वर्गीकरण करने की आवश्यकता है। अकादमिक स्टाफ के इस वर्गीकरण से शोध एवं अध्यापन की गुणवत्ता सुनिश्चित होगी।

उपसंहार:-अच्छे शिक्षकों को देश में रहने और उसका गौरव बढ़ाने को प्रेरित करने के लिए उच्च शिक्षा के क्षेत्र में पूंजी निवेश को प्राथमिकता दी जानी चाहिए ताकि विश्व स्तर की व्यवस्थाएं विकसित की जा सकें। भारत में असिस्टेंट प्रोफेसर से प्रोफसर पद पर तरक्की विश्वविद्यालय में उनकी सेवा अवधि के मद्देनजर की जाती है न कि उनके काम की गुणवत्ता देखकर। इस जड़ता को छोड़ना चाहिए। स्थापित एवं प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में अच्छे काम को प्रोत्साहित करना चाहिए। राजनीतिक हस्तक्षेप से दूरी बनाई जानी चाहिए और विश्वविद्याालयों का कामकाज पूरी तरह से पारदर्शिता से किया जाना चाहिए। जिससे विद्यार्थियों को अच्छी से अच्छी उच्च शिक्षा प्राप्त हो सके क्योंकि ये ही हमारे देश का भविष्य है। जब नींव मजबूत होगी तभी तो हमारे देश का भविष्य मजबूत होगा।

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