महत्वपूर्ण राजनीतिक दर्शन Part-21: Important Political Philosophies for IASfor IAS

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स्टालिन का मार्क्सवाद

1924 में लेनिन की मृत्यु होने के बाद उसके उत्तराधिकारी के तौर पर लियो ट्रॉटवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू स्की तथा जोसेफ वी. स्टालिन में कड़ी प्रतिस्पर्धा देखी गई थी। ट्रॉटवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू स्की की धारणा थी कि विश्व क्रांति के लिए संघर्ष जारी रहना चाहिए तथा सोवियत संघ को उसके लिए पूरी प्रतिबद्धता से कार्य करना चाहिए क्योंकि अगर सारे विश्व में पूंजीवाद खत्म नहीं होगा तो सोवियत संघ का समाजवाद भी विफल हो जाएगा। स्टालिन की राय इसके विपरीत थी। शक्ति संघर्ष में स्टालिन की विजय हुई और उसने 1953 तक लगातार 29 वर्षों तक सोवियत संघ पर शासन किया। यद्यपि स्टालिन ने सभी कार्य लेनिन के नाम पर किए पर वास्तविक यह है कि उसने कई मामलों में मार्क्स तथा लेनिन के विचारों में संशोधन किया।

स्टालिन के प्रमुख विचार निम्नलिखित हैं-

ढवस बसेेंत्रष्कमबपउंसष्झढसपझ स्टालिन ने ’एक देश में समाजवाद’ का सिद्धांत प्रतिपादित किया। उसने ट्रॉटवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू स्की के विपरीत यह मत रखा कि सोवियत संघ को विश्व क्रांति का कार्यक्रम कुछ समय के लिए स्थगित कर देना चाहिए और अपनी सारी शक्ति अपने समाजवाद को सुदृढ़ करने में लगानी चाहिए। उसने स्पष्ट किया कि बाकी दुनिया में पूंजीवाद के होते हुए भी एक देश में समाजवाद का अस्तित्व संभव है।

  • स्टालिन ने कुछ मामलों में राष्ट्रवाद को भी प्रोत्साहन दिया, विशेषत: जापान को दव्तीय विश्व युद्ध में हराने के मामले में। यह विचार मार्क्स और लेनिन की विचारधारा से काफी अलग था।

  • स्टालिन ने राज्य के लुप्त हो जाने के मार्क्सवादी विचार को भी पीछे धकेल दिया। उसने स्पष्ट शब्दों में घोषणा की कि सोवियत संघ में राज्य लुप्त नहीं हो सकता क्योंकि, वह चारों ओर से पूंजीवादी शक्तियों से घिरा है। जब तक पूंजीवादी राज्यों का यह घेरा खत्म न कर दिया जाए, तब तक राज्य की शक्ति का विस्तार करना जरूरी है।

  • स्टालिन से आय की समानता के सिद्धांत को भी कुछ प्रसंगों में खारिज कर दिया। लेनिन का मानना था कि किसी भी अधिकारी को एक कुशल मजदूर से ज्यादा वेतन नहीं लेना चाहिए। इसके विपरीत, स्टालिन ने घोषणा की कि प्रत्येक व्यक्ति को उसके काम के अनुसार वेतन मिलना चाहिए जिसमें उसकी योग्यता तथा क्षमता की भूमिका को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता।

  • स्टालिन ने लेनिन के इस सिद्धांत को भी अनिवार्य नहीं माना कि पूंजीवाद से समाजवाद की यात्रा सिर्फ हिंसक क्रांति के माध्यम से हो सकती है। उसने कहीं-कहीं स्वीकार किया है कि यह प्रक्रिया शांतिपूर्ण ढंग से भी पूरी हो सकती है। गौरतलब है कि मार्क्स ने भी अपने अंतिम समय में इस बात को स्वीकार किया था।

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