महत्वपूर्ण राजनीतिक दर्शन Part-24: Important Political Philosophies for IB-ACIOfor IB-ACIO

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साम्यवाद/मार्क्सवाद की सीमाएँ-

अलग-अलग विचारधाराओं के विदव्ानों ने मार्क्सवाद की सीमाओं पर अपने तरीके से प्रकाश डाला है। कुछ सीमाएँ मार्क्सवाद के सैद्धांतिक पक्षों से जुड़ी हैं तो कुछ व्यावहारिक पक्षों से कुछ प्रमुख सीमाएँ निम्नलिखित हैं-

ढवस बसेेंत्रष्कमबपउंसष्झढसपझ वर्तमान में राज्य की शक्तियाँ अत्यधिक बढ़ चुकी हैं, अत: क्रांति की संभावना अब प्राय: शून्य हैं।

  • जहाँ-जहाँ क्रांति हुई वहाँं भी साम्यवाद की अवस्था नहीं आ पाई। इसका अर्थ है कि साम्यवाद एक काल्पनिक धारणा है जिसके वास्तव में साकार होने की संभावना नही ंके बराबर है।

  • मार्क्स ने अपने वर्ग सिद्धांत में मध्यवर्ग को महत्व नहीं दिया परन्तु अब यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो गया है। इस वर्ग को शामिल किए बिना कोई भी सिद्धांत वर्तमान में प्रासंगिक नहीं माना जा सकता।

  • कॉर्पोरेट (सामूहिक) या निगमीकृत पूंजीवाद ने क्रांति की संभावनाएँ समाप्त कर दी है क्योंकि अब पूंजी शेयर के रूप में होती है और लाखों व्यक्ति एक ही कारखाने के मालिक हैं। यहांँ तक कि कई मजदूर भी कुछ शेयर खरीदकर मालिका हो जाते हैं। अत: क्रांति कौन और किसके विरुद्ध करेगा, यह स्पष्ट हो नहीं हो सकता।

  • कल्याणकारी राज्य तथा लोकतंत्र के कारण क्रांति की आवश्यकता भी नहीं बची है क्योंकि राज्य ने विभिन्न कल्याण योजनाओं के माध्यम से वे अधिकांश लाभ वंचित वर्गों को दे दिए हैं जिनकी प्राप्ति के लिए क्रांति का सिद्धांत दिया गया था।

  • मार्क्सवादी राज्यों से भी समाजवाद समाप्त होता जा रहा है, जैसे सोवियत संघ, हंगरी इत्यादि।

  • जिन देशों में समाजवाद स्थापित हुआ, वहाँं भी समानता स्थापित नहीं हो पाई। वहांँ आर्थिक विषमता तो कम हुई किन्तु राजनीतिक विषमता बढ़ गयी।

  • मार्क्स के अनुसार क्रांति उन देशों में होनी थी जहाँ पूंजीवाद का चरम विकास हुआ हो, लेकिन क्रांति उन देशों में हुई जहाँ पूंजीवाद का विकास नही ंके बराबर था, जैसे रूस व चीन।

  • साम्यवाद में राज्य का अस्तित्व नहीं होगा तो वैश्विक व्यवस्था किस प्रकार कार्य करेगी, यह मार्क्स ने स्पष्ट नहीं किया है।

  • 1960 के बाद कई ऐसी नवीन समस्याएँ उठी जिन्हें मार्क्सवादी के भीतर पूर्णत: नहीं किया जा सकता है। इन आंदोलनों ने मार्क्सवाद के विचारधारात्मक दावे को कमजोर किया।

  • खूनी संघर्ष चाहे जितना भी अनिवार्य प्रतीत हो किन्तु नैतिक दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता।

  • वर्तमान में प्रत्येक विचारधारा को एकांगी मानकर ’विचारधारा के अंत’ का सिद्धांत प्रस्तुत किया गया है। इस दृष्टि से मार्क्सवाद भी अप्रासंगिक है। यह खंडन मूलत: जीन फ्रांसिस ल्योतार, डोनियल बैल आदि ने किया है।

  • धर्म में निहित शक्तियों को मार्क्स ने नगण्य मान लिया, इसलिए उसका सही मूल्यांकन नहीं कर पाया।