प्रतिभा पलायन

Get unlimited access to the best preparation resource for UGC : get questions, notes, tests, video lectures and more- for all subjects of UGC.

Download PDF of This Page (Size: 109K)

सुरभित करने

निज सौरभ से

दिग-दिगन्त को

खिल रहा था एक पुष्प

भारत के विराट आँगन में।

मन में उमंग थी

दृढ़ता की, विश्वास की

कुछ कर गुजरने की चाह थी

और चाह भी स्वंय को खपाने की

राष्ट्र के उत्थान में।

अपनी पूरी क्षमता से

लगन और निष्ठा से

अभावों, आघातों, आपदाओं को

लांघते लंघाते

जा ही चढ़ा पर्वत की चोटी पे।

योग्यता धरी रही

अवसर कोई मिला नहीं

भ्रष्टाचार और भाई भतीजावाद की

मार उस पर ऐसी पड़ी

जा गिरा एक विदेशी झोली में।

प्रतिभा प्रस्फूटित हुई

और आज उसी की गंध से

पाने निज नव जीवन को

जाते हैं वो अवरोधक तत्त्व

आज उसी की गोद में।

Author: Manishika Jain

Developed by: