एनजेएसी अधिनियम असंवैधानिक और अमान्य (NJAC Act is unviable And Invalid-Act Arrangement of The Governance)

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• सरकार ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग की स्थापना हेतु 99वां संविधान विधेयक प्रस्तुत किया था।

• इसकी परिकल्पना उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति व स्थानांतरण और भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति करने वाले एक स्वतंत्र आयोग के रूप में की गई थी।

• इसका गठन तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों, दो प्रख्यात बाहरी व्यक्तियों और कानून मंत्री से मिलकर होना था।

• संवैधानिक संशोधन संसद दव्ारा पारित कर दिया गया था और 20 राज्यों दव्ारा इसकी पुष्टि भी कर दी गई थी।

• हालांकि, इससे पहले कि इसे अधिसूचित किया जाता, न्यायापालिका की स्वतंत्रता में सरकार दव्ारा हस्तक्षेप करने के प्रयास के रूप में सर्वोच्च न्यायालय में इसे चुनौती दी गई।

• एनजेएसी के गठन का उद्देश्य भारतीय उच्च न्यायपालिका की नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार लाना था।

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय

• न्यायालय ने 4-1 के बहुमत से 99 वें संशोधन को निरस्त कर दिया।

• न्यायालय ने कहा कि एनजेएसी में न्यायिक घटक को पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्र दान नहीं किया गया है।”

• स्ंविधान का नवीन प्रावधान ”न्यायाधीशों के चयन और नियुक्ति के संबंध में न्यायपालिका की प्रधानता को सुरक्षित” करने के लिए अपर्याप्त हैं।

• न्यायालय ने आगे कहा कि ”एन.जे.ए.सी के पदेन सदस्य के रूप में विधि और न्याय के प्रभारी केंद्रीय मंत्री के समावेश के कारण अनुच्छेद 124 (1), संविधान के उपबंधों से परे हैं।

न्यायपालिका की प्रधानता वांछित है क्योंकि

• सरकार प्रमुख वादी-चूंकि सरकार एक प्रमुख वादी है, नियुक्तियों के मामले में इसे वरीयता देने का अर्थ न्यायालय की फिक्सिंग (स्थिर) करना होगा।

• न्यायापालिका की स्वतंत्रता :इसे संविधान का मूल ढांचा समझा गया है और एनजेएसी को इसकी स्वतंत्रता का उल्लंघन करने वाला बताया गया।

• भारतीय संविधान के निर्देशों के अनुसार कार्यपालिका एवं न्यायापालिका के मध्य शक्तियों के विभाजन को संभव बनाने हेतु।

• न्यायापालिका ने यह भी कहा कि ”यह संशोधन ”न्यायपालिका की स्वतंत्रता” के साथ ही, ”शक्तियों के विभाजन” के सिद्धांत के भी विरुद्ध है।

• एनजेएसी के सदस्य के रूप में दो ”प्रख्यात व्यक्तियों” का समावेश करने का प्रावधान करने वाला उपबंध संविधान के प्रावधानों से परे हैं

भारत में न्यायधीशों की नियुक्ति

उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति कॉलेजियम की अनुशंसा पर करते हैं। इन न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित संवैधानिक प्रावधान इस प्रकार हैं:

• अनुच्छेद-124: यह व्यक्त करता है कि राष्ट्रपति उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय के ऐसे न्यायाधीशों से परामर्श करने के बाद सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति करेगा जिनसे वह परामर्श करना आवश्यक समझे। भारत के मुख्य न्यायाधीश से सिवाय उसकी नियुक्ति को छोड़कर अन्य सभी नियुक्तियों में परामर्श किया जाएगा।

• उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में अनुच्छेद-217 यह व्यक्त करता है कि राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश, राज्यपाल और संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करेगा।

इनमें से कोई भी अनुच्छे कॉलेजियम प्रणाली पर चर्चा नहीं करता है।

कॉलेजियम प्रणाली का उदभव

• फर्स्ट (पहला) जजेज केस (न्यायाधीश, घटना) वर्ष 1981: सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि राष्ट्रपति मुख्य न्यायाधीश दव्ारा दी गई संस्तुति को ”ठोस कारणों” से अस्वीकार कर सकता हैं। इसने कार्यपालिका के हाथों में और अधिक शक्ति दे दी।

• सेकंड (दव्तीय) जजेस केस वर्ष 1993: इसे सुप्रीम कार्ट (सर्वोच्च न्यायालय) एडवोकेट (वकील मुख्तार) ऑन (के पास) रिकार्ड (लेख प्रमाण) एसोसिएशन (सहकारिता) बनाम भारत संघ के रूप में भी जाना जाता है। इसने कॉलेजियम प्रणाली हेतु मार्ग प्रशस्त किया। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि भारत के मुख्य न्यायाधीश की नियूक्तियों में ”प्रमुख” भूमिका होगी।

• थर्ड (तृतीय) जजेस केस (न्यायाधीश, घटना) वर्ष 1998: राष्ट्रपति के.आर. नारायणन ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद-124 और 217 के अंतर्गत ”परामर्श” शब्द के अर्थ पर सर्वोच्च न्यायालय को प्रेसिडेंशियल (अध्यक्ष पद) रेफ्ररेंस (संदर्भ/निर्देश) जारी किया। प्रत्युत्तर में, सर्वोच्च न्यायालय ने कॉलेजियम प्रणाली के संचालन हेतु दिशा निर्देश निर्धारित किए।

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