ब्रिटिश सरकार की प्रशासनिक एवं सैन्य नीतियाँ (Administrative and Military Policies of British Government) Part 17 for NTSE

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20वीं सदी में सरकारी प्रेस (मुद्रण यंत्र) नीति

1906 ई. के पश्चातवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू साम्राज्य विरोधी गतिविधियों के बढ़ जाने के कारण अंग्रेज प्रशासकों ने भारतीय प्रेस और समाचार-पत्रों पर नियंत्रण स्थापित किया। 1908 ई. के समाचार-पत्र अधिनियम से जिलाधीश को किसी भी समाचार-पत्रों को बंद करने तथा उसके छापेखाने की मशीनों (यंत्रों) पर कब्जा करने का अधिकार दे दिया गया यदि उसके विचार में वह समाचार-पत्र विद्रोह की भावना भड़का रहा था। जिलाधीश के विरुद्ध केवल भारत सचिव को ही अपील की जा सकती थी। इस अधिनियम के अधीन बंगाल में उग्र समाचार-पत्रों -’वंदे मातरमवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू ’ संध्या’ आदि को बंद कर दिया गया।

इस अधिनियम दव्ारा दिए गए निरंकुश अधिकारों को भी अंग्रेजी सरकार कम समझती थी इसलिए 1910 ई. में इंडियन (भारतीय) प्रेस (मुद्रण यंत्र) एक्ट (अधिनियम) पास किया गया। इसके अधीन जिलाधीश को किसी भी प्रचलित अथवा समाचार-पत्रों के प्रकाशन तथा छापेखाने के मालिक से 500 से 5000 की जमानत लेने का अधिकार दे दिया गया। यह जमानत सरकार विरोधी अथवा आपत्तिजनक लेख लिखने पर जब्त हो जाती थी। सरकार विरोधी और आपत्तिजनक की परिभाषा इतनी व्यापक थी कि किसी भी विषय को इसके अंतर्गत लाया जा सकता था। यह निर्णय, कि कौन-सा विषय आपत्तिजनक है, सरकारी अधिकारियों दव्ारा किया जाता था। एक बार जमानत जब्त कर लिए जाने के बाद जमानत की राशि और अधिक बढ़ाई जा सकती थी। किसी भी पुस्तिका अथवा पुस्तक का विवरण रोका जा सकता था। इस एक्ट (अधिनियम) को 1909 ई. के अंतर्गत बनाई गई कौंसिलों (परिषदों) दव्ारा पास किया गया। गोखले ने इस अधिनियम का समर्थन किया था।

1910-1919 ई. के मध्य लगभग 1000 समाचार-पत्रों और छापखानों के विरुद्ध इस अधिनियम के अंतर्गत कार्रवाई की गई। नए छापखानों का खोला जाना और समाचार-पत्रों का संचालन इस जमानत की राशि के कारण अत्यधिक कठिन हो गया। लगभग 500 पुस्तकों को अवैध घोषित करके उनके प्रसार को रोक दिया गया। 5 लाख रूपए से अधिक धनराशि जमानत जब्त करने से उपलब्ध हुई। ’केसरी’ के कुछ लेखों पर आपत्ति करते हुए तिलक को 6 वर्ष के लिए काले पानी की सजा दी गई। तिलक पर मुकदमा चलाने से सरकार विरोधी लेख अथवा समाचार-पत्रों में कमी नहीं हुई बल्कि सरकार की नेकनीयत पर संदेह अधिक बढ़ा।

1919 ई. के मोंटफोर्ड सुधारों तथा असहयोग आंदोलन के पश्चातवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू 1910 ई. के प्रेस अधिनियम को 1922 ई. में समाप्त कर दिया गया। प्रेस से संबंधित वे सब प्रतिबंध बने रहे जो इंडियन (भारतीय) पिनल कोड (दंड संहिता) दव्ारा लगाए हुए थे। इसके अतिरिक्त सरकार के समाचार-पत्रों के विरुद्ध विभिन्न अंग्रेज अधिकारियों दव्ारा मुकदमें चलाए जाने की नीति को प्रोत्साहन दिया। यह नीति पत्रों पर नियंत्रण रखने में बहुत सीमा तक लाभदायक रही। 1930 ई. में गांधी जी दव्ारा सविनय अवज्ञा आंदोलन आरंभ किए जाने के पश्चात पुन: सरकार ने एक अध्यादेश दव्ारा 1910 ई. के प्रेस एक्ट को पुनर्जीवित कर दिया। 1931 ई. में प्रेस (मुद्रण यंत्र) इमरजेंसी (आपातकालीन) पार्वस (शक्तियों) एक्ट (अधिनियम) पास किया गया। 1932 ई. में फौजदारी अधिनियम में एक संशोधन करके 1930 ई. के प्रेस संबंधी अध्यादेश को सामान्य नियम के रूप दे दिया गया। विभिन्न समाचार-पत्रों को परोक्ष रूप से प्रभावित करने तथा उनकी नीति में परिवर्तन कराने के प्रयत्न किए गए। 1942 ई. के भारत छोड़ो आंदोलन और 1943 ई. के बंगाल अकाल के समय के बहुत कम समाचार साधारण जनता को प्राप्त होते थे। डिफेंस (रक्षा) ऑफ (का) इंडिया (भारत) नियमों के अधीन विभिन्न प्रकार के अधिकार अंग्रेजी सरकार को उपलब्ध थे 1946 ई. में जवाहरलाल नेहरू के अधीन आंतरिक सरकार के गठन के पश्चातवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू प्रेस पर लगे प्रतिबंध समाप्त कर दिए गए लेकिन शीघ्र ही सांप्रदायिक विद्रोह के दृष्परिणामों को फैलने से रोकने के लिए पुन: कई प्रतिबंध समाचार-पत्रों पर लगाए गए।

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