गाँधी युग (Gandhi Era) Part 1 for NTSE

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रौलेट एक्ट (अधिनियम) आंदोलन

सर सिडनी रौलेट की संस्तुतियों ने फरवरी, 1919 में अधिनियम का रूप ग्रहण किया। यह आतंकवादी और अपराध अधिनियम कहलाया। रौलेट समिति की सिफारिशों के आधार पर सर विलियम बेसेंट ने दो विधेयकों का प्रस्ताव रखा। इन विधेयकों में यह व्यवस्था की गई थी कि जिस व्यक्ति पर राजद्रोह का संदेह हो उसकी गतिविधियों पर नियंत्रण रखा जाए, जिस व्यक्ति से शांति भंग कि आशंका हो उसे गिरफ्तार कर लिया जाए एवं आपत्तिजनक सामग्री के प्रकाशन को दंडनीय अपराध माना जाए। परन्तु अधिनियम का सबसे आपत्तिजनक पहलू था-बगैर मुकदमा चलाए किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करना एवं बंदी प्रत्यक्षीकरण कानून का उल्लंघन।

इस विधेयक को जनता ने काला कानून का नाम दिया क्योंकि इसका उद्देश्य जनता की स्वतंत्रा का हनन करना तथा सरकारी कर्मचारियों के किसी भी न्यायोचित आंदोलन को कुचलना था।

महात्मा गांधी ने इसे अन्यायपूर्ण, स्वतंत्रता, न्याय के सिद्धांतों तथा व्यक्ति के मौलिक अधिकारों के लिए घातक बताया। उन्होंने इस अधिनियम को वापस लेने की मांग की। सरकार दव्ारा अधिनियम को वापस न लिए जाने के कारण गांधी जी ने रौलेट अधिनियम के खिलाफ राष्ट्रव्यापी आंदोलन का आहवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू वान किया। गांधी के नेतृत्व में यह पहला राष्ट्रव्यापी आंदोलन था। 3 अप्रैल को देशभर में सफल हड़ताल हुआ। हड़ताल के दौरान दिल्ली में हिंसक घटनाएं हुई। दिल्ली में हड़ताली भीड़ पर पुलिस के गोली चलाने से 8 व्यक्ति मारे गए। अहमदाबाद एवं पंजाब में भी हिंसक घटनाएं घटी। जलियांवाला बाग घटना के बाद गांधी ने आंदोलन वापस ले लिया।

इस आंदोलन की कई (सकरात्मक पहलु) उपलब्धियां थी। इसने गांधी के नेतृत्व को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कर दिया। गांधी ने इसी आंदोलन में पहली बार अहिंसा का प्रयोग किया तथा भारत का स्वतंत्रता संघर्ष अब राष्ट्रीय रूप ग्रहण करने लगा।

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