किसानों के आंदोलन एवं विद्रोह (Movement and Uprising of Farmers) Part 3 for NTSE

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1930-40 के दशक के किसान आंदोलन

1930 और 1940 के दशक में भारत में राष्ट्रीय आंदोलन के साथ-साथ किसान आंदोलनों की आवृत्ति भी बहुत बढ़ गयी। इस चरण के आंदोलनों को उत्प्रेरित करने वाले तात्कालिक घटनाक्रम थे-1929-30 की विश्वव्यापी आर्थिक मंदी का निर्धन कृषक वर्ग पर अत्यंत बुरा प्रभाव पड़ना तथा कांग्रेस दव्ारा ’सविनय अवज्ञा आंदोलन’ के साथ एक बार फिर व्यापक जनाधार का आंदोलन छेड़ना। इस आंदोलन ने देश के बहुत बड़े हिस्से में कर और लगान न देने के अभियान का रूप लिया।

इस चरण के किसान आंदोलनों ने यद्यपि तात्कालिक तौर पर कुछ ज्यादा प्राप्त नहीं किया, तथापि उन्होंने एक ऐसा वातावरण तैयार किया, जिसके फलस्वरूप स्वतंत्रता के पश्चातवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू अनेक कृषि सुधार हुए। यथा जमींदारी उन्मूलन की जो मांग इस दौर में उठी वह स्वतंत्रता के पश्चातवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू कार्यान्वित हुयी। इसी प्रकार, ट्रावणकोर राज्य के भारत में विलय के लिये पुनप्रवायलार के आंदोलन ने ऐतिहासिक भूमिका निभायी।

इस चरण में किसानों की जो तात्कालिक मांगे थी, उनमें कर में कटौती, सामंतों की गैर-कानूनी वसूलियाँ और बेगार की समाप्ति, जमींदारों के अत्याचारों से मुक्ति, ऋण बोझ में कमी, गैर कानूनी तरीको से ली गयी भूमि की वापसी तथा किसानों की सुरक्षा आदि प्रमुख थी। खेतिहर मजदूरों की मांगे आंध्रप्रदेश और गुजरात के अतिरिक्त अन्य प्रदेशों के किसान आंदोलनों में गौण ही रही। वास्तव में ये आंदोलन, कृषि ढांचे में आमूल परिवर्तन के लिये नहीं बल्कि इनका उद्देश्य इस व्यवस्था के कुछ अत्यंत पीड़ादायक पहलुओं का अंत करना था।

कांग्रेसी सरकारों के अंतर्गत किसान आंदोलन

1937-39 के बीच 28 महीनों का कांग्रेसी शासनकाल किसान आंदोलनों का उत्कर्ष काल था। एक, तो इस काल में आंदोलनों के लिये नागरिक स्वतंत्रता अधिक मिली दूसरे, कांग्रेसी सरकारों ने कृषि-कानूनों में सुधार के लिये ठोस कदम भी उठाये। दव्तीय विश्व युद्ध के दौरान वामपंथियों की विपरीत धारा की राजनीति के कारण कृषक आंदोलन में कुछ ठहराव सा आ गया। परन्तु 1945 के बाद के बाद पुन: कृषक आंदोलन होने लगे थे।

अखिल भारतीय किसान कांग्रेस सभा

अलग-अलग राज्यों में क्षेत्रीय आधार पर किसान सभाओं के गठन ने इस आवश्यकता को उभार दिया था कि अखिल भारतीय स्तर पर किसान कांग्रेस सभा का गठन किया जाए। इसी प्ररिप्रेक्ष्य में इस सभा की स्थापना अप्रैल, 1936 में लखनऊ में की गयी। स्वामी सहजानंद सरस्वती इस सभा के अध्यक्ष तथा एन.जी. रंगा सचिव चुने गए। इस सभा ने किसान घोषणा-पत्र जारी किया तथा इंदुलाल याज्ञिक के निर्देशन में एक पत्र का प्रकाशन भी प्रारंभ किया। 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा का सम्मेलन फैजपुर में आयोजित किया गया। 1937 के प्रांतीय चुनावों हेतु जारी किए गए कांग्रेसी घोषणा-पत्र के अनेक प्रावधान, अखिल भारतीय किसान सभा के एजेंडे (कार्यसूची) से प्रभावित थे।

किसान आंदोलन की उपलब्धियाँ

  • इन आंदोलनों ने स्वाधीनता के उपरांत किए गए विभिन्न-कृषि सुधारों के लिये एक अनुकूल वातावरण का निर्माण किया। उदाहरणार्थ जमींदारी प्रथा का उन्मूलन।

  • इन्होंने भूस्वामियों अर्थातवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू किसानों को उनके वास्तविक अधिकारों से अवगत कराया तथा कृषि व्यवस्था में परिवर्तन की प्रक्रिया प्रारंभ की।

  • ये आंदोलन राष्ट्रवादी विचारधारा पर अवलंबित थे।

  • लगभग सभी क्षेत्रों में इन किसान आंदोलनों की प्रकृति समान थी।

  • इनसे किसानों में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ी।

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