रजवाड़ों की जनता के आंदोलन (People's Agitation in Princely States) Part 1 for NTSE

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भूमिका

अंग्रेजों ने अपने बृहतर औपनिवेशिक हितों को ध्यान में रखते हुए और 1858 के उदवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू घोषणा के कारण भारत में रजवाड़ों को रहने दिया। कुल भारत भूमि के 44 प्रतिशत भाग पर रजवाड़ों का अधिकार था। इसमें से कई रियासत यथा, मैसूर, कश्मीर, हैदराबाद आदि तो यूरोप के कई देशों से बड़े तथा कई महज 1 हजार जनसंख्या वाले थे। इन सबकी एक खास बात यह थी कि ये सभी अंग्रेजी हुकूमत की संप्रभुता को मानती थी। इसके बदले में अंग्रेजी सरकार ने इन रजवाड़ों को किसी भी प्रकार के आंतरिक या बाहरी खतरे के विरुद्ध सुरक्षा की गारंटी (विश्वास) दी थी।

रियासतों की स्थिति ब्रिटिश भारत से कहीं अधिक दीन हीन थी, वहाँ भूराजस्व अधिक था, मुख्य कानून लागू था, रोजगार के कोई खास अवसर नहीं थे, वसूली के 25-30 प्रतिशत भाग महाराजाओं की ऐयवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू याशी पर खर्च होते थे, परन्तु कुछ रियासतों में स्थिति अच्छी थी। इस विपन्न स्थित के जिम्मेवार केवल रियासतों के शासक ही नहीं थे, बल्कि इसकी जिम्मेवार अंग्रेज सरकार भी उतनी ही थी क्योंकि वह राष्ट्रीय आंदोलन के विरुद्ध उनका प्रयोग करना चाहती थीं। अगर वहाँ पर प्रगति होती तो लोग आगे बढ़कर राष्ट्रीय आंदोलन को अंगीकृत करते, फलत: उनकी स्थिति कमजोर होती।

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