भारत में नए वर्ग का उदय (The rise of the new class in India) Part 4 for NTSE

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कृृषि मजदूर वर्ग का उदय

औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था में भारतीय किसानों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। इस व्यवस्था में न तो कृषि की उन्नति हुई और न किसान समद्धशाली हो सके। कृषि उत्पादन में हास के साथ-साथ कृषि मजदूर वर्ग का उदय, इस नये अर्थतंत्र की एक विकट समस्या थी। इस वर्ग के उदय के कारण भारत की आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों में ही थे।

पहले हम भारत की सामाजिक परिस्थितियों के संदर्भ में इस वर्ग के उदय को देखते है। औद्योगिक क्रांति के बाद सभी देशों की जनसंख्या में वृद्धि हुई। भारत की जनसंख्या भी इस दौरान काफी बढ़ी। इस आबादी में बहुत बड़ी संख्या उन लोगों की थी जो मजदूर के रूप में जमीन पर काम करते थे। अत: जनसंख्या में वृद्धि के कारण मजदूर वर्ग की संख्या में भी वृद्धि हुई।

कृषि मजदूर वर्ग में वृद्धि का एक प्रमुख कारण कुटीर उद्योगों का विनाश था। कुटीर उद्योग के विनाश के कारण बड़ी मात्रा में कारीगर और शिल्पकार बेकार हो गए। अब उनके सामने आजीविका का कोई साधन नहीं था। फलत: वे कृषि की ओर मुड़े। चूंकि इनका भू-स्वामित्व से संबंध नहीं था, अत: ये कृषि - मजदूर बन गए।

लगान की ऊंची रकम ने किसानों के सामने ऐसी परिस्थितियां पैदा कर दी जिसके कारण वे अधिक से अधिक ऋण लेने को विवश हुए। उन पर ऋण का बोझ इतना बढ़ गया कि ऋण की वसुली के लिए उन्हें अपनी जमीन बंधक रखनी पड़ी। अब जमीन के मालिक जमीन पर काम करने वाले मजदूर बन गए। इस प्रकार सरकारी नीति ने भी मजदूर वर्ग की संख्या को बढ़ाया-प्रत्यक्ष न सही परोक्ष रूप में ही।

भारत में कुटीर उद्योगों का पतन तो हुआ पर उसकी जगह औद्योगीकरण को बढ़ावा नहीं दिया गया। औद्योगीकरण हुआ भी तो भारत का नहीं इंग्लैंड का। इस प्रकार भारतीयों की कीमत पर अंग्रेजी की संपन्नता बढ़ी। वहां के लोगों को रोजगार मिला। भारतीयों को अगर कुछ मिला तो वह बेराजगारी का आलम और मजदूरी की विवशता।

सरकार का उत्तरदायित्व इस कारण भी है कि उसने बंजर भूमि को कृषि योग्य बनाने का प्रयास नहीं किया। कितनी जमीन बगैर जोते रह गई। सरकार ने इस भूमि पर कृषि कार्य आंरभ कराने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।

भारत में इस वर्ग के उदय का मुख्य कारण ब्रिटिश सत्ता ही थी। ब्रिटिश शासन में इनका काफी शोषण भी हुआ। यही कारण है कि जब राष्ट्रीय आंदोलन में इनका आहवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू वान किया गया तो इन्होंने इसमें बढ़चढ़ कर भाग लिया।

प्रमुख विचार

ये बाबू हैं जिन्हें हमीं ने शिक्षित किया ताकि वे देसी अखबारों में अर्द्ध-राजद्रोहपूर्ण लेख लिख सकें।

-लिटन

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