महत्वपूर्ण राजनीतिक दर्शन Part-9: Important Political Philosophies for NTSEfor NTSE

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स्शााेंधनवाद

संशोधनवाद का संबंध जर्मनी के ही एक दूसरे विचारक एडवर्ड बर्नस्टीन से है। बर्नस्टीन ने 1896 से 1898 के दौरान एक लेखमाला प्रकाशित की जिसमें उसका प्रमुख विचार था कि बदली हुई परिस्थितियों में मार्क्सवाद में कुछ संशोधन किए जाने चाहिए। लासाल ने मार्क्सवाद का विरोध नहीं किया था पर बर्नस्टीन ने बहुत से तर्क देकर साबित किया कि वर्तमान परिस्थितियों में मार्क्सवाद के कई विचार अप्रासंगिक हो गए हैं। उसने अपने विचार को ‘विकासवादी समाजवाद’ कहा और इसी शीर्ष से उसकी एक पुस्तक भी प्रकाशित हुई, पर मार्क्सवादियों ने उसकी आलोचना करते हुए उसे संशोधनवादी कहा और आगे चलकर यही नाम ज्यादा प्रसिद्ध हो गया।

बर्नस्टीन ने मार्क्सवाद की आलोचना तथा विकासात्मक समाजवाद के समर्थन में निम्नलिखित प्रमुख तर्क दिए-

  • मार्क्स ने अपने से पहले के समाजवादियों को स्वप्नदर्शी बताया और अपने विचार को वैज्ञानिक समाजवाद कहा जबकि सच यह है कि मार्क्स भी कुछ मामलों में स्वप्नदर्शी ही है। वह जिस तरह की आकस्मिक और वैश्विक क्रांति की कल्पना करता है, वह यथार्थवादी न होकर काल्पनिक अवधारणा ही है। निकट भविष्य में सर्वहारा क्रांति की कोई संभावना नहीं दिखाई पड़ती।
  • मार्क्स का दावा था कि पूंजीवाद जैसे-जैसे प्रबल होगा, वैसे-वैसे समाज का ध्रुवीकरण दो विरोधी वर्गो में होता जाएगा। सच यह है कि समाज में वर्ग विभेद बढ़ रहा है, ध्रुवीकरण नहीं। मध्यवर्ग जिस पर मार्क्स ने ध्यान नहीं दिया था, बढ़ते-बढ़ते समाज का सबसे बड़ा वर्ग बनने की ओर अग्रसर है।
  • मार्क्स का दावा था कि प्रतिस्पर्द्धा बढ़ने के साथ पूंजीपतियों की संख्या कम होती जाएगी, मजदूरों का शोषण बढ़ता जाएगा और वर्ग संघर्ष में तीव्रता आती जाएगी। सच यह है कि मजदूरों की स्थितियाँ सुधरती जा रही हैं, पूंजीपतियों की संख्या कम होने की बजाय बढ़ती जा रही है और वर्ग संघर्ष भी पहले की तुलना में कम ही हुआ है, ज्यादा नहीं।
  • मार्क्स का ‘अधिशेष मूल्य का सिद्धांत’ भी अव्यावहारिक है। कोई भी समाज मूल्य में होने वाली संपूर्ण वृद्धि मजदूर को नहीं सौंप सकता।
  • मजदूर वर्ग की तानाशाही को भी उचित नहीं माना जा सकता। कोई भी बहुसंख्यक वर्ग अगर अल्पसंख्यक वर्ग का दमन करता है तो यह अपने आप में गलत है। राज्य का उचित स्वरूप लोकतांत्रिक ही हो सकता है क्योंकि उसमें समाज के सभी वयस्क नागरिक निर्णयों में हिस्सेदार बनते हैं।
  • मार्क्स का यह विचार कि मजदूरों का कोई देश नहीं होता, अब निरर्थक हो गया है। जिस समय मजदूरों को राजनीतिक और वैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं थे, उस समय यह बात अर्थपूर्ण थी क्योंकि किसी भी राज्य में मजदूरों का शोषण ही होता था और उन्हें नागरिकों वाले अधिकार नहीं मिलते थे। अब मजदूरों को मताधिकार तथा अन्य सभी महत्वपूर्ण अधिकार मिल चुके हैं। इसलिए आज के समय में राष्ट्र के प्रति मजदूरों की भी वही जिम्मेदारी बनती है, जो कि पूंजीपतियों की।

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