समाज एवं धर्म सुधार आंदोलन (Society and Religion Reform Movement) Part 14 for PAR

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शिशु-हत्या पर रोक

शिशु-हत्या की प्रथा पर कंपनी का पहला आक्रमण हुआ। यह प्रथा मध्य भारत, पश्चिमी भारत में मेवातों, जाटों और राजपूतों में प्रचलित थी। 1775 ई. के बंगाल नियम 21 और 1804 ई. के नियम 3 ने क्रमश: शिशु-हत्या के दूसरे और पहले रूपों को रोक दिया। भारतीय रियासतों के रेजिडेन्टो (निवासी) को भी कहा गया कि वे रियासतों में इस कुप्रथा को बंद करने के प्रयत्न करें। इसके बाद 1870 ई. में इस प्रथा को रोकने के लिए कुछ और कानून बनाये गए।

नर-बलि का विरोध

भारतीय समाज में अंधविश्वास के कारण एक और बुरी प्रथा प्रचलित थी और वह थी नर-बलि प्रथा। इस प्रथा को दूर करने का श्रेय लॉर्ड हार्डिंग को प्राप्त है। उड़ीसा की खोड जाति में यह प्रथा प्रचलित थी। खोंडो का यह विश्वास था कि ऐसा करने से भूमि की उर्वरता बढ़ती है। हार्डिग के प्रयत्न के बावजूद यह प्रथा पूर्णत: बंद नहीं हो सकती, किन्तु 1847 से 1854 के बीच कैम्पबेल तथा अन्य अधिकारी इसी उद्देश्य से नियुक्त किए गए। उन्होंने इस निष्ठुर तथा नुशंस प्रथा का उच्छेद कर दिया।

सती-प्रथा पर रोक

कंपनी सरकार ने अदालत के निर्णय के अनुसार 1812 के कानून बनाया तथा 1815 और 1817 में उन्हें अन्य कानूनों से परिपुष्ट किया। इन कानूनों के दव्ारा गर्भवती और छोटे बच्चों वाली विधवाओं को सती होने से रोक दिया गया। इसी समय भारतीय समाज में ब्रह्य समाजी राजा राममोहन राय का आविर्भाव हुआ जिनके सहयोग से कंपनी सरकार को इस प्रथा को समूल नष्ट कर देने में सफलता मिली। विलियम बेंटिक ने शीघ्र ही दिसंबर, 1829 ई. में एक कानून बनाकर सती -प्रथा को अवैध तथा अदालतों दव्ारा दंडनीय करार दे दिया। गवर्नर (राज्यपाल) जनरल को धर्म प्रचारकों से इस कार्य में काफी संहयोग मिला।

हिन्दू पुनर्विवाह

भारतीय समाज का महिला जगत अनेक बुराइयों का शिकार था। बाल-विवाह बहु-पत्नी तथा विधवा समस्या, अशिक्षा आदि अनेक बुराइयाँ थी। कुछ बुराइयों को दूर करने का प्रयास किया गया। सती-प्रथा पर नियंत्रण कायम किया जा सकता, किन्तु इस प्रथा के बंद होते ही समाज में विधवाओं की संख्या बढ़ने लगी। विधवाओं का पुनर्विवाह संभव नहीं था, किन्तु बंगाल में ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने विधवाओं की दशा में सुधार लाने के लिए आंदोलन प्रारंभ किया और उन्होंने विधवा विवाह का समर्थन किया। सरकार ने विधवा-विवाह के लिए अधिनियम बनाये और 1856 के अधिनियम 15 से विधवा-विवाह को वैध मान लिया गया और उस विवाह से उत्पन्न हुए बालक वैध घोषित किए गए।

ठगी प्रथा का अंत

कंपनी काल का एक अन्य महान कार्य था-ठगो का दमन। सजा प्राप्त अपराधी ही गुप्त रूप से ठग बन जाते थे। ठगों का संगठित गिरोह था। ठगों का संगठन प्राय: संपूर्ण देश में फैल गया। ठगो के संगठित गिरोह के दमन करने का श्रेय लॉर्ड विलियम बेंटिक को प्राप्त है। उसने ठगो के विनाश के लिए सर विलियम स्लीमैन तथा अन्य अफसरों को नियुक्त किया और कई कानूनों का निर्माण किया। 1831-36 के अंतर्गत 3000 से भी अधिक ठग पकड़े गए। इस कड़ी कार्रवाई से ठगों का दमन हो गया और यात्रियों का जीवन सुरक्षित हो गया।

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