मध्यस्थता और सुलह संशोधन विधेयक 2015 (Arbitration and Reconciliation Amendment Bill, 2015)

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संशोधन की महत्वपूर्ण विशेषताएँ

• यह पक्षों को भारत से बाहर स्थिति अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक मध्यस्थता प्राप्त करने में सक्षम करता है और यदि विभिन्न पक्ष असहमत न हो तो वे भारतीय अदालतों में भी अंतरिम राहत प्राप्त करने के लिए पहुंच सकते हैं।

• मध्यस्थ न्यायाधिकरण को 12 महीने में अपना निर्णय दे देना होगा। विभिन्न पक्ष इस अवधि को छ: महीने तक बढ़ा सकते हैं। इसके बाद, इसकी अवधि को पर्याप्त कारण प्रस्तुत किए जाने पर केवल न्यायालय दव्ारा ही बढ़ाया जा सकता है।

• अवधि को बढ़ाने के दौरान न्यायालय मध्यस्थों के शुल्क में कमी करने का आदेश भी दे सकता है, यह कमी विलम्ब के प्रत्येक महीने के लिए पांच प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती और यदि मध्यस्थता की प्रक्रिया छ: महीने के अंदर पूरी हो जाती है तो दोनों पक्षों की सहमति से अतिरिक्त शुल्क प्रदान करने का प्रावधान भी किया गया है।

• मध्यस्था के संचालक के लिए एक फास्ट (तीव्र) ट्रैक (मार्ग) कार्यप्रणाली का भी प्रावधान किया गया है। इस प्रकार के प्रकरण के छ: महीने की अवधि में निर्णय देने होंगे।

• यह संशोधन मध्यस्थ के शुल्क पर एक उच्चतम सीमा निर्धारित करता है।

• यह विधेयक मध्यस्था न्यायाधिकरण को वे सभी अंतरिम उपाय प्रदान करने के लिए सशक्त करता है जो एक न्यायालय प्रदान कर सकता है।

• यह अदालतों को मध्यस्था निर्णय को रद्द करने का अधिकार देता है यदि वह भारत की लोक नीति के विरुद्ध है, अर्थात,

• वह भारतीय विधि के आधारभूत सिद्धांत का उल्लंघन हो

• या उस निर्णय का नैतिकता के विचार के साथ संघर्ष हो

मध्यस्था क्या है?

यह एक कार्यप्रणाली है जिसमें विभिन्न पक्षों की सहमति से एक या अधिक मध्यस्थों के सम्मुख विवाद प्रस्तुत किया जाता है, जो विवाद के विषय में बाध्यकारी निर्णय प्रदान करता/करते है/हैं। मध्यस्थता का चयन कर, विभिन्न पक्ष न्यायालय जाने के स्थान पर निजी विवाद समाधान प्रक्रिया का विकल्प चुनते हैं।

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