वर्दीधारी सेवाएं एवं महिलाएं (Uniformed Services and Women – Social Issues)

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§ पंजाब और हिरयाणा उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि गर्भावस्था के कारण महिलाओं को स्थायी रूप से सेना चिकित्सा कोर में सम्मिलित होने से नहीं रोका जा सकता है।

§ न्यायालय ने अपने निष्कर्ष में कहा कि बच्चे को जन्म देने और रोजगार ग्रहण करने के बीच विकल्प चुनने के लिए विवश करना महिला के प्रजनात्मक अधिकारों के साथ ही उसके रोजगार के अधिकार में हस्तक्षेप है और इस प्रकार की कार्रवाई के लिए “आधुनिक भारत में कोई स्थान नहीं है।”

§ सशस्त्र बल चिकित्सा सेवा महानिदेशालय का तर्क था कि यदि कोई महिला सशस्त्र सेवा में भर्ती होने की तिथि तक गर्भवती है, तो उक्त महिला को सेवा में भर्ती होने की अनुमति नहीं दी जा सकती और उसे बच्चे को जन्म देने के बाद पुन: प्रारंभ से पूरी प्रक्रिया से गुजरना होगा।

अन्य बलों में इसी प्रकार की परिपाटियां

§ भारत-तिब्बत सीमा पुलिस में लड़ाकू शाखा में कार्यरत वर्दीधारी महिला चिकित्सकों को बच्चे के जन्म के बाद सेवा मेें सम्मिलित होने के संदर्भ में पर्याप्त छूट प्रदान की गयी है।

§ गृह मंत्रालय के दिशा निर्देश भी प्रावधान करते हैं कि:

• महिलाओं को उन सभी सेवाओं, जिसमें शारीरिक प्रशिक्षण सम्मिलित नहीं है, के लिए गर्भावस्था के दौरान के दौरान भी सेवा के लिए रिपोर्ट (विवरण) करने हेतु फिट (स्वस्थ्य) माना जाना चाहिए।

• जबकि शारीरिक प्रशिक्षण वाली सेवाओं के मामलों में, रिक्ति वरिष्ठता के संरक्षण के साथ-साथ सुरक्षित रखी जानी चाहिए और महिलाओं को प्रसव के छह सप्ताह के बाद सेवा में सम्मिलित किया जाना चाहिए।

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