विरासत टैग भारत लाओस सांस्कृतिक संबंध (Heritage Tag India Laos Cultural Relations – Culture)

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• वर्ष 2012 में, संस्कृति मंत्रालय ने यूनेस्को के समक्ष दिल्ली के लिए सांस्कृतिक विरासत शहर का टैग (चिन्ह) प्राप्त करने का नामांकन दाखिल किया था, जिसे बाद में वापस ले लिया गया था।

• इसका कारण यह था की एक बार शहर के विरासत सूची में शामिल हो जाने के पश्चात शहर में निर्माण तथा भूमि उपयोग के प्रारूप में कोई भी परिवर्तन करना मुश्किल हो जाएगा।

• भारत यूनेस्को की करीब 1,000 विश्व विरासत स्थलों में से 32 विरासत स्थलों की भूमि है जिनमें से तीन लान किला, कुतुब मीनार और हुमायूं का मकबरा दिल्ली में है।

• लेकिन, दुनिया के प्रमुख 220 विश्व विरासत शहरों में से कोई भी भारत में नहीं है।

• भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) किसी भी भारतीय साइट चाहे वह सांस्कृतिक हो या प्राकृतिक को विश्व विरासत का दर्जा प्रदान करने के लिए कि अनुरोध अग्रेषित करने के लिए नोडल (ग्रंथि संबंधी) एजेंसी (संस्था) है। इसके दव्ारा किया गया अनुरोध केंद्र या राज्य सरकार की एजेंसियों (संस्थाओं) के साथ ही प्रबंधन न्यास आदि से प्राप्त प्रस्तावों पर आधारित होता है। पर्याप्त छानबीन के पश्चात सरकार संबंधित दस्तावेंजों को विश्व विरासत केंद्र के पास नामांकन के लिए भेजती है।

• एक विश्व विरासत स्थल (इमारत, शहर, संकुल, रेगिस्तान, जंगल, दव्ीप, झील, स्मारक, या पहाड़ हो सकता है।) है जिसे संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) दव्ारा विशेष सांस्कृतिक या भौतिक महत्व के स्थल के रूप सूचीबद्ध किया जाता है। सूची यूनेस्को की विश्व विरासत समिति दव्ारा प्रशासित अंतरराष्ट्रीय विश्व विरासत कार्यक्रम के अंतर्गत तैयार की जाती है। यूनेस्को की विश्व विरासत समिति यूनेस्को के 21 सदस्य देशों से मिलकर बनती है, जिनका चुनाव के महासभा दव्ारा किया जाता है।

भारत लाओस सांस्कृतिक संबंध (India Laos Cultural Relations – Culture)

• भारत और लाओस के बीच सांस्कृतिक संबंधों की पृष्टभूमि में भारतीय रीति रिवाजों, परंपराओं तथा धार्मिक विश्वासों और मान्यताओं को अपने में समेटे हुए सिंघली बौद्धधर्म की लाओस में स्थापना हुई।

• रामायण और महाभारत तथा पाली, प्राकृत और संस्कृत में सृजित कई साहित्यिक कृतियां साझी विरासत का हिस्सा बन गई।

• बौद्ध धर्म और हिन्दू धर्म के साथ ही जैन धर्म भी उसी गति से प्रचलित हुआ। यद्यपि विदव्ानों ने भारत-लाओस सांस्कृतिक संबंधों को जैन धर्म के दृष्टिकोण से अध्ययन नहीं किया है।

• चूंकि व्यापार भारतीय संस्कृति के प्रसार के लिए सबसे महत्वपूर्ण कारक था अत: व्यापारी समुदाय, जो ज्यादातर जैन थे के दव्ारा अवश्य जैन धर्म की मान्यताओं और तीर्थंकरों की पूजा को बढ़ावा दिया गया होगा दृष्टव्य है की बौध और जैन कला और स्थापात्य में कोई विशेष अंतर सामान्य: नहीं किया जा सकता।