महान सुधारक (Great Reformers – Part 26)

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सावित्री बाई फुले:-

सावित्री बाई फुले (1831-97) का जीवन एक स्त्री की जीवटता और मनोबल को समर्पित है। उन्होंने तमाम विरोध और बाधाओं के बावजूद अपने संघर्ष में डटे रहने तथा अपने धैर्य और आत्मविश्वास से महिलाओं में शिक्षा की अलख जगाने की महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे प्रतिभाशाली कवयित्री, आदर्श अध्यापिका, नि:स्वार्थ समाजसेविका और सत्य शोधक समाज का कुशल नेतृत्व करने वाली महान नेता थीं।

महाराष्ट्र के सतारा जिले में सावित्री बाई फुले का जन्म तीन जनवरी 1831 को हुआ। इनके पिता का नाम खंडीजी नवस पाटिल और माँ का नाम लक्ष्मी था। केवल नौ साल की आयु में उनका विवाह पूना के ज्योतिबा फुले के साथ हुआ। इसके बाद सावित्री बाई फुले का जीवन परिवर्तन आरंभ हो गया। वह समय दलितों और स्त्रियों के लिए नैराश्य और अंधकार का समय था। समाज में अनेक कुरीतियाँ फैली हुई थीं और नारी शिक्षा का प्रचलन नहीं था। विवाह के समय तक सावित्री बाई फुले की विद्यालय शिक्षा नहीं हुई थी और ज्यातिबा फुले तीसरी कक्षा तक पढ़ी थी लेकिन उनके मन में सामाजिक परिवर्तन की तीव्र इच्छा थी। इसलिये इस दिशा में समाज सेवा को जो पहला काम उन्होंने प्रारंभ किया, वह था अपनी पत्नी सावित्री बाई फुले को शिक्षित करना। सावित्री बाई फुले की भी बचपन से शिक्षा में रुचि थी और उनकी ग्राह्य शक्ति तेज थी। उन्होंने विद्यालय शिक्षा प्राप्त की और अध्यापन का प्रशिक्षण लिया।

सावित्री-ज्योतिबा दंपती ने इसके बाद अपना ध्यान समाज-सेवा की ओर केन्द्रित किया। जनवरी 1848 के उन्होंने पूना के बुधवारा पेठ में पहला बालिका विद्यालय खोला। सावित्री बाई फुले इस विद्यालय की प्रधानाध्यापिका बनी। इसी वर्ष उस्मान शेख के बाड़े में प्रौढ़-शिक्षा के लिए एक दूसरा विद्यालय खोला गया। दबी-पिछड़ी जातियों के बच्चे (विशेषरूप से लड़कियाँ) बड़ी संख्या में इन पाठशालाओं में आने लगे। इससे उत्साहित होकर फुले दंपती ने अगले चार वर्षों में ऐसे ही 18 विद्यालय विभिन्न स्थानों में खोले। स्त्रियों में शिक्षा प्रचारित करने के लिये सावित्री बाई फुले ने जहाँ स्वयं शिक्षिका बनकर पहल की वहीं उन्होंने महिला शिक्षकों की एक टीम (दल) भी तैयाार की। इसमें उन्हें फातिमा शेख नाम की एक महिला का भरपूर सहयोग मिला। शिक्षा विभाग में उन्हें शाल देकर सम्मानित किया। सावित्री बाई फुले का शिक्षिका के रूप में प्रभावी होने का असर उनके विद्यार्थियों पर भी हुआ। 1858 में उनकी एक ग्यारह वर्षीय छात्रा मुक्ताबाई में प्रभावशाली निबंध लिखा जिसमें उसने दलित समाज की व्यथा और ब्राह्यणी धरम पाखंड को प्रस्तुत किया। एक अन्य महिला ताराबाई शिंदे ने ’स्त्री पुरुष’ तुलना पर निबंध लिखा। कई विचारक ताराबाई शिंदे को देश की पहली महिला नारीवादी तक का दर्जा देते हैं।

फुले दंपती ने अब अपना ध्यान बाल-विधवा और बाल -हत्या पर केन्द्रित किया। हिन्दू विधवाएं जब घर से लांछित होकर बेघर कर दी जाती थीं तब उन्हें सहारा देने के उद्देश्य से फुले दंपती ने विधवा आश्रम की स्थापना की। सावित्री अपने सहयोगियों के साथ इन विधवाओं के प्रसव और देखभाल की जिम्मेदारी स्वयं ही उठाया करती थीं। उन्होंने विधवाओं को जबरन सर मुंडवाने के खिलाफ स्वयं मोर्चा खोला और 1860 में इस कर्म के खिलाफ सफल हड़ताल का आयोजन किया। सावित्री बाई फुले ने विधवा पुनर्विवाह में भी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया। 1873 में उन्होंने पहला विधवा विवाह करवा कर मानो सामाजिक क्रांति की शुरुआत कर दी। इसका धार्मिक स्तर पर कड़ा विरोध किया गया, पर फुले दंपती ने साहस नहीं छोड़ा। ये विवाह इस रूप में भी क्रांतिकारी थे कि इनमें पुरोहित को शामिल नहीं किया गया था। जोतीबा फुले ने अपने सत्यशोधक समाज के माध्यम से खुद विवाह विधि तैयार की थी जिसमें उन्होंने विवाह के लिए प्रयुक्त ’मत्रोच्चार’ जैसी प्रणाली ’मंगलाष्टक’ का निर्माण किया। इसमें स्त्री-पुरुष को एक समान और मित्रवत मानने की प्रतिज्ञा करवाई जाती थी, उस समय इस तरह की विधि पालन करवाया जाना एक बहुत बड़ा विद्रोही कदम था। वे चाहते थे कि विवाह विधि में पुरुष प्रधान संस्कृति के समर्थक और स्त्री की गुलामगिरी सिद्ध करने वाले जितने मंत्र हैं, वे सारे निकाल दिए जाए। उनके स्थान पर ऐसे मंत्र हो जिन्हें वर-वधु आसानी से समझ सके। ज्योतिबा के मंगलाष्टकों में वधु वर से कहती है- ”स्वतंत्रता का अनुभव हम स्त्रियों को ही नहीं। इस बात की आज शपथ लो कि स्त्री को उसका अधिकार दोगे और उसे अपनी स्वतंत्रता का अनुभव करने दोगे।” यह आकांक्षा सिर्फ वधु की ही नहीं, गुलामी से मुक्ति चाहने वाली हर स्त्री की थी।

1853 में उन्होंने बाल-हत्या प्रतिबंधक-गृह की स्थापना की। इसमें विधवाएँ अपने बच्चों को जन्म दे सकती थीं और यदि वे शिशु को अपने साथ न रख सके तो उन्हें यहीं छोड़कर भी जा सकती थी। इस अनाथलय की संपूर्ण व्यवस्था सावित्री बाई फुले संभालती थीं और बच्चों का पालन पोषण माँ की तरह करती थीं। उनका ध्यान खेत-खलिहानों में काम करने वाले अशिक्षित मजदूरों की ओर भी गया। 1855 में ऐसे मजदूरों के लिए फुले दंपती ने रात्रि-पाठशाला खोली। उस समय अस्पृश्य जातियों के लोग सार्वजनिक कुएँ से पानी नहीं भर सकते थे। अत: फुले दंपती ने अपने घर का कुँआ सर्वसाधारण के लिए खोल दिया। सन्‌ 1876-77 में पूना नगर अकाल की चपेट में आया गया। उस समय फुले दंपती ने 52 विभिन्न स्थानों पर अन्न-छात्रावास खोले और गरीब जरूरतमंद लोगों के लिये मुफ्त भोजन की व्यवस्था की।

फुले दंपती ने हर स्तर पर कंधे-से-कंधा मिलाकर काम किया और कुरीतियों, अंध श्रद्धा और पारंपरिक अनीतिपूर्ण रू़ढ़यों को ध्वस्त कर गरीबो-शोषितों के हित में खड़े हुए। 1840 से 1890 तक फुले दंपती ने एक प्राण होकर समाज सुधार के अनेक कामों को पूरा किया। वे संतानहीन थे। उन्होंने 1874 में काशीबाई नामक एक विधवा ब्राह्यणी के नाजायज बच्चे को गोद लिया। यशवंतराव फुले नाम से यह बच्चा पढ़-लिखकर डॉक्टर (चिकित्सक) बना। 1890 में महात्मा ज्योति फुले के निधन के बाद सावित्री बाई ने बड़ी मजबूती के साथ इस आंदोलन की जिम्मेदारी संभाली और महाराष्ट्र के सत्य-शोधक समाज के अधिवेशन में ऐसा भाषण दिया जिसमें दबे-पिछड़े लोगों में आत्म-सम्मान की भावना भर दी। सावित्री बाई का दिया गया यह भाषण उनके प्रखर क्रांतिकारी और विचार-प्रवर्तक होने का परिचय देता है।

1897 में जब पूना में प्लेग फैला तब वे अपने पुत्र के साथ लोगों की सेवा में जुट गई। सावित्री बाई की आयु उस समय 66 वर्ष की हो गई थी। फिर वे निरंतर श्रम करते हुए तन-मन से लोगों की सेवा में लगी रहीं। इस कठिन श्रम के समय उन्हें भी प्लेग ने भर दबोचा और 10 मार्च 1897 में उनका निधन हो गया।

सवित्री बाई का सर्वाधिक विरोध महिलाओं दव्ारा ही हुआ, जो न सिर्फ उन्हें तरह-तरह के ताने मार के प्रताड़ित किया करती थीं, बल्कि उनमें से कई महिलाएं तो सावित्री बाई फुले के विद्यालय आते-जाते समय उन पर गोबर और पत्थर तक फेंका करती थीं। ऐसे में उनका कपड़ा और चेहरा गंदा हो गया करता था। पर उन्होंने बिल्कुल भी हिम्मत नहीं हारी और उल्टा इन सबको मुंह तोड़ जवाब देते हुए अपने साथ एक साड़ी ले जाने लगी जिसे वह विद्यालय जाकर पहन लिया करती थी तथा वापिस आते समय फिर वही गंदी साड़ी बदल लिया करती थींं सावित्री ने न सिर्फ भारत की पहली महिला शिक्षिका थी बल्कि उनकी लेखनी भी बेहद प्रभावी थी। 1854 में उनका पहला संग्रह ’काव्य फुले’ प्रकाशित हुआ जो अपने किस्म का पहला ऐतिहासिक साहित्य सिद्ध हुआ क्योंकि इसमें उन्होंने मराठी के प्रचलित अभंगो की ही शैली में अपने काव्य को प्रस्तुत किया जिसमें उनकी भाषा सरल और प्रभावी थी। इसमें कुछ कवितायें जहाँ प्रकृति पर थीं वहीं अधिकांश कविताओं में शिक्षा, जाति व्यवस्था और गुलामी की समस्याओं को उठाया गया था। इस संग्रह को आज मराठी साहित्य का आधार माना जाता है। उनका एक महत्वपूर्ण काव्य संग्रह महात्मा फुले की जीवनी पर था, जो बावन काशी सुबोध रत्नाकर नाम से प्रकाशित हुआ। इन रचनाओं के अलावा सावित्री बाई फुले ने कुछ किताबों का संपादन भी किया। इनमें चार पुस्तकें ज्योतिबा के भारतीय इतिहास पर व्याख्यान विषय पर थीं। 1852 में उन्होंने खुद के भाषणों का भी संपादन किया। अपने एक निबंध ’कर्ज’ में सावित्री बाई लिखती हैं की त्यौहारों और कर्मकांडों को मनाने के लिए कर्ज लेना सबसे बड़ी बेवकूफी है क्योंकि इससे तथाकथित परलोक तो नहीं सुधरने वाला बल्कि कर्ज में डूबने से जिन्दगी ही बर्बाद होगी।

वे कहा करती थी ”कड़ी मेहनत करो, अच्छे से पढ़ाई और अच्छा काम करो।” उन्होंने उस समय ही यह जान लिया था कि दलित-बहुजनों की प्रगति का सबसे बड़ा आधार अंग्रेजी भाषा ही हो सकती है। इसलिए उन्होंने अंग्रेजी को मुक्ति दायिनी माता कहा और अंग्रेजी का महत्व उजागर करते हुए उन्होंने ’माँ अंग्रेजी’ शीर्षक से एक कविता भी लिखी जिसमें उन्होंने बताया कि पेशवा राज की समाप्ति और अंग्रेजो का भारत का आगमन दलित-बहुजनों (अनुसूचित जाति/जनजाति और ओबीसी) के लिए कितना लाभदायक रहा।

गौरतलब है कि सदियों से भारत में जहाँ दलितों की सार्वजनिक स्थानों पर चलने तक का अधिकार नहीं था वहीं भारत में अंग्रेजी राज स्थापित होने के बाद दलितों को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के नए अवसर मिलने लगे थे।

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