महान सुधारक (Great Reformers – Part 28)

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पंडित मदन मोहन मालवीय:-

मदनमोहन मालवीय (25 दिसंबर, 1861-12 नवंबर, 1946) महान स्वतंत्रता सेनानी, राजनीतिज्ञ और शिक्षाविद ही नहीं, बल्कि एक बड़े समाज सुधारक भी थे। इलाहाबाद में जन्में पंडित मदन मोहन मालवीय अपने महान कार्यो के चलते ’महात्मा’ कहलाये। शिक्षा ग्रहण करने के बाद उन्होंने अध्यापन का कार्य शुरू किया। शीघ्र ही 1893 ई. में उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट (उच्च न्यायालय) में बतौर वकील के रूप में कामकाज प्रारंभ कर दिया। प्राचीन संस्कृति के घोर समर्थक मालवीय जी समाचार पत्रों दव्ारा जनता में प्रचार करने में बहुत विश्वास रखते थे। उन्होंने तीन पत्रों-हिन्दुस्तान, इंडियन (भारतीय) यूनियन (संघ) तथा अभ्युदय का संपादन किया। ’लीडर’ (नेता) और ’हिन्दुस्तान टाइम्स’ की स्थापना का श्रेय भी मालवीय जी को ही जाता है। ’मर्यादा पत्रिका’ ’लीडर’ के हिन्दी संस्करण ’भारत’ का आरंभ 1921 में हुआ और ’हिन्दुस्तान टाइम्स’ का हिन्दी संस्करण ’ हिन्दुस्तान’ भी वर्षों से निकल रहा है। इनकी मूल प्रेरणा में मालवीय जी ही थे।

1906 ई. में इलाहाबाद के कुम्भ के अवसर पर उन्होंने सनातन धर्म का विराट अधिवेशन कराया, जिसमें उन्होंने ’सनातन धर्म-संग्रह’ नामक एक वृहद ग्रंथ तैयार कराकर महासभा में उपस्थित किया। कई वर्ष तक उस सनातन धर्म सभा के बड़े-बड़े अधिवेशन मालवीय जी ने कराये। अगले कुंभ में त्रिवेणी के संगम पर इनका सनातन धर्म सम्मेलन भी इस सभा से मिल गया। सनातन धर्म सभा के सिद्धांतों के प्रचारार्थ काशी से 20 जुलाई, 1933 ई. को मालवीय जी की संरक्षता में ’सनातन धर्म’ नामक साप्ताहिक पत्र भी प्रकाशित होने लगा।

वे विविध सम्मेलनों, सार्वजनिक सभाओं आदि में भी भाग लेते रहे। उनके ’सनातन धर्म सभा’ के नेता होने के कारण देश के विभिन्न भागों में जितने भी सनातन धर्म महाविद्यालयों की स्थापना हुई, वह मालवीय जी की सहायता से ही हुई इनमें कानपूर, लाहौर, अलीगढ़ आदि स्थानों के सनातन धर्म महाविद्यालय उल्लेखनीय हैं।

आर्य समाज के प्रवर्तक तथा अन्य कार्यकर्ताओं ने हिन्दी की जो सेवा की थी, मालवीय जी उसकी कद्र करते थे। किन्तु धार्मिक और सामाजिक विषयों पर उनका आर्य समाज में मतभेद था। उन्होंने समाचार पत्रों के माध्यम से हिन्दी के उत्थान के लिए बहुत प्रयास किये। वह कर्मकांड, रीतिरिवाज, मूर्तिपूजन आदि को वे हिन्दू धर्म का मौलिक अंग मानते थे। इसलिए धार्मिक मंच पर आर्यसमाज की विचार धारा का विरोध करने के लिए उन्होंने जनमत संगठित करना आरंभ किया। इन्हीं प्रयत्नों के फलस्वरूप पहले ’भारतधर्म महामंडल’ और बाद में ’अखिल भारतीय सनातन धर्म’ सभा की नींव पड़ी।

मालवीय जी ने हिन्दी की सबसे बड़ी सेवा यह की कि उन्होंने उत्तर प्रदेश की अदालतों और कार्यालयों में हिन्दी को व्यवहार योग्य भाषा के रूप में स्वीकृत कराया। इससे पहले केवल उर्दू ही सरकारी कार्यालयों और अदालतों की भाषा थी। यह आंदोलन उन्होंने 1890 ई. में आरंभ किया था। 1900 ई. में गवर्नर (राज्यपाल) ने उनका आवेदन पत्र स्वीकार किया और इस प्रकार हिन्दी को सरकारी कामकाज में हिस्सा मिला। 1893 ई. में मालवीय जी ने काशी नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना में पूर्ण योग दिया। वे सभा के प्रवर्तकों में से थे और आरंभ से ही सभा को उनको सहायता का संबल रहा। सभा के प्रकाशन, शोध और हिन्दी प्रसार-कार्य में मालवीय जी की रुचि बराबर बनी रही और अंतिम समय तक वे उसका मार्गदर्शन करते रहे।

1910 ई. में उनकी सहायता से इलाहाबाद में ’अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ की स्थापना हुई। उसी वर्ष अक्टूबर में सम्मेलन का प्रथम अधिवेशन काशी में हुआ जिसके सभापति मालवीय जी थे। मालवीय जी विशुद्ध हिन्दी के पक्ष में थे। वे हिन्दी और हिन्दुस्तानी को एक नहीं मानते थे।

1902 ई. में मालवीय जी उत्तर प्रदेश ’इंपीरियल (शाही) लेजिस्लेटिव (विधायी) काउंसिल’ (परिषद) के सदस्य और बाद में सेंट्रल (केन्द्र) लेजिस्लेटिव (विधायी) असेंबली (सभा) ’ के सदस्य चुने गये। प्रारंभ से ही मालवीय जी राजनीति में रुचि लेने लगे और कांग्रेस की अध्यक्षता भी की। वह तीन बार हिन्दू महासभा के अध्यक्ष चुने गये। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि 1915 ई. में ’काशी हिन्दू विश्वविद्यालय’ की स्थापना रही। मालवीय जी ने गांधी जी के असहयोग आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया।

1928 में उन्होंने लाला लाजपत राय, जवाहर लाल नेहरू और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों के साथ मिलकर साइमन कमीशन (आयोग) का जबर्दस्त विरोध किया और इसके खिलाफ देशभर में जनजागरण अभियान भी चलाया। महामना तुष्टीकरण की नीतियों के खिलाफ थे। उन्होंने 1916 के लखनऊ पैक्ट (संधि) के तहत मुसलमानों के लिए अलग, निर्वाचक मंडल का विरोध किया। उन्होंने 1931 में पहले गोलमेज सम्मेलन में देश का प्रतिनिधित्व किया।