महान सुधारक (Great Reformers – Part 35)

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अमर्त्य सेन:-

प्रो. (प्राध्यापक) अमर्त्य सेन का जन्म 3 नवंबर, 1933 को कोलकता शहर के शांति निकेतन नामक स्थान में हुआ था। उनके पिता ’आशुतोष सेन’ ढाका विश्विविद्यालय में रसायन शास्त्र के अध्यापक थे। कोलकता के शांति निकेतन और ’प्रेसीडेंसी (राष्ट्रपति) महाविद्यालय से शिक्षा पूर्ण करके उन्होंने कैम्बिज के ट्रिनीटी महाविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। अमर्त्य सेन हावर्ड विश्वविद्यालय में प्राध्यापक है। वे जादवपुर विश्वविद्यालय दिल्ली विद्यालय ऑफ (का) इकोनॉमिक्स (अर्थशास्त्र) और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में भी शिक्षक रहे हैं। सेन ने एम.आई. टी. स्टैनफोर्ड, बर्कली और कॉरनेल विश्विविद्यालयों में अतिथि अध्यापक के रूप में भी शिक्षण कार्य किया है।

दव्तीय पंचवर्षीय योजना में सेन ने महत्वपूर्ण योगदान किया। प्रो. के. एन. राज के साथ मिलकर ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक (अर्थशास्त्र) पेपर्स (कागज) (फरवरी, 1961) में ’अल्टरनेटिव (विकल्प) पैटर्न्‌स (आकार) ऑफ (का) ग्रोथ (विस्तार) अंडर (के अंतर्गत) कंडीशंस (हालात) ऑफ (का) स्टैगनैंट (ठहरा हुआ) एक्सपोर्ट (निर्यात) अनिंग्स’ नामक एक शोध निबंध प्रकाशित किया जिसमें महालनोविस-के-विभागीय मॉडल (आदर्श) की कमजोरियों को दूर करने के लिए चार विभागों वाला वैकल्पिक मॉडल पेश किया जिसे ’राज सेन मॉडल’ के नाम से जाना गया। वर्ष 1960 में उन्होंने भारतीय आर्थिक इतिहास के अध्ययन की ओर अपना रुख किया। सेन के अनुसार अपवादों को छोड़ दे ंतो भारत मेें प्रत्यक्ष विदेशी निवेश उन्हीं क्षेत्रों में गया जो मुख्तया ब्रिटेन के अपने विकास के लिए अधिक लाभदायी थे। इन क्षेत्रों में उत्पादित वस्तुओं का निर्यात ब्रिटेन तथा अन्य विकसित देशों को किया जाता था। इन क्षेत्रों से चाय, कॉफी, कोयला तथा अन्य खनिज पदार्थ, जूट की वस्तुएं आदि आती थी। इनके निर्यात को बढ़ावा देने के लिए रेलवे तथा बैंको (अधिकोषों) का विकास आवश्यक था। इसलिए ब्रिटिश पूंजी उनमें भी गई। दूसरी, सेन इस तर्क को अस्वीकार कर दिया कि स्थानीय उपभोक्ताओं की गरीबी तथा निजी मुनाफा की प्रवृत्ति के बेरोकटोक काम करने के कारण ही ब्रिटिश पूंजी का वर्चस्व बढ़ा। तीसरी, भारत में ब्रिटिश निवेश की संरचना को मात्र मुनाफा दायकता की दृष्टि से उपलब्ध आँकड़ों के आधार पर नहीं समझा जा सकता। इसे समझने के लिए भारत के प्रति ब्रिटिश सरकार की नीतियों, ब्रिटिश पूंजीपति वर्ग के हितों तथा सामाजिक बनावट और आचरण पर ध्यान देना होगा।

सेन ने अपने लेखो में संवृद्धि की आवश्यकता पर जोर देने के साथ बेराजगारी के उन्मूलन को प्राथमिकता देने की बात की। बेरोजगारी उन्मूलन के लिए केवल नए ज्ञान और प्रौद्योगिकी की ही जरूरत नहीं है बल्कि भारत जैसे देश में उत्पादन से जुड़े वर्तमान ज्ञान और प्रौद्योगिकी को समुचित सांस्थानिक प्रोत्साहन एवं उत्पादन के कारणों तथा उत्पादों सहित कीमतों के जरिए बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

सेन ने भारत में रोजगार के तीन पहलुओं पर ध्यान देने की बात की-आय पक्ष, उत्पादन पक्ष और सम्मान पक्ष। रोजगारमुक्त व्यक्ति को आत्मसम्मान तथा सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। विदित है कि जिस व्यक्ति को उसकी योग्यता और क्षमता की दृष्टि से घटिया रोजगार मिलता है वह हीनभाव से ग्रस्त हो जाता है। अत: रोजगार की आयदयी ही नहीं बल्कि उसे पाने वाले की अपक्षाओं के अनुकूल भी होना चाहिए। सेन दव्ारा रोजगार के सम्मान पक्ष का विश्लेषण सारगर्भित है। उन्होंने महिला श्रम के प्रति बदलते दृष्टिकोण की भी चर्चा की है। सेन के अनुसार चार प्रकार के संरचनात्मक कारक जैसे प्रौद्योगिकीय संभावनाएँ सांस्थानिक तत्व, राजनीतिक व्यावहारिकता तथा आचरण संबंधी विशेषताएँ सही रोजगार नीति-निधार्रण में बाधक हो सकते हैं।

सेन ने अकाल, उसके बदलते चरित्र और उसके कारणों पर विस्तार से प्रकाश डाला है। कोई जमाना था जब अकाल स्थानीय होते थे। यातायात और परिवहन की कठिनाइयों के कारण कहीं अकाल की स्थिति होती थी तो कहीं अनाज की बहुतायत। इसमें धनी-गरीब साथ पीड़ित होते थे।

ब्रिटिश शासन की स्थापना के बाद अकाल का अर्थ खाद्यान्नों का निरपेक्ष नहीं, बल्कि सापेक्ष अभाव हो गया। बाजार में खाद्यान्न रहते थे परन्तु कीमतें इतनी चढ़ जाती थी कि उनको खरीद पाना अधिकतर लोगों के लिए असंभव हो जाता था। अत: कार्यशक्ति पर्याप्त न होने पर लोग भुखमरी के शिकार होने लगे। इस प्रकार अकाल दरिद्रता का ही एक पहलू बन गया। सेन ने 1981 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ’पावर्टी (दरिद्रता) एंड (और) फेमिंस (अकाल)’ में इंटाइटलमेंट (पात्रता) अप्रोच (पहुंच) ’ सिद्धांत रखा। सेन ने कहा कि अकाल न पड़े इसके लिए आवश्यक है कि हकदारी की विफलता का सामना किसी को नहीं करना पड़े। इसके लिए आवश्यक है कि संपत्ति संबंधों में आमूल परिवर्तन होने के साथ साक्षरता, शिक्षा तथा स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं प्रदान कर हकदारी की विफलता या समाप्ति से लोगों की रक्षा की जाए। सेन माओकालीन चीन में आए। अकाल को मानव इतिहास का सबसे बड़ा अकाल कहा जिसमें एक करोड़ 16 लाख लोग मरें। इसी दौरान भारत में अनेक बार अभाव की स्थितियाँ पैदा हुई और 1967 में बिहार में अकाल पड़ा परन्तु चीन जैसी त्रासदी नही दिखी। सेन के अनुसार, भारत में जनतंत्र होने के कारण स्थिति पर परदा नहीं डाला जा सका परन्तु चीन में जनतंत्र और वोट (मत) की राजनीति से जुड़ी कोई मजबूरी न थी।

सेन नवउदारवादी भूमंडलीकरण के विरोधी हैं। वे ट्‌िकल डाउन को ठुकरातेे हैं। वे भारत के संदर्भ में भूमि सुधार पर जोर देते हैं। अमर्त्य सेन मोटे तौर पर भूमंडलीकरण, उदारीकरण, निजीकरण के ”आर्थिक सुधारो’ से सहमत हैं पर साथ ही वह यह भी चाहते हैं कि पूंजीवादी सरकारें सामाजिक सुरक्षा कल्याणकारी योजनाओं में भी पैसा खर्च करें। सेन मनरेगा, खाद्य सुरक्षा बिल जैसी योजनाओं को चलाने के पक्ष में हैं। वे चाहते हैं कि सरकार गरीबी उन्मूलन, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि की सामाजिक मदों में अपने खर्चों को बढ़ायें जिससे लोगों का जीवनस्तर और कार्य क्षमता सुधरे वरना इसके बिना तेज आर्थिक विकास दर हासिल नहीं हो पायेगी।

अमर्त्य सेन का कहना है कि पहली प्राथमिकता सामाजिक विकास या संजीव पुनर्वितरण या ’एक्टिव रिडिस्ट्रीब्यूशन’ होना चाहिये और सरकार को शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी उन्मूलन आदि कार्यक्रमों को हाथ में लेना चाहिए। वे विकास दर के ऊपर सामाजिक विकास को प्राथमिकता देते हैं। सेन ने अकाल व गरीबों पर काफी अध्ययन किया है। वे कहते हैं कि यह जरूरी नहीं कि भोजन की पर्याप्त मात्रा समाज में उपलब्ध होने के बावजूद गरीबों को भोजन मिल ही जायेगा क्योंकि जमाखोरी,, महँगाई आदि के कारण हो सकता है कि गरीब आबादी भोजन खरीद ही ना सके। इसलिये ये सरकार से मांग करते हैं कि सरकारें वितरण (उपभोक्ता सामग्री के) के क्षेत्र में हस्तक्षेप करें।

सेन के अनुसार पूंजीवाद में सारी समस्या वितरण के क्षेत्र में है ना कि उत्पादन के क्षेत्र में। इसलिये वे वितरण तंत्र को ठीक करने पर जोर देते है जिसका नतीजा उनके ’एक्टिव रिडिस्ट्रीब्यूशन’ के रूप में सामने आता है। सेन पूंजीवाद को सही मानते हुए उसके सुधरे हुए स्वरूप के समर्थक हैं। सेन एक खराब वितरण तंत्र वाली प्रणाली से असहमत है। भारत में होने वाले ’आर्थिक सुधारों’ से मोटे तौर आमर्त्य सेन स्वयं सहमत हैं वे चाहते हैं कि निजी पूंजी के आगे कुछ रोक लगे। भूमंडलीकरण, उदारीकरण, निजीकरण के इन आर्थिक सुधारों को अमर्त्य सेन धीरे-धीरे व सामाजिक सुरक्षा के साथ लागू करने के पक्षधर हैं।