महान सुधारक (Great Reformers – Part 4)

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भगत सिंह:-

भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर, 1907 को पंजाब के लायलपुर जिला में बंगा गांव (पाकिस्तान) में एक देशभक्त सिख परिवार में हुआ था। उनके परिवार में पहले से ही उनके चाचा अजित सिंह और स्वर्ण सिंह अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन चला चुके थे। वे 14 वर्ष की आयु से ही पंजाब की क्रांतिकारी संस्थाओं में कार्य करने लगे थे। डी.ए.वी. विद्यालय से उन्होंने नोवी की परीक्षा उत्तीर्ण की। 1923 में इंटरमीडियट (मध्यम) की परीक्षा पास करने के बाद उन्हें विवाह बंधन में बांधने की तैयारियां होने लगी तो वे लाहौर से भागकर कानपूर आ गये। कानपुर में उन्हें श्री गणेश शंकर विद्यार्थी का हार्दिक सहयोग भी प्राप्त हुआ। देश की स्वतंत्रता के लिए अखिल भारतीय स्तर पर क्रांतिकारी दल का पुनर्गठन करने का श्रेय भगत सिंह को ही जाता है। उन्होंने कानपुर के ’प्रताप’ में बलवंत सिंह के नाम से तथा दिल्ली में ’अर्जुन’ के संपादकीय विभाग में अर्जुन सिंह के नाम से कुछ समय काम किया और स्वयं को नौजवान भारत सभा से भी सम्बद्ध रखा।

महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर 1921 में भगत सिंह ने विद्यालय छोड़ दिया। असहयोग आंदेलन से प्रतिनिधि छात्रों के लिए लाला लाजपत राय से लाहौर में ’नेशनल (राष्ट्रीय) कॉलेज’ (महाविद्यालय) की स्थापना की थी। इसी कॉलेज (महाविद्यालय) में भगत सिंह ने भी प्रवेश लिया। ’पंजाब नेशनल कॉलेज’ में उनमें देशभक्ति की भावना फलने-फूलने लगी। इसी कॉलेज में ही यशपाल, भगवती सुखदेव, नाथुराम, झण्डा सिंह आदि क्रांतिकारियों से भगत सिंह का संपर्क हुआ। कॉलेज में एक नेशनल नाटक क्लब (मंडल) भी था। इसी क्लब के माध्यम से भगत सिंह ने देशभक्तिपूर्ण नाटकों में अभिनय भी किया। वे ’चन्द्रशेखर आजाद’ जैसे महान क्रांतिकारी के संपर्क में आये और बाद में उनके प्रगाढ़ मित्र बन गये। 1928 में ’सॉडर्स हत्याकांड’ के वे प्रमुख नायक थे। 8 अप्रेल 1929 का ऐतिहासिक ’असेम्बली बमकांड’ के भी वे प्रमुख अभियुक्त माने गये। जेल में उन्होंने 64 दिन लंबी ऐतिहासिक भूख हड़ताल भी की थी। 23 मार्च, 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू को फांसी पर लटका दिया गया। वास्तव में इतिहास का अध्याय ही भगतसिंह के साहस, शौर्य, दृढ़ संकल्प और बलिदान की कहानियों से भरा पड़ा है।

भगत सिंह का मानना था कि आजाद भारत में शासन की बागडोर पूंजीपतियों व जमींदारों के हाथों में न होकर मेहनतकस श्रमिकों व किसानों के, हाथों में होनी चाहिए। हिन्दुस्तान सोशलिस्ट (सामाजिक) ऐसोसिएशन (संगति) के घोषणापत्र में उन्होंने स्पष्ट रूप से लिखा कि ”भारत सामन्यवाद के जुए के बीच पिस रहा है। इसमें करोड़ों लोग आज अज्ञानता और गरीबी के शिकार हो रहे है। वहां की बड़ी जनसंख्या जो मजदूरों और किसानों की है, उनकी विदेशी दबाव एवं आर्थिक लूट ने पस्त कर दिया है। भारत के मेहनतकस युग के हालत आज बहुत गंभीर है। इसके सामने दोहरा खतरा है। पहला, विदेशी पूंजीवाद का और दूसरा, भारतीय पूंजीवाद के धोखे भरे हमले का। भारतीय पूंजीवाद विदेशी पूंजी के साथ हर रोज बहुत से गठजोड़ कर रहा है। कुछ राजनीतिक नेताओं का डोमेनियन (प्रभुता संपन्न) का दर्जा स्वीकार करना भी हवा के इसी रूख को स्पष्ट करता है।”

भगत सिंह का मानना था कि ”इंकलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है।” अपने क्रांतिकारी विचारों के प्रचार के लिए ही उन्होंने ब्रिटिशकालीन संसद में एक ऐसा बम फेंका, जिससे एक भी व्यक्ति हताहत नहीं हुआ, लेकिन उसके धमाके की आवाज लंदन तक पहुंची तथा ब्रिटिश सत्ता र्थरा उठी। उन्होंने संसद में उस दिन पेश होने वाले मशहूर विरोधी ’ट्रेड (व्यापार) डिसप्यूट (विवाद) बिल’ के नारे लगाये तथा अपने परने में लिखांं कि हम देश की जगता की आवाज अंग्रेजो के उन कानों तक पहुंचाना चाहते है, जो बहरे हो चुके हैं।

उन्होंने अपनी शहादत से पहले 2 फरवरी 1931 को ”क्रांतिकारी कार्यक्रम का मसविदा।” तैयार किया, जिसके कुछ अंश फांसी लगाये जाने के बाद लाहौर के ”द (यह) पीपुल (लोग)” में और इलाहाबाद के ’अभ्युदय’ में प्रकाशित हुए थे। इस महत्वपूर्ण दस्तावेज में उन्होंने भारत में क्रांति की व्याख्या करते हुए भविष्य की रूपरेखा तैयार की, जिसमें सामंतवाद की समाप्ति, किसानों के कर्ज समाप्त करना, भूमि का राष्ट्रीयकरण व साझी खेती करना, आवास की गारंटी (विश्वास), कारखानों का राष्ट्रीयकरण, आम शिक्षा, काम के घंटे जरूरत के अनुसार कम करना आदि बुनियादी काम बताये गये।

भगत सिंह का मानना था कि एक जुझारू व मजबूत क्रांतिकारी पार्टी के बिना देश में आमूलचूल परिवर्तन असंभव है। उनका मानना था कि क्रांतिकारी पार्टी के अभाव में पूंजीपति, जमींदार और उनके मध्यवर्गीय टटंपूजिये नेता व नौकरशाह किसी भी कीमत पर श्रमिकों का शासन पर नेतृत्व स्वीकार नहीं करेंगे। उन्होंने देश के छात्रों व नौजवानों के नाम जेल से भेजे गये पत्र में आह्वान किया कि वे एक खुशहाल भारत के निर्माण के लिए त्याग और कुर्बानियों के रास्ते को चुनें। उस पत्र की ये पंक्तियां आज भी शहीद भगत सिंह के विचारों की क्रांतिकारी मशाल को देश के युवाओं दव्ारा संभाले जाने की। अपील करती हुई प्रतीत होती है- ”इस समय हम नौजवानों से यह नहीं कह सकते कि वे बम और पिस्तौल उठाये। आज विद्यार्थियों के सामने इससे भी महत्वपूर्ण काम है- क्रांति का यह संदेश देश के कोने-कोन में पहुँचाना। फैक्ट्री (गोदाम) -कारखानों, गंदी बस्तियों और गांवो को जर्जर झोपड़ियों में रहने वाले करोड़ों लोगों में इस क्रांति की अलख जगानी है, जिससे आजादी आयेगी और तब एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य से शोषण असंभव हो जायेगा।”