इंडियन (भारतीय) वेर्स्टन (पश्चिमी) फिलोसोपी (दर्शन) (Indian Western Philosophy) Part 12 for Arunachal Pradesh PSC

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(जे.एस. मिल) का उपयोगितावाद

  • जे.एस. मिल का उपयोगितावाद वेंथम के उपयोगितावाद का अगला चरण है वेंथम के सिद्धांत में जो तार्किक कमियां रह गयी थी। मिल ने उन्हें दूर करने की गंभीर रूप से कोशिश की, वे अधिकांश बिन्दुओं पर वेंथम से सहमत है, कुछ ही बिन्दुओं पर विरोध के मुद्दे में हैं।

  • वेंथम की तरह मिल भी मनोवैज्ञानिक तथा नैतिक सुखवाद के समर्थक है वेंथम ने मनोवैज्ञानिक सुखवाद के पक्ष में कोई प्रमाण नहीं दिया लेकिन मिल ने ऐसी कोशिश की है, उसका कथन है- कोई वस्तु वांछनीय है इसे प्रमाणित करने का वास्तविक प्रमाण ही हो सकता है लोग वास्तव में उसकी ईर्ष्या करते है, प्रत्येक व्यक्ति जहाँ तक सुख को प्राप्त समझता है, वहाँ तक उसके लिए प्रयास करता है, यही मनोवैज्ञानिक सुखवाद का प्रमाण है।मनोवैज्ञानिक सुखवाद के आधार पर मिल ने वेंथम की तरह नैतिक सुखवाद को भी स्वीकार किया है उनकी सुख एकमात्र स्वत: शुभ है ताकि जो कुछ भी शुभ है, वह सुख के साधन के रूप में हैं, वस्तु उतनी शुभ है जिस अनुपात में वह सुख उत्पन्न करती है।

मिल ने अधिकतम व्यक्तियों के अधिकतम सुख को प्रमाणित करने के लिए एक तर्क दिया है जो इस प्रकार है-”प्रत्येक व्यक्ति का सुख उसके लिए शुभ है अत: सामान्य सुख व्यक्तियों के समुच्चय के लिए शुभ है।

  • मिल ने सुखो मेंं गुणात्मक भेद को माना है और इस बिन्दु पर वह वेंथम और अरिस्टीिपश से अलग है, इस संबंध में उनके प्रमुख विचार निम्न हैं-

  • सुखों में सिर्फ मात्रात्मक अंतर करना पर्याप्त नहीं हैं उनमें गुणों के आधार पर भी अंतर करना हैं।

  • राजनैतिक दबाव-दंड का भय, पुरस्कार का लालच।

  • धार्मिक दबाव- ईश्वर बुरे कार्यो का दंड देगा या अच्छे कार्यो के बदले स्वर्ग देगा।

मूल्यांकन-

  • मिल का सिद्धांत सामन्यत: काफी अच्छा मनुष्य के मनोविज्ञान और समाज मनोविज्ञान के नजदीक है।

  • सुखों में गुणात्मक भेद मानते ही सुखवाद खारिज हो जाता है यह आलोचना मूर और रेश्डेल ने विस्तार पूर्वक की है, इसका सार यह है कि अगर कोई सुख दूसरे सुख से गुणात्मक रूप ऊँचा है तो इसका मतलब ही है उस सुख में दूसरे सुख की तुलना में कुछ और भी शामिल है वह अन्य जो कुछ भी है, अगर वह सुख को ऊँचा सिद्ध करने में निर्णात्मक है तो इस सिद्धांत को सुखवाद कहना ही (भ्रामक) है।

  • मिल ने जिस आंतरिक प्रेरणा या परोपकार की चर्चा की है उससे मनोवैज्ञानिक सुखवाद का खंडन होता है, अगर सच में परोपकार प्रवृत्ति काम करती है, तो मनुष्य हर कर्म अपने सुख की चेष्टा से नही करता है अत: मनोवैज्ञानिक सुखवाद खंडित हो जाता है।

  • योग्य निर्णायकों का सिद्धांत पूर्णत: आत्मनिष्ठ है इसके भरोसे किसी समाज में नैतिक मूल्य स्थिर नहीं किए जा सकते।

  • सुखों के समतामूलक वितरण का सिद्धांत जो वैथम और मिल दोनों ने दिया है, किसी ने भी स्पष्ट नहीं किया है कि यह लागू कैसे होगा। उदाहरण- अगर कर्म ’क’ से बहुत से व्यक्तियों को निम्न तीव्रता या निम्न स्तर का सुख मिलता है जबकि कर्म ’ख’ से कुछ व्यक्तियों को ऊँचे स्तर का सुख मिलता है तो समाज को उसे नैतिक मानना चाहिए। (98 प्रतिशत व्यक्ति पटाखे फोड़ने का सुख, 2 प्रतिशत व्यक्ति पर्यावरण बचाने का सुख प्राप्त करते हैं)

  • मिल के तर्क में संग्रह दोष है जब वह कहते है कि प्रत्येक व्यक्ति का सुख उत्साहित है अत: सामान्य सुख व्यक्तियों के समुच्चय के लिए सुख है तो लोग दोष के शिकार हो जाते है क्योंकि व्यक्तियों का समुच्चय कोई समुच्चय नहीं है। गुण तथा मात्रा दोनों दृष्टियों से करते है ऐसे में यह सोचना मूर्ख पूर्ण होगा कि सुखों का मूल्यांकन सिर्फ मात्रा से करना चाहिए।

  • मनुष्य में पशुओं से ऊँची प्रवृत्तियां होती है जब उन्हें उन ऊँची प्रवृत्तियों का ज्ञान हो जाता है तो वह नित्कृष्ट सुखों की कामना करना बंद कर देते है, अधिक तीव्र शारीरिक सुख की तुलना में कम तीव्र बौद्धिक सुख अधिक उत्कृष्ट है उसका कथन हैं, ”एक संतुष्ट सुअर होने की अपेक्षा असंतुष्ट मनुष्य से श्रेष्ठ है, मूर्ख की अपेक्षा असंतुष्ट सुकरात होना श्रेष्ठ हैं।

  • अगर सुखों में गुणात्मक भेद है तो इस बात का निर्णय कैसे होगा कि कौन सा सुख अन्य से श्रेष्ठ है, इसके उत्तर में मिल का विचार हैं, ” जिस व्यक्ति ने अपने जीवन में उत्कृष्ठ गुणों तक व्यापक अनुभव प्राप्त किया है केवल वही इसमें निर्णायक हो सकते है” उसे विश्वास है कि ऐसे योग्य तथा अनुभवी निर्णायक बौद्धिक सुखों को शारीरिक सुखों से महत्व देंगे।

  • मिल के सामने भी यह प्रश्न है कि कोई व्यक्ति जो सामान्य तह: अपने सुखों के बारे में सोचता है वह अधिकतम व्यक्तियों के अधिकतम सुख के लिए आचरण क्यों करेगा? वैंथम ने इसके लिए 4 नैतिक दावें किए थे मिल उन चारों को स्वीकारता है किन्तु उसका दावा है कि इसके अलावा एक आंतरिक दबाव की भूमिका भी होती हैं।

आंतरिक दबाव मनुष्य की मूल सामाजिक भावना से संबंधित है। इसी के कारण प्रत्येक मनुष्य के भीतर यह ईच्छा होती है कि वे समाज के सुख-दुख का ध्यान रखे और अपने कर्तव्यों का पालन करे यह प्रेरणा जन्मजात भले ही न हो लेकिन प्राकृतिक अवश्य है। इसी कारण हम इसके साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहते है जो वो दूसरों से अपने प्रति करना चाहता है।