इंडियन (भारतीय) वेर्स्टन (पश्चिमी) फिलोसोपी (दर्शन) (Indian Western Philosophy) Part 6 for Arunachal Pradesh PSC

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प्लेटो :-

प्लेटो ने इन 4 वर्गों की व्याख्या दी हे :-

  • प्रत्ययवाद

  • सदगुण

  • आत्म पूर्णतावाद

  • सुखवाद विरोध

सुकरात की तरह प्लेटो ने भी नीति मीमांसा में सदगुणों को विशेष महत्व दिया है, उसने 4 सदगुणों को नैतिक सदगुणों का आधार माना है- विवेक, साहस, संयम, न्याय, पहले 3 का सही अनुपात होने पर न्याय तथा सामंजस्य का सदगुण सर्वोच्च सदगुण उत्पन्न होता है, इस संबंध की व्याख्या प्लेटों ने व्यक्ति और राज्य दोनों स्तरों पर की हैं-

  • व्यक्ति के स्तर पर उसका मत है कि जो व्यक्ति अपने साहस और संयम को विवेक की अधीन रखता है उसमें न्याय सदगुण उत्पन्न होता जाता है ऐसा व्यक्ति विवेकपूर्ण आचरण करता है, साहस दव्ारा बाधाओं पर विजय प्राप्त करता है और संयम दव्ारा वासनाओं पर नियंत्रण रखता है

  • राज्य के स्तर पर 3 वर्ग है-

  • प्रशासक वर्ग-विवेक का प्रतिनिधि

  • सैनिक वर्ग-साहस का प्रतिनिधि ।

  • व्यापारी वर्ग-वासना, संयम का प्रतिनिधि

अगर तीनो वर्ग एक दूसरे के काम में हस्तक्षेप न करे और सैनिक तथा व्यापारी वर्ग प्रशासक वर्ग के निर्देश के अधीन रहे तो राज्य न्यायपूर्ण होता है, चूँकि सैनिक वर्ग के लोग क्रोध में तथा व्यापारी वर्ग में लोग लोभ में बंधे हो सकते है, इसलिए उन पर दार्शनिक राजा अर्थात विवकेशील प्रशासन का नियंत्रण आवश्यक है।

प्लेटो ने सेरेनाइक संप्रदाय के अच्छे सुखवाद का तथा सिविक संप्रदाय के कठोर वैराग्यवाद दोनों को एंकाकी मार्ग बनाते हुये खारिज किया है उसका मानना है कि मनुष्य को आनंद और संयम का समन्वय करना चाहिए उसे मानसिक और शारीरिक दोनों सुखों की प्राप्ति करनी चाहिए किन्तु विवेक में अधीन रहते हुये, मानसिक सुखों को शारीरिक सुखों से अधिक महत्व देना सही है।

न्याय- प्लेटो की नीति मीमांसा की अभिव्यक्ति उनके 2 ग्रंथों रिपब्लिक (गणतंत्र) तथा फिलैक्स में हुयी है उन्होंने सेरेनाइक और सिविक में अतिवादी मार्गो का विरोध करते हुये पहली बार पूर्णतवाद का विस्तार दिया जिसके अनुसार मनुष्य में संतुलित और सामंजस्य पूर्ण जीवन जीना चाहिए, यही विचार आगे चलकर हीगल, ग्रीन और ब्रेडले जैसे प्रत्ययवादी विचारकों में भी दिखाई पड़ता है।

प्रत्यय सिद्धांत-काल्पनिक सिद्धांत जिसका नीति मीमांसा में आधारित करना गलत है इससे प्रत्ययवाद हावी होता है।

अगर शुभ का प्रत्यय सभी प्रत्ययों में अभिव्यक्त होता और प्रत्यय ही वस्तुजात में अभिव्यक्त होते है तो बाहर है कि साथ में अशुभ परिस्थितियां होती ही क्यों है, इस बाहर का तार्किक समाधान प्लेटो के दर्शन में नहीं है।

विभिन्न प्रत्ययों में समन्वय स्थापित करने वाला शुभ का प्रत्यय है जो संपूर्ण नैतिकता का मूल आधार है पर सभी प्रत्ययों में व्यक्त होता है प्लेटो का यह विचार सुकरात के विचारों से मिला-जुलता है-

  • ज्ञान ही सदगुण है।

  • ज्ञान ही अन्य सदगुणों के रूप में व्यक्त होता है।

प्लेटो ने नीति मीमांसा को अपने प्रत्ययवाद के आधार पर स्थापित किया है उसका दावा है कि न्याय, संयम, साहस, सौन्दर्य जैसे सदगुणों का आदर्शमय प्रत्यय जगत में प्रत्ययों के रूप में विद्यमान है।

प्रत्ययों का ज्ञान बुद्धि के चरम स्तर पर होता है। केवल बुद्धिमान व्यक्ति कठोर साधना के दव्ारा प्रत्ययों को जान पाते हैं, किन्तु प्रत्यय का ज्ञान प्राप्त करते ही व्यक्ति खुद उस सदगुण से युक्त हो जाता है, जो साहस सदगुण को जान लेता है।