इंडियन (भारतीय) वेर्स्टन (पश्चिमी) फिलोसोपी (दर्शन) (Indian Western Philosophy) Part 7 for Arunachal Pradesh PSC

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सर का फारमेट (प्रारूप):-एनकाउंटर किसी भी आधार में नैतिक नहीं हैं।

  • एक दूसरा किन्तु कमजोर तर्क यह भी हो सकता है कि अधिकारी का आदेश मानना कांस्टेबल (सिपाही) की आचरण संहिता का एक हिस्सा है।

  • सच यह है कि दोनों तर्क मिलकर भी कांस्टेबल के कार्य को नैतिक सिद्ध नहीं कर सकते वे अधिक से अधिक उसके कार्य की तीव्रता को कम कर सकते है। किसी के जीवन को बचाने के लिए अधिकारी के अवैध आदेश को अस्वीकार किया जा सकता है इसके प्रमाण कोई व्यक्ति चाहे कितना भी गरीब हो उसे यह हक नहीं दिया जाता कि वह किसी की जान लेे लें।

  • अगर अभियुक्त हिरासत से भाग गया था तो यह पुलिस प्रशासन की कमजोरी है अपने विभाग की कमजोरी को नैतिक रूप से स्वीकारने के बजाए उसके नाम पर किसी की जान लेना बिल्कुल अनुचित है।

  • कानून के अनुसार एनकांउटर (मुठभेड़) केवल उसी स्थिति में जायज है जब पुलिस कर्मचारियों का जीवन खतरे में हो। दी गयी स्थिति से अनुमान होता है कि ऐसा कोई संकट नहीं है बल्कि योजना बनाकर एनकाउंटर किया जा रहा है।

  • यह सिर्फ एक संभावना है कि वह कुछ हत्यायें कर सकता है सिर्फ संभावना के कारण किसी का जीवन लेना अनैतिक माना जाएगा और नैतिक दृष्टि से तो यह सभांवना भी हमेशा बनती है कि वह अपनी गलतियों को स्वीकार कर ले और अच्छा मनुष्य बन जाए।

  • अगर सुराग मिल ही गया है तो उसे गिरफ्तार किया जा सकता है और संभावित छापाओं को अंजाम देने से रोका जा सकता है।

  • पुलिस की नैतिकता की दृष्टि से यह गलत है क्योंकि उसके गिरफ्तार होने से संभव है कि वह कई संभावित अपराधों या छिपे हुये अपराधों की जानकारी दे सकता है जबकि उसे मार देने से यह लाभ नहीं मिलेगा जैसे-जीवन का अधिकार एक मूल अधिकार है जिसे छीनने का हक कानून के सिवा किसी को नहीं है।

  • कांस्टेबल को नैतिक मानने का एक ही तरीका है कि उसके इस कार्य को स्वैच्छिक कार्य न माना जाए, नैतिकता के नियम सिर्फ स्वैच्छिक कार्यो पर लागू होते है। अनैच्छिक कार्यो पर नहीं, अनैच्छिक कार्यो, जिन्हें नीतिशून्य या नीति तटस्थ कार्य भी कहा जाता है में ऐसे कार्य भी शामिल किए जाते है जो असहनीय दबाव के तहत किये गये हो। चूंकि कांस्टेबल की नौकरी खत्म होने का खतरा हैं।

  • कांस्टेबल के एनकाउंटर में हिस्सा लेने को किस आधार पर नैतिक माना जा सकता है।

  • कांस्टेबल अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता और अगर वास्तव में उसे कुछ अक्षमता नहीं है तो।

इस परिस्थिति में निम्न नैतिक प्रश्न शामिल है-ं

  • डीसीपी को कानून दव्ारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना चाहिए या अपने अंतरिक के आधार पर अभियुक्त को मारने का निर्णय करना चाहिए।

  • डीसीपी को अपने अधीनस्थों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए-उन्हें गुलामों की तरह समझना चाहिए या संकल्प स्वातंत्र से युक्त नैतिक प्राणियों में रखना चाहिए।

  • कांस्टेबल को अपने प्रो. (प्रधानाध्यापक) इथिक्स (आचार विचार) अर्थात अपने सीनियर (वरिष्ठ) की आज्ञा का पालन करना और अपने सामाजिक नैतिक मानदंडों तथा अंतरआत्मा (अर्थात अनावश्यक रूप से किसी भी मनुष्य की हत्या नहीं की जानी चाहिए में से किसका पालन करना चाहिए।

  • एक मुद्दा यह भी है कि डीसीपी की कार्यवाही पुलिस प्रशासन और समाज पर कैसा प्रभाव डाले। वह प्रभाव नैतिकता को बढ़ायेंगा या अनैतिकता को

कानूनी दृष्टि से गलत होना और नैतिक दृष्टि से गलत होना एक साथ हो भी सकता है और नहीं भी किन्तु इस स्थिति में ये दोनों निर्णय एक जैसे होंगे। डीसीपी के एनकाउंटर के निर्णय को नैतिक आधार पर सही नहीं माना जा सकता क्योंकि-

  • अभियुक्त पर कई मुकदमें चल रहे है किन्तु सूचना नही दी गयी है कि वह अपराधी सिद्ध हो चुका है। इस स्थिति में तो राज्य को भी हक नहीं है कि वह उसका जीवन छीने।

  • हो सकता है कि न्यायालय अभियुक्त को अपराधी मानते हुये भी मृत्युदंड की आवश्यकता न समझे ऐसी स्थिति में एनकाउंटर और सजा में कोई अंतर नहीं बचेगा।

निरपेक्षवाद:-

  • कोई चीज किसी भी अन्य चीज से प्रभावित नहीं होती है।

  • नैतिक नियम या किसी भी नियम किसी चीज से नहीं बदल सकता।

सापेक्षवाद:-

  • कोई चीज किसी भी अन्य चीज से प्रभावित है।

  • नैतिक नियम किसी अन्य चीज से बदल सकता है।

केस (प्रकरण) स्टडी (अध्ययन) :-

गब्बर सिह इलाके का जाना-माना अपराधी है जिस पर कई मुकदमें चल रहे हैं और वह जेल से फरार हो गया है, इस बात की पूर्ण संभावना है कि वह कुछ हत्याओं को अंजाम दे सकता है।

चुलबुल पोडे इलाके के डीसीपी है और उन्हें सुराग मिला है कि गब्बर कहां छिपा हुआ है, ”उन्हें कानूनी अनुशासन में विशेष रूची नहीं है। वे मानते है कि अदालत की लंबी प्रक्रिया में अपराधी बच ही जाता है। इसलिए कई मोको पर एकाउंटर कर चुके है और आज भी एकाउंटर की योजना बनाती है उनके अधीनस्थ पुलिस अधिकारी उनसे बहुत डरते है क्योंकि वे सब पर नियंत्रण कैसे रखें।

एंकांउटर टीम (दल) में एक कांस्टेबल है जिसका नाम तिवारी जी है वह मन से नहीं चाहता कि एकांउटर का हिस्सा बने लेकिन डीसीपी का दबाव इतना अधिक है अगर वह भाग नहीं लेगा या किसी को शिकायत करेगा तो उसका बिलंबन या बर्खास्त तय है।

इस परिस्थिति के आलम में निम्न प्रश्नों में विचार करे-

  • इसमें कौन-2 से नैतिक मुद्दे शामिल हैं?

  • यद्यपि एकाउंटर कानूनी दृष्टि से गलत है पर क्या इसे नैतिक दृष्टि से उचित माना जा सकता है अगर हां तो तर्को के आधार पर।

  • सेरेनाइको के नैतिक सुखवाद को खारिज करते हुये प्लेटो ने दावा किया है कि सुख का शुभ होना आवश्यक है।

  • तीव्र वासनाओं, ईर्ष्याया घृणा से प्रेरित सुख, नैतिक अशुभ उत्पन्न कर सकते हैं न ही सुख नैतिक है वे विवकेशील आचरण के अंतर्गत किए गये है।

मूल्यांकन:-

  • भावना और बुद्धि को समुचित महत्व दिया।

  • नित्कृष्ठ सुखवाद का तार्किक विरोध जो आवश्यक था।

  • हीगल जैसे दार्शनिकों के लिए आधार सामग्री की तरह है।