भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का विकास (Development of Indian National Movement) Part 10 for Arunachal Pradesh PSC

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क्रांतिकारी आंदोलन के कारण

कर्जन की प्रतिक्रियावादी शासन, बंगाल का विभाजन उग्रवादियों का बलपूर्वक दमन तथा कांग्रेस के उदारवादियों की संवैधानिक राजनीति ने सचेत नवयुवकों को तथा समाचार पत्रों को निराश, विफल और आतुर बना दिया। वे हिंसात्मक राजनीति की ओर आकर्षित हुए। 1905 ई. के बाद ब्रिटिश प्रशासन ने भारत में लोकतंत्र की पूर्ण उपेक्षा की। प्रेस तथा जन सभाओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया और सैकड़ों राजनीतिक कार्यकर्ताओं को बंदी बनाया गया। ऐसी परिस्थितियों ने क्रांतिकारी आंदोलन की पृष्ठभूमि को तैयार किया।

विदेशी शिकंजे से जन्मभूमि को स्वतंत्र कराने की प्रेरणा उन्हें इस बात से भी मिली कि 1907 ई. में 1857 ई. के महान विद्रोह की अर्द्धशताब्दी थी। जनता को सशस्त्र विद्रोह के लिए प्रेरित करने के लिए समाचार पत्र तथा परचे बड़ी संख्या में बाँटे गए। इसकी व्यापकता से अंग्रेज अधिकारी घबरा गए और जैसे-जैसे विद्रोह की 50वीं वर्षगाँठ निकट आती गयी, क्रांतिकारी आंदोलन जोर पकड़ता गया। बिहारी नाम अखबार के संपादक ने स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए नवयुवकों को म्यान से तलवार निकालने के लिए ललकारा। कलकत्ता से प्रकाशित युगांतर ने लिखा कि गुलाम समाज की मुक्ति क्रांति में ही है और साथ ही वन्दे मातरम का नारा बुलंद किया गया।

इन घटनाओं से ब्रिटिश प्रशासन आतंकित हो उठा और उसे रोकने के लिए कठोर कदम उठाए गए, परन्तु आंदोलन जोर पकड़ता गया तथा सरकारी अफसरों की हत्या तथा बमकांड जैसी हिंसक घटनाएँ बढ़ने लगी। फलस्वरूप बंगाल, पंजाब तथा महाराष्ट में और देश के बाहर भी कई गुप्त क्रांतिकारी संस्थाएँ स्थापित हुई।

दमन और सुधार

इन घटनाओं से घबराकर सरकार ने जबरदस्त दमनकारी उपायों का सहारा लिया। सभाओ, संगठनों और समाचार-पत्रों पर प्रतिबंध लगाने के लिए तथा राष्ट्रीय आंदोलन को कुचलने के लिए कई दमनकारी अधिनियम बनाए गए और उन्हें कठोरता से लागू किया गया, उदाहरण के लिए सोडिएशन मीटिंग्स (सभा) एक्ट (अधिनियम), न्यूजपेपर्स (समाचारपत्र) एक्ट (अधिनियम), क्रिमिनल लॉ एमेंडमेंट एक्ट (अधिनियम) आदि। इन कानूनों की कठोरता को स्वयं भारत मंत्री लार्ड मार्ले ने अनुचित बताया। सरकार की इन दमनकारी नीतियों का परिणाम उल्टा हुआ।

राष्ट्रीय तथा क्रांतिकारी आंदोलन को दबाने के उद्देश्य से सरकार निष्ठुर दमनकारी नीति के अतिरिक्त सुधारात्मक नीति का भी अनुसरण कर रही थी। 1909 के मार्ले-मिंटो सुधार का नरम दल के कांग्रेसियों ने स्वागत किया। किन्तु जब सुधार कार्यान्वित किया गया तब उनकी आशा निराशा में बदल गई। यह सुधार राष्ट्रीय एवं क्रांतिकारी आंदोलन को जरा भी कमजोर न कर सका। 1913 में जर्मनी -बंगाल षडवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू यंत्र का पता चल जाने और गरम दल के कुछ नेताओं की गिरफ्तारी के कारण आंदोलन कुछ दिनों के लिए निस्तेज हो गया।

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