गाँधी युग (Gandhi Era) Part 15 for Arunachal Pradesh PSC

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गोलमेज सम्मेलन

प्रथम सम्मेलन

ब्रिटिश सरकार ने तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैक्डोनाल्ड की अध्यक्षता में नवंबर, 1930 में लंदन में प्रथम गोलमेज सम्मेलन का आयोजन किया। इसका उद्देश्य भारत में सुधारों से संबंधित साइमन कमीशन रिपोर्ट पर विचार करना था। इसमें ब्रिटिश भारत एवं देशी राज्यों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया लेकिन कांग्रेस ने इसका बहिष्कार किया। देशी राज्यों के शासकगण एवं अन्य प्रतिनिधियों में तीन मुद्दों पर सहमति हुई-

  • भारत के लिए संघीय सरकार।

  • केन्द्र के पास आंशिक उत्तरदायित्व

  • कुछ निश्चित पूर्वोपाय के बाद पूर्ण प्रांतीय स्वायत्ता पर जोर डाला तो डॉ. अम्बेडकर ने दलितों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की मांग की। हिन्दू प्रतिनिधियों ने इन दोनों ही मांगों को अस्वीकार कर दिया।

दव्तीय सम्मेलन

दव्तीय गोलमेज सम्मेलन लंदन में मैक्डोनाल्ड की अध्यक्षता में सितंबर, 1931 में शुरू हुआ। गांधी-इरविन समझौते की शर्त के अनुसार कांग्रेस ने इसमें भाग लेने का निर्णय किया तथा गांधी जी को अपने एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में सम्मेलन में भाग लेने के लिए भेजा। इस सम्मेलन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि दो उप-समितियों का निर्माण थी। प्रथम समिति ’संघीय संरचना’ एवं दव्तीय समिति ’अल्पसंख्यकों’ से संबंधित थी। ब्रिटिश मंत्रीगण एवं अनेक सांप्रदायिक नेता सांप्रदायिक समझौते पर विशेष जोर दे रहे थे, जबकि गांधी जी ने संवैधानिक सुधारों को प्रमुखता दी। इस मुद्दे पर अल्पसंख्यकों से संबंधित समिति में गतिरोध उत्पन्न हो गया। ब्रिटिश सरकार निश्चित थी कि विभिन्न सांप्रदायिक नेता सांप्रदायिक प्रश्न का हल नहीं कर पाएंगे। गांधी जी ने तर्क पूर्ण सुझाव दिया कि इसका समाधान स्वराज्य संविधान में हो सकता है तथा सांप्रदायिक मतभेद स्वतंत्रता की आंच में समाप्त हो जाएंगे। परन्तु मुस्लिम, हिन्दू एवं सिक्ख सांप्रदायिकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई एवं गांधी जी को सम्मेलन में एक संयुक्त मोर्चा प्रस्तुत करने से वंचित कर दिया।

अंतत: 1931 में मैक्डोनाल्ड ने प्रस्तावित भारत शासन अधिनियम की मुख्य बिन्दुओं को स्पष्ट किया। इसमें मजबूत संघ सरकार एवं समिति स्वशासन के अधिकार वाली प्रांतीय स्वायत्ता की घोषणा की गयी। संघ सरकार के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों जैसे- वित्त, विदेशी संबंध (युद्ध की घोषण सहित) एवं प्रतिरक्षा ब्रिटिश संसद एवं वायसराय के अधिकार में होंगे। वार्ता असफल हो गई गांधी जी खाली हाथ भारत लौट आये।

तृतीय सम्मेलन

तृतीय गोलमेज सम्मेलन सुधरी हुई परिस्थितियों में नवंबर, 1932 में आयोजित किया गया। इसके कुछ पहले ही सरकार ने पूना पैक्ट (संधि) को स्वीकार कर लिया था। कांग्रेस एवं ब्रिटेन की लेबर (मजदूर) पार्टी (दल) ने सम्मेलन का बहिष्कार किया। सम्मेलन में ब्रिटिश भारत की संघीय संरचना पर विचार हुआ। इस पर एक ’श्वेत पत्र’ तैयार कर संसद की संयुक्त प्राक्कलन समिति को सौंपा गया। संयुक्त प्राक्कलन समिति की अनुशंसाओं के आधार पर एक विधेयक तैयार किया तथा उसे गवर्नमेंट (सरकारी) ऑफ (के) इंडिया (भारत) एक्ट (अधिनियम), 1935 के रूप में पारित किया गया। वास्तविकता में यह सम्मेलन एक खानापूर्ति मात्र था।

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